त्वचा की कोशिकाओं से मनुष्यों की कार्य करने वाली पहली मांसपेशी विकसित की गई

त्वचा की कोशिकाओं से मनुष्यों की कार्य करने वाली पहली मांसपेशी विकसित की गई

वैज्ञानिकों ने मनुष्यों की ऐसी छोटी तथा कृत्रिम मांसपेशी विकसित कर ली है जो कि न्यूरल तथा इलेक्ट्रीकल उत्प्रेरक की ऐसी ही प्रतिक्रिया देती है जैसे कि वास्तविक मांसपेशी। ये मांसपेशी के तंतु त्वचा की कोशिकाओं से बने हैं ना कि मांसपेशी की कोशिकाओं से।

इससे पहले वैज्ञानिक मांसपेशी की कोशिकाओं को अन्य प्रकार की कोशिकाओं से बना चुके थे परंतु अब तक किसी से बना चुके थे परंतु अब तक किसी ने कार्य कर सकने वाली मांसपेशी तंतु किसी मांसपेशी कोशिका के अलावा किसी कोशिका से निर्मित नहीं की थी।

यह जानकारी नेचर कम्यूनिकेशन नामक जर्नल में दी गई है। यह खोज आनुवांशिक मांसपेशीय दुर्विकास का बेहतर अध्ययन करने में सहायक होगी, साथ ही इसके इलाज के भी नए विकल्प खोजने में सहायक होगी।

वैज्ञानिकों ने मनुष्यों की त्वचा से कोशिकाएं ली फिर एक ज्ञात तकनीक के द्वारा इन कोशिकाओं को इंडयूसड प्लूरीपोटेंट स्टैम सेल्स में तब्दील कर दिया। ये कोशिकाएं किसी भी तरह की मानव कोशिका में बदली जा सकती हैं। इसके बाद एक नई प्रक्रिया से वैज्ञानिकों ने इन प्लूरीपोटैंट सेल्स को मसल स्टेम सेल्स में परिवर्तित कर दिया, ये नई कोशिकाएं मायोजेनिक प्रोजिनेटर कहलाती हैं। किसी दाता के एक प्लूरीपोटेंट स्टेम सेल का उपयोग करते हुए हजारों मसल स्टेम सेल्स बनाई जा सकती हैं।

ऐसा करना इसलिए संभव है क्योंकि एक कोशिका को हजारों कोशिकाओं में बदला जा सकता है। प्लूरीपोटेंट स्टेम सेल्स में एक प्रोटीन Pa × 7 डाल दिया जाता है जो कि कोशिका को मांसपेशी कोशिका में परिवर्तित होने का सिग्नल देता है। एक बार पर्याप्त मात्रा में मसल स्टेम सेल प्राप्त हो जाने पर Pa × 7 प्रोटीन को निष्क्रिय कर दिया जाता है।

इन मसल सेल्स को एक  कल्चर में डाल दिया जाता है जिसमें बहुत से पोषक तत्व तथा विकास के लिए आवश्यक पदार्थ होते हैं जो कि कोशिकाओं को मासपेशी तंतु बनाने के लिए उत्प्रेरित करते हैं। इस प्रक्रिया के तीन सप्ताह बाद 2 सेंटीमीटर लंबे तथा लगभग 1 मिलीमीटर व्यास के मांसपेशी के ऊतक इस विलियन में बन जाते हैं।

वैज्ञानिकों द्वारा विकसित यह प्रक्रिया आनुवांशिक मांसपेशीय रोग के अध्ययन में सहायक होगी जैसे कि डचेन पेशी अपविकास जिसमें लगभग चार वर्ष की आयु से ही मांसपेशी की दुर्बलता होने लगती है। यह स्थिति बहुत जल्दी से खराब होने लगती है और लगभग 12 वर्ष की आयु तक आते-आते रोगी चलने-फिरने के योग्य नहीं रहता। इस प्रकार के रोगों का इलाज ढूंढने में यह नई खोज बहुत सहायक हो सकती है।

वैज्ञानिकों द्वारा निर्मित नए तंतु क्योंकि पूर्णतः काम कर रहे हैं, जिससे वैज्ञानिक ये पता लगा सकते हैं कि ये किस उत्प्रेरक के लिए कैसी प्रतिक्रिया दे सकते हैं। ये भी देखा जा सकता है कि कौन-सी दवाइयां या कौन-से इलाज इन रोगों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। यह तकनीक जानवरों पर होने वाले प्रयोगों के परिणामों से कहीं अधिक सटीक परिणाम दे सकती है।

चीन में फोटोवोल्टेइक रोड का परीक्षण

चीन में फोटोवोल्टेइक रोड का परीक्षण

चीन ने अपने पहले फोटोवोल्टेइक राजमार्ग का परीक्षण किया। यह फोटो वोल्टेइक राजमार्ग चीन के पूर्वी शैन्डोंग प्रदेश में विकसित तकनीक पर निर्मित की गई है। इस मार्ग पर इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए वायरलेस चार्जिंग सिस्टम लगा हुआ है।

इस मार्ग को सोलर पैनल का प्रयोग करते हुए बनाया गया है जिसके ऊपर कंक्रीट की एक बहुत महीन परत लगाई गई है जिससे सोलर पैनल सुरक्षित रह सकें। ये पैनल इस प्रकार से बनाए गए हैं कि जब इनके ऊपर से वाहन गुजरे, तो विद्युत वाहनों को ऊर्जा स्थानांतरित हो। फोटोवोल्टेइक राजमार्ग एक किलोमीटर क्षेत्रा में 5,875 वर्ग मीटर के सतह क्षेत्रा पर बनाया गया है।

राजमार्ग के एक किलोमीटर खंड क्षेत्रा जिसका सफलतापूर्वक परीक्षण किया गया है, 817.2 किलोवाट बिजली का उत्पादन कर सकता है और प्रत्येक वर्ष 1 मिलियन किलोवॉट घंटे बिजली पैदा करने की संभावना है।

इस राजमार्ग पर जो बिजली उत्पादन किया जाएगा उसे चीन की राष्ट्रीय ऊर्जा ग्रिड से जोड़ दिया जाएगा। सबसे पहला फोटोबोल्टेइक मार्ग बनाने वाला देश फ्रांस था। फ्रांस ने वर्ष 2016 में सोलर पैनल मार्ग बना लिया था।

चीन में तैयार किए गए राजमार्ग की पूरी परियोजना की कुल लंबाई 50 किमी. से ज्यादा है। इस राजमार्ग पर उत्पन्न सोलर एनर्जी से सर्दियों में राजमार्ग पर जमी बर्फ पिघलेगी। इस काम के लिए स्नो मेल्टिंग सिस्टम लगाए गए हैं।

यह राजमार्ग किसी भी अन्य राजमार्ग की तुलना में 10 गुना ज्यादा दबाव सह सकता है। इस राजमार्ग की लागत प्रति वर्ग मीटर 458 डॉलर (30,000 रुपए) है, जो कि एक सामान्य राजमार्ग के निर्माण की लागत से कहीं अधिक है।

‘सुपर वुड’ कारों और वायुयान में प्रयुक्त होने वाले स्टील की जगह लेगी

सुपर वुडकारों और वायुयान में प्रयुक्त होने वाले स्टील की जगह लेगी

शोधकर्मियों ने एक ऐसी लकड़ी ‘सुपरवुड’ का आविष्कार कर लिया है जो कि किसी भी स्थान पर प्रयुक्त होने वाले स्टील की जगह ले सकेगी।

‘नेचर’ नाम के जर्नल में छपे लेख के अनुसार, शोधार्थियों का मानना है कि नए तरीके से बनाई जाने वाली लकड़ी कई टाइटेनियम की मिश्र धातु से भी अधिक मजबूत होगी। अमेरिका के मैरीलैंड यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर लियांगबिंग हू के अनुसार, नई तकनीक के प्रयोग से प्राकृतिक लकड़ी को 12 गुना मजबूत और 10 गुना दृढ़ बनाया जा सकता है।

इस नई तकनीक में दो प्रक्रियाएं हैं। पहली में लिग्निन (लकड़ी की कोशिकाओं के बीच उपस्थित) को तथा हेमिसेल्यूलोस (जो कि कोशिका भित्ति की संकुलन सघनता को बढ़ाता है) आंशिक रूप से हटाया जाता है।

इस प्रक्रिया को सोडियम हाइड्रॉक्साइड और सोडियम सल्फाइट के एक मिश्रण में उबालकर पूर्ण किया जाता है। इसके बाद हॉट-प्रेसिंग की जाती है जिससे कोशिका-भित्ति पूर्णतः टूट जाती हैं और प्राकृतिक लकड़ी को घनीभूत किया जाता है। शोध के अनुसार, यह प्रक्रिया लकड़ी की बहुत सी किस्मों के लिए समान रूप से प्रभावशाली है।

शोधकर्मियों ने इस तकनीक द्वारा तैयार की गई लकड़ी को अधिक कठोर तथा दृढ़ पाया। यह लकड़ी स्टील जितनी ही मजबूत है। इसे तोड़ने के लिए दस गुना अधिक बल की आवश्यकता होती है तथा इस लकड़ी को प्रक्रिया के आरंभ में मोड़ कर आकार भी दिया जा सकता है।

यह लकड़ी प्राकृतिक लकड़ी से छह गुना हल्की है। इसकी तुलना कार्बन फाइबर से भी की जा सकती है। वैज्ञानिक एक लंबे समय से लकड़ी की दृढ़ता को बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं तथा अब सफलता उनके हाथ आ गई है।

गूगल ने ‘लर्न विद गूगल ए आई’ नामक मशीन लर्निंग कोर्स आरंभ किया

गूगल ने लर्न विद गूगल ए आईनामक मशीन लर्निंग कोर्स आरंभ किया

गूगल ने ‘लर्न विद् गूगल ए आई’ नामक कार्यक्रम की शुरुआत की है, जिसमें मशीन लर्निंग विशेषज्ञों की सहायता से विकसित पाठ्य संसाधन प्रयोग कर लोगों को आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के सिद्धांत, दक्षता को विकसित करने आदि से संबंधित शिक्षा दी जाएगी, जिसका प्रयोग कर लोग वास्तविक दुनिया की मुश्किलों को आसान कर सकें।

यह  मुफ्त पाठ्यक्रम है जो कि सभी यूजर्स को मशीन लर्निंग स्किल्स सिखाता है। यह कोर्स मुफ्त है तथा सभी के लिए उपलब्ध है। गूगल का कहना है कि इस कोर्स के पीछे एक ही लक्ष्य है कि लोग मशीन लर्निंग अवधारणा को प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित हों तथा इस क्षेत्रा में स्वयं को दक्ष करें और जीवन की रोजमर्रा की मुश्किलों का हल निकालने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का प्रयोग करें।

यह क्रैश कोर्स उच्च स्तर के टेन्सर फ्लो/एपीआई का प्रयोग करते हुए व्यवहारिक एम.एल. अवधारणाओं का परिचय कराएगा। टेन्सल फ्लो मशीन लर्निंग टूल के लिए लाइब्रेरी का ओपन सोर्स है तथा इसे कोई भी प्रयोग कर अपनी आवश्यकता के अनुसार एआई तथा एमएल फ्रेमवर्क को बना सकता है।

मशीन लर्निंग कम्प्यूटरों को सीखने, समझने तथा आंकड़ों को पहचानने की अनुमति देता है। मशीन लर्निंग आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के लिए एक बिल्डिंग ब्लॉक है और यह स्वचालित कारों की क्षमता तथा छवि पहचानने की क्षमता विकसित करने जैसा है।

उत्पाद जैसे कि गूगल फोटो, गूगल ट्रांस्लेट, गूगल अस्सिटेंट आदि सभी किसी-न-किसी काम के लिए आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का सहारा लेते हैं। इस कोर्स के लिए कुछ योग्यता भी निर्धारित की गई हैं जो कि सीखने वालों के पास होनी चाहिए जैसे कि बीजगणित, लघुगणक। बेसिक प्रोग्रामिक पायथन की कोडिंग में कुछ अनुभव होना चाहिए जिससे कि कोर्स को आरंभ करने वाला सहजता से पढ़ सके।

यह कोर्स कंपनी ने अपने कर्मचारियों के लिए विकसित किया था तथा अब तक 18,000 से अधिक कर्मचारियों ने अपना नाम पंजीकृत करा लिया है।  कंपनी का कहना है कि कार्यालय में इस कार्यक्रम की सफलता ने इसे सभी के लिए उपलब्ध कराए जाने को प्रोत्साहित किया।

नासा मंगल ग्रह तक पहुंचने के लिए एटोमिक रॉकेट का प्रयोग करेगा

नासा मंगल ग्रह तक पहुंचने के लिए एटोमिक रॉकेट का प्रयोग करेगा

मंगल ग्रह पर पहुंचने की प्रतिस्पर्धा में अव्वल रहने के लिए नासा 1970 के दशक के एटॉमिक रॉकेटों का प्रयोग करेगा। नासा ने बीडब्ल्यूएक्सटी न्यूक्लियर इनकॉर्पोरेशन एनर्जी के साथ 18.8 मिलियन डॉलर का समझौता किया है, जिसमें यह निश्चित किया गया कि अंतरिक्ष में दूर तक यात्रा करने के लक्ष्य के लिए एक रिएक्टर को डिजाइन किया जाएगा तथा ईंधन को भी विकसित किया जाएगा जिसका प्रयोग न्यूक्लियर-थर्मल प्रोपल्शन इंजन में किया जा सके।

भले ही यह बहुत लंबी यात्रा की छोटी सी शुरुआज है परंतु इस विचार पर रूस तथा चीन भी काम कर रहे हैं। पारंपरिक रॉकेट में ईंधन को जलाया जाता है जिससे दबाव बनाया जा सके। इस एटॉमिक सिस्टम में रिएक्टर का प्रयोग कर प्रोपेलेंट को गर्म किया जाता है, जैसे कि तरल हाइड्रोजन जो कि नोजल के माध्यम से फैलकर क्राफ्ट को संचालित करती है।

यह तकनीक रॉकेट के ईंधन का उपयोग करने की क्षमता को दोगुना कर देती है जिससे तुलनात्मक रूप से छोटा क्राफ्ट तथा कम संक्रमण काल का उपयोग संभव हो पाता है। यह घटक बहुत ही व्यापक है, विशेषतः उस मिशन के लिए जिसमें बहुत से प्रोपेलेंट की आवश्यकता हो, जैसे कि मंगल ग्रह के लिए उड़ान। यह तकनीक उस कंपनी के लिए बहुत ही फायदेमंद होगी जो कि इस तकनीक को सबसे पहले इजाद कर लेगा क्योंकि इसकी मांग हर देश को है।

इस तकनीक की आवश्यकता विशेषकर अमेरिका जैसे देशों को अधिक है जिनके एटॉमिक ऊर्जा के क्षेत्रा में एक मंदी आ गई है। अमेरिका, यूरोप तथा जापान में सख्त कानून, निर्माण कार्य में देरी, लोगों को भरोसा न होना तथा राजनीतिक विरोधी दलों के कारण नाभिकीय ऊर्जा के विकास का काम ठप्प हो गया जिससे नई कंपनियां दिवालिया हो गईं।

जर्मनी, दक्षिणी कोरिया और ताइवान जैसे देश एक नवीकरणीय ऊर्जा या सस्ती प्राकृतिक गैस जैसे विकल्प खोज रहे हैं तथा चीन और रूस जैसे देशों को नाभिकीय ऊर्जा के क्षेत्रा में पीछे छोड़ रहे हैं। रूस की एक प्रोटोटाइप नाभिकीय इंजन को विकसित करने की योजना है जिसे मंगल ग्रह जाने के लिए प्रयोग में लाया जा सके।

रूस ने अब तक इस क्षेत्रा में प्रगति हासिल कर 30 फिजन रिएक्टरों को अंतरिक्ष में स्थापित कर दिया है। चीन का लक्ष्य है कि वह वर्ष 2045 तक एटॉमिक ऊर्जा से चलने वाले शटल को अंतरिक्ष खोजी योजनाओं में प्रयुक्त करे।

नासा को मंगल ग्रह तक पहुंचने की प्रतियोगिता में एलन मस्क जैसे उद्योगपतियों से भी चुनौती मिल रही है। एलन मस्क ने लोगों को मंगल ग्रह तक पहुंचाने का वादा किया है। एलन मस्क की कंपनी स्पेस एक्स ऐसे ईंधन को विकसित करने पर काम कर रही है जिसमें तरल ऑक्सीजन और मीथेन का प्रयोग किया जाए।

नासा का लक्ष्य मंगल ग्रह पर मानव कॉलोनी बसाने का भी है। एजेन्सी और ऊर्जा विभाग ऐसे न्यूक्लियर फिजन रिएक्टर्स को विकसित कर रहा है, जिन्हें अन्य ग्रहों या चांद पर स्थापित किया जाएगा तथा ये दस किलोवॉट तक की ऊर्जा देंगे। इन रिएक्टरों को किलो पावर नाम दिया गया है।

चंद्रयान-II अक्टूबर माह में चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के लिए प्रक्षेपित किया जाएगा

चंद्रयान-II अक्टूबर माह में चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के लिए प्रक्षेपित किया जाएगा

यद्यपि चंद्रयान-II मिशन भारत का पहला मिशन नहीं है परंतु निश्चित ही यह भारतीय सरकार की सर्वाधिक महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में से एक है। चंद्रयान II का प्रक्षेपण अप्रैल 2018 में किया जाना था परंतु प्रक्षेपण को स्थगित कर दिया गया है और अब इसे अक्टूबर माह में प्रक्षेपित किया जाएगा।

चंद्रयान-II रोवर, जिसकी लागत लगभग 800 करोड़ रुपए है, को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के बारे में जानकारी इकट्ठा करने के लिए बनाया गया है। अब तक चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के बारे में बहुत कम जानकारियां प्राप्त हैं। चंद्रयान-II  चंद्रयान-I परियोजना का ही विस्तृत भाग है।

उल्लेखनीय है कि चंद्रयान I के द्वारा चंद्रमा पर पानी की उपस्थिति पता चली थी। चंद्रयान-II का चंद्रमा पर उतरना ऐसा ही है जैसे कि किसी व्यक्ति का चंद्रमा पर जाना। चंद्रयान-I को भारत के श्रीहरिकोटा केंद्र से वर्ष 2008 में प्रक्षेपित किया गया था, जिसमें 83 मिलियन डॉलर की लागत आई थी। इस अभियान में भारत में निर्मित एक लूनर ऑर्बिटर (चंद्रयान) तथा एक रोवर एवं एक लैंडर शामिल होंगे।

इसरो के अनुसार, उड़ान के समय इसका वजन लगभग 3,250 किलो होगा। ऑर्बिटर 100 किलोमीटर की ऊंचाई पर चंद्रमा की परिक्रमा करेगा। इस अभियान में ऑर्बिटर को पांच पेलोड के साथ भेजा जाएगा। पांच में से तीन पेलोड नए हैं, जबकि दो अन्य चंद्रयान-1 ऑर्बिटर पर भेजे जाने वाले पेलोड के उन्नत संस्करण हैं।

ऑर्बिटर उच्च रिजॉल्यूशन कैमरा (Orbiter High Resolution Camera) लैंडर के आर्बिटर से अलग होने से पहले लैंडिंग साइट की उच्च रिजॉल्यूशन की तस्वीर देगा। चंद्रयान I के मून इम्पैक्ट प्रोब के विपरीत, लैंडर धीरे-धीरे नीचे उतरेगा।

लैंडर किसी तरह की वैज्ञानिक गतिविधि का प्रदर्शन नहीं करेगा। रोवर सौर ऊर्जा द्वारा संचालित होगा तथा चंद्रमा की सतह पर पहियों के सहारे चलेगा, मिट्टी तथा चट्टानों के नमूने एकत्रा करेगा तथा उनका रासायनिक विश्लेषण करेगा और आंकड़ों को ऊपर ऑर्बिटर के पास भेज देगा जहां से आंकड़ों को पृथ्वी के केंद्र पर भेज दिया जाएगा।

ऑर्बिटर पर पांच तथा रोवर पर दो पेलोड भेजे जाएंगे। भारतीय सरकार की इस परियोजना को अप्रैल से अक्टूबर तक स्थगित करने का कारण है कि विशेषज्ञों द्वारा कुछ परीक्षण सुुझाए गए हैं तथा उनके पूर्ण होने में कुछ समय लगेगा।

 

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इसरो विश्व के सबसे शक्तिशाली यान की तकनीक पर काम कर रहा है

इसरो विश्व के सबसे शक्तिशाली यान की तकनीक पर काम कर रहा है

स्पेस एक्स के विश्व के सर्वाधिक शक्तिशाली रॉकेट ‘फॉल्कन हेवी’ की तर्ज पर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र इसरो भी दोबारा प्रयोग किए जा सकने वाली सामग्री को विकसित करने के लक्ष्य हेतु काम कर रहा है, इससे पूरे मिशन की लागत में कमी आएगी। फॉल्कन हेवी में प्रयुक्त बूस्टर्स में से दो का दूसरी बार उपयोग किया गया है। इससे पहले ये फॉल्कन नाइन के प्रक्षेपण में प्रयुक्त किए गए थे।

इसरो ने बताया कि रिसर्च एंड डेवलपमेंट डिपार्टमेंट तीन तकनीकों पर काम कर रहा है। पहली, जिसके द्वारा यान को ऑर्बिटल में दोबारा ले जाया जा सके, दूसरी जिसके द्वारा एक बार प्रयोग किए जा चुके एयरस्ट्रिप पर दोबारा प्रयोग किए जा सकने वाले लॉन्च वेहिकल की लैंडिंग तथा तीसरी दो बार प्रयोग किए जा सकने वाले रॉकेट स्टेज पर।

इसरो इन तीनों तकनीकों पर एक साथ शोध कार्य कर रहा है तथा उम्मीद की जा रही है कि दूसरी तकनीक का परीक्षण दो साल के अंदर कर लिया जाएगा (वर्ष 2016 में दोबारा प्रयोग किया जा सकने वाले लॉन्च वेहिकल का पहला परीक्षण किया जा चुका है।)

इसरो की प्राथमिकता है कि जी.एस.एल.वी.एम. के  भार उठाने की क्षमता को चार टन से बढ़ाकर छह टन किया जाए। इसरो का कहना है कि भार उठाने की क्षमता में इजाफा करके हम आत्मनिर्भर हो जाएंगे तथा हमें अपनी छह टन से भारी सैटेलाइट को प्रक्षेपित करने के लिए यूरोपियन स्पेस पोर्ट पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

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वैज्ञानिकों ने विश्व में सर्वप्रथम बंदर का क्लोन विकसित किया

वैज्ञानिकों ने विश्व में सर्वप्रथम बंदर का क्लोन विकसित किया

वैज्ञानिकों ने उसी तकनीक से बंदर का क्लोन विकसित किया जिस से डॉली भेड़ का क्लोन विकसित किया गया था। झौंग झौंग और हुआ हुआ बंदर के दो क्लोन हैं जिन्हें शंघाई के चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेस इंस्टिट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंस में विकसित किया गया।

ये पहला मामला है जब सोमैटिक सैल न्यूक्लियर ट्रांसफर टेकनीक का इस्तेमाल करते हुए किसी बंदर का क्लोन बनाया गया है। बीस साल पहले भेड़ का क्लोन इसी तकनीक से बनाया गया था। वैज्ञानिकों ने कई अन्य तकनीकों का प्रयोग भी किया परंतु एक ही तकनीक से क्लोन विकसित हो पाया।

वैज्ञानिक आशा कर रहे हैं कि वो दवाइयों के परीक्षण के लिए आगे भी इस प्रकार से क्लोन विकसित कर पाएंगे। झौंग झौंग और हुआ हुआ के लिए वैज्ञानिकों ने अंडे की कोशिका से केंद्रक हटा कर बॉडी सेल्स के अन्य केंद्रक को स्थापित कर दिया था।

पेटा की ओर से इस मामले पर चिंता व्यक्त की गई है और कहा गया है कि यह एक भयानक तथा क्रूर कृत्य है। पेटा का कहना है कि क्लोनिंग एक हॉरर शो है जिसमें जीवन, समय और पैसा बेकार किया जाता है और इस प्रकार के प्रयोगों के कारण होने वाले कष्ट सोचे भी नहीं जा सकते।

क्लोनिंग की प्रक्रिया में नब्बे प्रतिशत असफलता मिलती है इसलिए ये दो छोटे-छोटे बंदर कष्ट और असंख्य मौतों को दर्शाते हैं। क्लोनिंग से सिर्फ जानवरों को दुख पहुंचाया जा सकता है। ये जीते-जागते जीव हैं कोई प्रयोग करने की चीज नहीं हैं। यदि इस रिपोर्ट के शब्दों को ध्यान से पढ़ा जाए तो पता चलता है कि इन दो क्लोन्स के लिए कई जानवरों को मार दिया गया जिससे कि जीवित जन्म कराया जा सके।

कुछ जानवर जन्म के कुछ ही समय बाद मर गए जो कि उनके और उनकी माओं के लिए दर्दनाक था। लगभग 100 मिलियन जानवर प्रतिवर्ष प्रयोगों के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। जो वैज्ञानिक इस परियोजना में शामिल थे उनका कहना है कि हमने कठोर नीति का पालन किया है जिससे किसी जानवर को कष्ट न हो।

इस क्लोनिंग में कठोर अंतरराष्ट्रीय निर्देशों का पालन किया गया है, जोकि यूएस नेशनल इंस्टीट्यूट हेल्थ द्वारा निर्धारित की गई हैं। ये क्लोन हमें वास्तविक नमूने दे सकते हैं जिन पर न सिर्फ आनुवांशिक दिमागी बीमारियों का बल्कि कैंसर, इम्यून या मेटाबोलिक बीमारियों का इलाज भी खोजा जा सकता है। इससे पहले वर्ष 1999 में भी मकाक बंदरों की क्लोनिंग की कोशिश की गई थी परंतु वह प्रयोग सफल नहीं हो पाया था।

स्पेस एक्स ने सबसे शक्तिशाली रॉकेट फॉल्कन हैवी लॉन्च किया

स्पेस एक्स ने सबसे शक्तिशाली रॉकेट  फॉल्कन हैवी  लॉन्च किया

6 फरवरी, 2018 को अमेरिकी कंपनी स्पेस एक्स ने विश्व का सबसे शक्तिशाली रॉकेट ‘‘फॉल्कन हैवी’’ प्रक्षेपित किया। इस रॉकेट को फ्लोरिडा के केनेडी स्पेस सेंटर स्थित नासा के ऐतिहासिक प्रक्षेपण पैड 39ए से लॉन्च किया गया। स्पेस एक्स कंपनी के संस्थापक एलन मस्क ने विश्व के सर्वाधिक शक्तिशाली व्यवसायिक रॉकेट के साथ एक लाल टेस्ला रोडस्टर भी भेजी है। इस कार में एक स्पेस सूट पहने पुतले को बांध कर रखा गया है। इस कार में तीन कैमरे भी लगाए गए हैं। कैमरों के माध्यम से अंतरिक्ष के सुंदर चित्रों को लिया जा सकता है। मस्क का कहना है कि फॉल्कन हैवी डेल्टा प्ट हैवी की लागत के एक-तिहाई लागत में ही कार्य कर लेता है। ये गुण इसे हैवी लिफ्ट रॉकेट्स की प्रतियोगिता में शीर्ष पर रखता है। जिसे ‘‘स्टारमैन’’ नाम दिया गया है।

उल्लेखनीय है कि इस रॉकेट से पहले सैटर्न-5 को सर्वाधिक शक्तिशाली रॉकेट माना जाता था। अमेरिका का ये कीर्तिमान इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसका भार 63.8 टन है। बताया जा रहा है कि इस रॉकेट का भार दो स्पेस शटल के भार के बराबर है। यह रॉकेट 230 फुट लंबा है, जिसमें 27 इंजन लगे हैं। अमेरिका में यह पहली बार हुआ है कि किसी रॉकेट को सरकारी सहायता के बिना बनाया गया है।

इस प्रक्षेपण को एक तरह से नए, बड़े रॉकेट की परीक्षा के रूप में लिया जा रहा है जिसमें यह पता करना था कि बड़ी सैटेलाइट्स तथा यंत्रों को चांद, मंगल या अन्य किसी दूर स्थित बिंदु तक ले जाया जा सकता है या नहीं। सभी बूस्टर्स में से दो जिनका पिछले प्रक्षेपणों के बाद नवीनीकरण किया गया थाµकुछ समय पश्चात् ही केप केनवरल में वापस आ गए।

फॉल्कन हैवी विश्व का सर्वाधिक शक्तिशाली रॉकेट है जिसमें तीन फर्स्ट-स्टेज बूस्टर्स लगे हैं जो कि 27 इंजनों के साथ आपस में बंधे हैं इसका आधार 40 फीट (12 मीटर) तथा लंबाई 230 फीट (70 मीटर) है। एलन मस्क ने अपनी लाल टेस्ला रोडस्टर कार इसमें रख दी है, जिसमें तीन कैमरे लगे हैं जो कि चित्रा भेजते रहेंगे। मस्क के अनुसार, यह कार कई बार मंगल ग्रह के पास पहुंचेगी और बहुत कम संभावना है कि यह मंगल ग्रह पर चली जाए।

नासा के पूर्व अंतरिक्ष यात्राी लिरॉय चिआओ का कहना है कि यदि आप कोई सैटेलाइट प्रक्षेपित करना चाहते हैं तो आपको इतने बड़े रॉकेट की आवश्यकता नहीं होगी क्योंकि सैटेलाइट इतने बड़े आकार की नहीं होती। आपको इतने बड़े रॉकेट को तभी उपयोग करने की आवश्यकता हो सकती है जब आपको कुछ बहुत दूरी पर प्रक्षेपित करना हो, जैसे कि मंगल ग्रह।

 

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गृह मंत्रालय के कार्यों की समीक्षा हेतु तीन सदस्यीय समिति का गठन

गृह मंत्रालय के कार्यों की समीक्षा हेतु तीन सदस्यीय समिति का गठन

मधुकर गुप्ता के नेतृत्व वाली तीन सदस्यीय समिति का निर्माण गृह मंत्रालय द्वारा किया गया। यह कमेटी गृह मंत्रालय के कामों की समीक्षा करेगी, इसके द्वारा परिपालित कानूनों का अध्ययन करेगी तथा ऐसे मार्गों के सुझाव देगी जिनके द्वारा संस्थानों को एजेंसी बनाया जा सके तथा पुलिस और केंद्रीय बलों पर नियंत्राण किया जा सके। इस समिति में सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी अर्चना रामसुंदरम तथा अजय साहनी (द्वंद्व प्रबंधन संस्थान के निदेशक सदस्य के तौर पर हैं), गृह मंत्रालय की संस्थागत संरचना से संबंधित सभी पहलुओं का अध्ययन करेंगे जैसे कि कानून, वित्त, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी जानकारी का प्रवाहित होना, समन्वयीकरण तथा देश की सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियों से संबंधित आवश्यकता का भी अध्ययन करेंगे जैसे कि साइबर सुरक्षा तथा तकनीकी विकास। पैनल मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों को उनके क्षेत्रा से जुड़े कामों को बेहतर करने के लिए नए तंत्रों का सुझाव देगा जिससे ये अधिकारी अपने समय को सामरिक महत्व के बड़े कार्यों में लगा सकें।

यह गृह मंत्रालय के उन क्रियाकलापों का अध्ययन भी करेंगे जिसमें सशक्त विधि की बुनियाद की आवश्यकता है तथा यदि आवश्यक हो तो विधि में परिवर्तनों का भी सुझाव देंगे।

कृषि अपशिष्ट से अधिक जैव-ईंधन उत्पन्न करेगा जीन रूपांतरित फंगस

नई दिल्ली में एक प्रयोगशाला में किए गए शोधकार्य के परिणामस्वरूप भारत के जैव-ईंधन के उत्पादन के प्रयत्नों को सहायता मिल सकती है। इंटरनेशनल सेंटर फॉर जेनेटिक इंजीनियरिंग एंड बायोटेक्नोलॉजी के शोधकर्मियों ने व्यवसायिक रूप से प्रयुक्त किए जाने वाले कवक के जीनोम में इस प्रकार का अंतर उत्पन्न किया जिससे यह उस एंजाइम के उत्पादन में वृद्धि करेगा जो कि सेल्युलोस को सरल फरमंटेबल शर्करा में बदल देता है। यह खोज महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे कृषि अपशिष्ट जैसे कि चावल तथा गेहूं के पुआल, जिनको जलाने के कारण उत्तर भारत में वायु प्रदूषण अपने शीर्ष पर पहुंच जाता है, का उपयोग किया जा सकेगा भारत प्रतिवर्ष 500 मिलियन टन कृषि अपशिष्ट का उत्पादन करता है।

वैज्ञानिकों ने कवक पेनिसिलियम फ्यूनिक्यूलोसम के एक कंट्रोल मैकेनिज्म को बाधित कर दिया। यह मैकेनिज्म इसकी मेटाबॉलिक क्रियाओं को नियंत्रित करता है। इस मैकेनिज्म जिसे कार्बन कैटाबॉलिक रिप्रेशन कहा जाता है, को बाधित करने से वैज्ञानिकों ने उस एंजाइम के उत्पादन मे बढ़ोत्तरी कर ली जोकि सेल्युलोस को शर्करा में परिवर्तित करती है और इस प्रकार से जैव-ईंधन के उत्पादन में भी वृद्धि प्राप्त की जा सकी।

यह जैव-ईंधन में प्रयुक्त एंजाइम का एक बेहतर विकल्प हो सकता है और सभी प्रकार के कृषि अपशिष्ट के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है। अब तक प्रयुक्त होने वाली तकनीक से सेल्यूलोस के सिर्फ 60-65 प्रतिशत को शर्करा में बदला जा सकता था, परन्तु नई प्रक्रिया का इस्तेमाल करते हुए 80-85 प्रतिशत सेल्युलोस को शर्करा में परिवर्तित किया जा सकेगा। इस कवक पर वर्ष 2009 से काम किया जा रहा था। इस कवक को इसलिए चुना गया क्योंकि ‘ट्राइकोडर्मा रीसाई’ कवक से पांच गुना अधिक सक्रिय एंजाइम का उत्पादन करता है।

भगोड़ा आर्थिक अपराधी अध्यादेश, 2018

भगोड़ा आर्थिक अपराधी अध्यादेश 2018 को राष्ट्रपति ने 21 अप्रैैल, 2018 को मंजूरी प्रदान कर दी जिससे अब यह लागू हो गया है। इसमें आर्थिक अपराध कर देश से भाग गए व्यक्तियों की संपत्ति पर मुकदमें का निर्णय आए बिना जब्त करने और उसे बेच कर कर्ज देने वालों का पैसा वापस करने का प्रावधान है। उल्लेखनीय है कि भगोड़ा आर्थिक अपराधी विधेयक को 12 मार्च, 2018 को लोकसभा में पेश किया गया था, लेकिन संसद में विभिन्न मुद्दों को लेकर गतिरोध के चलते इसे पारित नहीं किया जा सका।

भगोड़ा आर्थिक अपराधी वह है जिसके विरुद्ध किसी अपराध (अनुसूची में दर्ज) के संबंध में गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया है। इसके अतिरिक्त उस व्यक्ति ने (i) मुकदमे से बचने के लिए देश छोड़ दिया है, या (ii) मुकदमे  का सामना करने के लिए देश लौटने से मना कर दिया है। अनुसूची में दर्ज अपराधों में कुछ अपराध निम्नलिखित हैंः

(i) नकली सरकारी स्टाम्प या करंसी बनाना; (ii) पर्याप्त धन न होने पर चेक का भुनाया न जाना; (iii) मनी लांड्रिग; और (iv) क्रेडिटर्स के साथ धोखाधड़ी वाले लेन-देन करना। विधेयक केंद्र सरकार को अधिसूचना के माध्यम से इस अनुसूची में संशोधन की अनुमति देता है।

अध्यक्ष या उपाध्यक्ष (प्रिवेंशन ऑफ मनी लांड्रिग एक्ट, 2002 के अंतर्गत नियुक्त) किसी व्यक्ति को भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित करने के लिए विशेष अदालत (2002 अधिनियम के अंतर्गत नामित) में आवेदन दायर कर सकते हैं। इस आवेदन में निम्नलिखित सम्मिलित किया जाएगाः (i) किसी व्यक्ति को भगोड़ा आर्थिक अपराधी मानने के कारण; (ii) भगोड़े अपराधी के ठिकाने की कोई सूचना; (iii) ऐसी संपत्तियों की सूची जिन्हें अपराध की आय माना जा सकता है और जिनकी जब्ती का प्रयास किया जा रहा है; (iv) बेनामी संपत्तियों या विदेशी संपत्तियों की सूची, जिनकी जब्ती का प्रयास किया जा रहा है; और (v) ऐसे लोगों की सूची जिनके हित इन संपत्तियों से जुड़े हुए हैं।

आवेदन मिलने के बाद विशेष अदालत ऐसे व्यक्ति को नोटिस जारी करेगी, (i) जिसमें उससे छह हफ्ते के भीतर निर्दिष्ट स्थान पर मौजूद होने की अपेक्षा की जाएगी, और (ii) यह कहा जाएगा कि उस स्थान पर मौजूद न होने पर उसे भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित कर दिया जाएगा। अगर वह व्यक्ति निर्दिष्ट स्थान पर उपस्थित हो जाता है तो विशेष अदालत विधेयक के प्रावधानों के अंतर्गत अपनी कार्यवाहियों को पूरा करेगी। अध्यक्ष या उपाध्यक्ष विशेष अदालत की अनुमति के साथ आवेदन में उल्लिखित किसी संपत्ति को कुर्क कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त अगर ये अधिकारी 30 दिनों के भीतर अदालत में आवेदन दायर कर दें तो विशेष अदालत की अनुमति लेने से पहले ही किसी संपत्ति को अस्थायी रूप से कुर्क कर सकते हैं। यह कुर्की 180 दिनों तक जारी रहेगी, अगर विशेष अदालत इस अवधि को आगे न बढ़ा दे। अगर कार्यवाही के अंत में व्यक्ति भगोड़ा आर्थिक अपराधी नहीं पाया जाता, तो उसकी संपत्ति को मुक्त कर दिया जाएगा। विशेष अदालत आवेदन पर सुनवाई के बाद किसी व्यक्ति को भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित कर सकती है। वह उन संपत्तियों को जब्त कर सकती हैः (i) जो भारत में या विदेश में बेनामी संपत्ति हो, और (iii) इसके अतिरिक्त भारत या विदेश में कोई अन्य संपत्ति भी जब्त की जा सकती है। जब्ती के बाद संपत्ति के सभी अधिकार और टाइटिल केंद्र सरकार में निहित होंगे लेकिन केंद्र सरकार संपत्ति से जुड़ी सभी देनदारियों से मुक्त होगी (जैसे संपत्ति पर कोई शुल्क)। केंद्र सरकार इन संपत्तियों के प्रबंधन या निस्तारण के लिए एक प्रशासक को नियुक्त करेगी।

विधेयक सिविल अदालत या ट्रिब्यूनल को इस बात की अनुमति देता है कि वे किसी ऐसे व्यक्ति को सिविल दावा दायर करने या अपनी सफाई देने की अनुमति न दे जिसे भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित किया गया है।

इस विधेयक ने अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को सिविल अदालत के समान ही शक्तियां प्रदान की हैं। इन शक्तियों में निम्नलिखित शामिल हैंः (i) यह मानकर किसी स्थान में प्रवेश करना कि व्यक्ति भगोड़ा आर्थिक अपराधी है और (ii) यह निर्देश देना कि किसी इमारत की तलाशी ली जाए, या दस्तावेजों को जब्त किया जाए। यदि कोई व्यक्ति विशेष अदालत के आदेशों से असंतुष्ट है और आदेशों के खिलाफ अपील करना चाहता है तो वह उच्च न्यायालय में अपील कर सकता है।

आपराधिक विधि (संशोधन) अध्यादेश, 2018

बारह वर्ष से कम आयु की बालिकाओं के साथ बलात्कार करने पर मृत्युदंड की सजा का प्रावधान करने वाले आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश को राष्ट्रपति ने 21 मार्च, 2018 को मंजूरी प्रदान कर दी। इस अध्यादेश के माध्यम से बाल यौन अपराध संरक्षण कानून (पोक्सो) 2012 सहित भारतीय दण्ड संहिता, आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 में भी सख्त बदलाव किए गए हैं।

अध्यादेश के मुख्य प्रावधान इस प्रकार हैंः

* दुष्कर्म के लिए न्यूनतम सजा को 10 वर्ष किया गया है।

* 16 वर्ष से कम आयु की महिला/युवती के साथ दुष्कर्म करने पर न्यूनतम 20 वर्ष की सजा का प्रावधान।

* 12 वर्ष से कम आयु की लड़की के साथ दुष्कर्म करने पर सश्रम कठोर कारावास सहित न्यूनतम 20 वर्ष की सजा और अधिकतम मृत्युदण्ड और आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान।

* पीड़ित के पुनर्वास और चिकित्सकीय खर्चों को पूरा करने के लिए त्वरित एवं न्यायपरक जुर्माना आरोपित करने का प्रावधान।

* पुलिस अधिकारी द्वारा कहीं भी दुष्कर्म करने पर न्यूनतम 10 वर्ष का कठोर कारावास का प्रावधान।

* दुष्कर्म के मामलों में जांच दो माह में पूरी हो जानी चाहिए।

* 16 वर्ष से कम आयु की युवती से दुष्कर्म के आरोपी को अग्रिम जमानत नहीं दिए जाने का प्रावधान।

* दुष्कर्म के मामलों में अपील को छह महीनों में निपटा दिया जाएगा।

भारतीय दण्ड संहिता में संशोधनः

* आईपीसी की धारा 376 में संशोधन करके दुष्कर्म के लिए न्यूनतम कारावास को 7 वर्ष से बढ़ाकर 10 वर्ष कर दिया गया है। अधिकतम सजा आजीवन कारावास ही बनी रहेगी।

* आईपीसी की धारा 376 में एक नई उपधारा (3) जोड़ी गई है, जो 16 वर्ष से कम आयु की महिला/युवती के साथ दुष्कर्म करने पर न्यूनतम सजा को बीस वर्ष करता है।

* एक नई धारा 376AB को जोड़ा गया है जो प्रावधान करती है कि 12 वर्ष से कम आयु की बालिका के साथ दुष्कर्म करने पर न्यूनतम 20 वर्ष का कठोर कारावास दिया जाएगा और ऐसे व्यक्ति को मृत्युदंड भी दिया जा सकता है।

* धारा 376DA और 37DB प्रावधान करती है कि 16 वर्ष की आयु और 12 वर्ष की आयु से कम आयु की बालिका से सामूहिक बलात्कार में संलग्न व्यक्ति को न्यूनतम आजीवन कारावास की सजा दी जाएगी।

* 12 वर्ष से कम आयु की बालिका से सामूहिक दुष्कर्म में लिप्त व्यक्तियों के लिए मृत्युदण्ड का भी प्रावधान किया गया है।

* धारा 376(2)(a) में उल्लिखित वाक्य ‘‘पुलिस थाने की सीमा के भीतर जहां उसे नियुक्त किया गया है’’ को हटा दिया गया है। इसमें यह जोड़ा गया है कि पुलिस अधिकारी द्वारा किसी भी स्थान पर दुष्कर्म करने पर उसे न्यूनतम 10 वर्ष का कठोर कारावास दिया जाएगा।

अपराध प्रक्रिया संहिता में संशोधनः

* पुलिस थाने में दर्ज प्राथमिकी की तिथि से तीन माह के भीतर दुष्कर्म मामलों से संबंधित जांच पूरी कर ली जानी चाहिए।

* एक उपधारा जोड़कर प्रावधान किया गया है कि दुष्कर्म मामलों में अपील का निपटारा छह माह के भीतर किया जाएगा।

* 16 वर्ष से कम आयु की महिला के साथ बलात्कार के आरोपी व्यक्ति को अग्रिम जमानत नहीं दी जाएगी।

* धारा 439 में एक उपधारा जोड़ी गई है जो प्रावधान करती है कि 16 वर्ष से कम आयु की युवती से दुष्कर्म के आरोपी व्यक्ति की जमानत हेतु आवेदन की सुनवाई करते समय सूचना देने वाला या उसके द्वारा अधिकृत व्यक्ति की मौजूदगी अनिवार्य होगी।

पोस्को अधिनियम व साक्ष्य अधिनियम में संशोधनः

पोस्को अधिनियम की धारा 42 में संशोधन करके आईपीसी की नई धाराओं 376AB, 376DA, और 376DBको जोड़ा गया है। साक्ष्य अधिनियम की धारा 53, जो चरित्रा के प्रमाण या पूर्व यौन अनुभव के बारे में है, को भी आईपीसी की नवीन धाराओं  जोड़कर संशोधित किया गया है।

 

विभिन्न सांविधिक,अर्द्धन्यायिक एवं अन्य निकाय (भाग-9)

पर्यावरण संबंधी निकाय

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) का गठन एक संविधिक संगठन के रूप में जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के अंतर्गत सितंबर, 1974 में किया गया था। इसके पश्चात् केंद्रीय प्रदूषण नियंत्राण बोर्ड को वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 के अंतर्गत शक्तियां व कार्य सौंपे गये।

यह क्षेत्रा निर्माण के रूप में कार्य करता है तथा पर्यावरण (सुरक्षा) अधिनियम, 1986 के प्रावधानों के अंतर्गत पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को तकनीकी सेवाएं भी उपलब्ध करता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्राण बोर्ड के प्रमुख कार्य जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्राण) अधिनियम, 1974 तथा वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 में व्यक्त किये गये हैं। (1) जल प्रदूषण के निवारण एवं नियंत्रण द्वारा राज्यों के विभिन्न क्षेत्रों में कुओं और सरिताओं की स्वच्छता को सुधारना तथा (2) देश में वायु प्रदूषण के निराकरण अथवा नियंत्रण, निवारण के लिए वायु गुणवत्ता में सुधार लाना।

वायु गुणवत्ता प्रबोधन वायु गुणवत्ता प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण अंग है। राष्ट्रीय वायु प्रबोधन कार्यक्रम (रावप्रका) की स्थापना वर्तमान वायु गुणवत्ता की स्थिति और प्रवृत्ति को सुनिश्चित करने तथा उद्योगों और अन्य òोतों के प्रदूषण को नियमित कर नियंत्रित करने तथा वायु गुणवत्ता मानकों के अनुरूप रखने के उद्देश्य से की गई है। यह औद्योगिक स्थापना तथा शहरों की योजना तैयार करने के लिए अपेक्षित वायु गुणवत्ता के आंकड़ों की पृष्ठभूमि भी उपलब्ध कराता है।

इसके अलावा केंद्रीय बोर्ड का नई दिल्ली स्थित एक स्वचालित प्रबोधन केंद्र भी है। इस केंद्र पर श्वसन निलम्बित व्यक्ति कण, कार्बन मोनो ऑक्साइड, ओजोन, सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइ ऑक्साइड तथा निलम्बित विविक्त कण भी नियमित रूप से प्रबोधित किये जा रहे हैं।

स्वच्छ जल खेती-बाड़ी, उद्योगों में प्रयोग के लिए वन्य जीव तथा मत्स्य पालन के प्रजनन तथा मानव के अस्तित्व के लिए एक चिर स्थाई संसाधन आवश्यक है। भारत नदियों वाला देश है। यहां 14 प्रमुख नदियों, 44 मझोली नदियों और 55 छोटी नदियों के अलावा काफी संख्या में झीलें, तालाब तथा कुएं हैं, जिनका प्रयोग प्राथमिक रूप से बिना उपचार किये पीने के लिए किया जाता है। सामान्य तौर पर अधिकतर नदियां मानसून के दौरान भरी रहती हैं जो वर्ष के केवल तीन माह तक सीमित रहती हैं, प्रायः शेष समय में ये सूखी ही रहती हैं और उद्योगों अथवा शहरों/कस्बों से विसर्जित अपशिष्ट जल ही ले जाती हैं, जो हमारे सीमित जल संसाधनों की गुणवत्ता को खतरे में डालती है। भारतीय संसद ने हमारे जल निकायों की स्वास्थ्यप्रदाता को बरकरार रखने तथा सुरक्षित रखने के विचार से जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 बनाया। जल प्रदूषण से संबंधित तकनीकी तथा सांख्यिकीय आंकड़ों को एकत्रा करना, मिलाना तथा उसका प्रसारण करना केंद्रीय बोर्ड का एक अधिदेश है। इसलिए जल गुणवत्ता का प्रबोधन तथा निगरानी इसकी सबसे महत्वपूर्ण गतिविधि है।

संगठनात्मक संरचनाः

बोर्ड में एक पूर्णकालिक अध्यक्ष होता है, जिसे पर्यावरणीय संरक्षण से सम्बद्ध मामलों में विशेष ज्ञान या अनुभव हो या ऐसा व्यक्ति जिसे उपरिलिखित मामलों के साथ संस्था के प्रशासनिक कार्यों का ज्ञान या अनुभव हो, जिसे केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता है; पांच से अनधिक सदस्य केंद्र सरकार द्वारा, उसका प्रतिनिधित्व करने वाले, नामित किए जाते हैं; केंद्र सरकार द्वारा राज्य बोर्डों में से पांच से अनधिक सदस्य नामित किए जाते हैं; केंद्र सरकार द्वारा कृषि, मत्स्य या उद्योग या व्यापार या अन्य हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले तीन से अनधिक गैर-सरकारी सदस्यों को नामित किया जाता है; केंद्र सरकार के स्वामित्व, नियंत्राण एवं प्रबंधन वाले निगमों एवं कंपनियों का प्रतिनिधित्व करने वाले दो व्यक्तियों को केंद्र सरकार द्वारा नामित किया जाता है; केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त एक पूर्णकालिक सदस्य-सचिव जिसे प्रदूषण नियंत्राण के वैज्ञानिक, अभियांत्रिकी या प्रबंधन पहलुओं की योग्यता, ज्ञान एवं अनुभव हो।

सीपीसीबी के दायित्व एवं कार्य

* भारत सरकार को जल एवं वायु प्रदूषण के निवारण एवं नियंत्रण तथा वायु गुणवत्ता में सुधार से संबंधित किसी भी विषय में परामर्श देना।

* जल तथा वायु प्रदूषण की रोकथाम अथवा निवारण एवं नियंत्रण के लिए एक राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम की योजना तैयार कर तथा उसे निष्पादित कराना।

* राज्य बोर्डों की गतिविधियों का समन्वयन करना तथा उनके बीच उत्पन्न विवादों को सुलझाना।

* राज्य बोर्डों को तकनीकी सहायता व मार्गदर्शन उपलब्ध कराना, वायु प्रदूषण से संबंधित समस्याओं तथा उसके निवारण, नियंत्राण अथवा उपशमन के लिए अनुसंधान और उसके उत्तरदायी कारणों की खोज करना।

* जल तथा वायु प्रदूषण के निवारण तथा नियंत्रण अथवा उपशमन के कार्यक्रम में संलग्न व्यक्तियों के लिए प्रशिक्षण आयोजित करना तथा योजनाएं तैयार करना।

* जल तथा वायु प्रदूषण की रोकथाम अथवा नियंत्रण, निवारण पर एक विस्तृत जन-जागरूकता कार्यक्रम, मास मीडिया के माध्यम से आयोजित करना।

* जल तथा वायु प्रदूषण और उसके प्रभावी निवारण, नियंत्राण अथवा रोकथाम के लिए किये गये उपायों के संबंध में तकनीकी तथा सांख्यिकीय आंकड़ों को संग्रहीत, संकलित कर प्रकाशित करना।

* स्टैक गैस क्लीनिंग डिवाइसिस, स्टैक्स और डक्टस सहित सहित मल-जल तथा व्यावसायिक बहिòावों के विसर्जन तथा शोधन के संबंध में नियमावली, आचार संहिता और दिशा-निर्देश तैयार करना।

* जल तथा वायु प्रदूषण तथा उनके निवारण तथा नियंत्रण से संबंधित मामलों में सूचना का प्रसार करना।

* संबंधित राज्य सरकारों के परामर्श से नदियों अथवा कुओं के लिए मानकों को निर्धारित करना तथा वायु गुणवत्ता के लिए मानक तैयार करना, निर्धारित करना, संशोधित करना अथवा रद्द करना।

* भारत सरकार द्वारा निर्धारित किये गये अन्य कार्य निष्पादित करना।

संघ शासित प्रदेशों के लिए राज्य बोर्डों के रूप में केंद्रीय बोर्ड के कार्यः

* किसी परिसर की उपयुक्तता अथवा किसी उद्योग की अवस्थिति जिससे किसी नदी अथवा कुएं प्रदूषित हो रहे हैं, अथवा उनसे वायु प्रदूषण की संभावना हो, के विषय में संघ शासित प्रदेश की सरकारों को सलाह देना।

* सीवेज के शोधन तथा व्यावसायिक बहिòावों तथा ऑटोमोबाइल्स के उत्सर्जनों, औद्योगिक संयंत्रों तथा अन्य किसी प्रदूषणकारी òोतों के लिए मानकों का निर्धारण करना।

* सीवेज और व्यावसायिक बहिòावों का भूमि पर विसर्जन।

* सीवेज और व्यावसायिक बहिòाव तथा वायु प्रदूषण नियंत्रण उपस्करों हेतु विश्वसनीय और किफायती विधियों का उपयुक्त विकास, वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 के अंतर्गत अधिसूचित क्षेत्रों अथवा केंद्र शासित प्रदेशों के क्षेत्रों में वायु प्रदूषण नियंत्रण क्षेत्रा के रूप में अथवा किसी क्षेत्रा का पता लगाना।

* परिवेशी जल तथा वायु की गुणवत्ता का मूल्यांकन करना, तथा अपशिष्ट जल शोधन स्थापनाओं, वायु प्रदूषण नियंत्राण उपकरणों, औद्योगिक संयंत्रों अथवा विनिर्माण प्रक्रियाओं का निरीक्षण करना तथा जल तथा वायु प्रदूषण की रोकथाम तथा निवारण व नियंत्रण के लिए उठाये गये कदमों तथा उनकी निष्पादन क्षमता का मूल्यांकन करना।

भारत सरकार की निर्धारित नीति के अनुसार केंद्रीय प्रदूषण नियंत्राण बोर्ड ने जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974, जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्राण) उपकर अधिनियम, 1977 तथा वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्राण) अधिनियम, 1981 के अंतर्गत संघ शासित प्रदेशों के विषय में अपनी शक्तियां तथा कार्य संबंधित स्थानीय प्रशासनों को प्रत्यायोजित कर दी हैं। केंद्रीय बोर्ड अपने प्रतिपक्षों राज्य प्रदूषण नियंत्राण बोर्डों के साथ पर्यावरणीय प्रदूषण के नियंत्रण तथा निवारण से संबंधित विधानों के कार्यान्वयन के लिए उत्तरदायी है।

सीपीसीबी का मूल्यांकनः

भारतीय प्रबंधन संस्थान, लखनऊ ने 2011 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्राण बोर्ड (सीपीसीबी) हेतु भविष्य के लिए व्यवसाय योजना तैयार करने पर ध्यान केंद्रित करते हुए एक अध्ययन कराया और योजना की प्राप्ति के लिए संगठनात्मक क्षमताओं, शक्तियों एवं कमजोरियों का मूल्यांकन किया।

अध्ययन के अनुसार, सीपीसीबी के पास प्रदूषण नियंत्रण की पर्याप्त शक्ति नहीं है और इसके कार्य को करने के लिए इसके पास पर्याप्त संसाधन और आधारभूत ढांचा नहीं है। यद्यपि सीपीसीबी और सम्बद्ध राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एसपीसीबी) दो स्वतंत्रा संस्थान हैं, इन्हें संयुक्त रूप से सहयोगात्मक तरीके से कार्य करने की जरूरत है। प्रदूषण नियंत्रण एवं कमी पर सीपीसीबी के कार्य का प्रभाव व्यापक रूप से एसपीसीबी की क्षमता एवं कार्य पर निर्भर करता है। सीपीसीबी को राज्य बोर्डों के शासन में अपना हिस्सा रखना चाहिए। इस उद्देश्य के लिए, सभी एसपीसीबी के गवर्निंग बोर्डों में सीपीसीबी का आवश्यक रूप से प्रतिनिधित्व होना चाहिए। वर्तमान में इस तथ्य को त्रिपुरा में अपनाया जा रहा है।

वर्तमान में नियमित अंतराल पर पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा सीपीसीबी की निष्पादन समीक्षा का कोई अंतनिर्मित तंत्रा नहीं है। समीक्षा में सीपीसीबी की निष्पादन बजटिंग और परिप्रेक्ष्य नियोजन दोनों शामिल होना चाहिए।

यह भी वांछनीय है कि सीपीसीबी को धन के लिए पर्यावरण एवं वन मंत्रालय पर अपनी निर्भरता को कम करना चाहिए और अन्य मार्गों को तलाशना चाहिए।

सीपीसीबी के क्षेत्राीय कार्यालयों को एसपीसीबी के साथ काम करने का एक विस्तारित तंत्रा माना जाता है। एक अविलंब उपाय के तौर पर, मौजूदा क्षेत्राीय कार्यालयों को अधिक मानव एवं आधारिक संसाधन मुहैया कराकर मजबूत किया जाना चाहिए।

सामान्य तौर पर, विगत् वर्षों के दौरान प्रदूषण नियंत्रण रणनीतियां विनियमन पर आधारित रही हैं। तकनीकियों या स्टेकहोल्डर्स को व्यापक सूचना पर आधारित रणनीतियों पर अपर्याप्त बल दिया गया है। सीपीसीबी को नवीन कम लागत पर स्वच्छ तकनीकियों को विकसित करने में अधिक सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।

विभिन्न सांविधिक,अर्द्धन्यायिक एवं अन्य निकाय (भाग-8)

जीव संरक्षण निकाय

भारतीय पशु कल्याण बोर्ड

भारतीय पशु कल्याण बोर्ड, विश्व में अपनी तरह का प्रथम संगठन है। जिसकी स्थापना पशु हिंसा रोकथाम अधिनियम, 1960 के तहत् 1962 में की गई और इसका मुख्यालय चेन्नई में अवस्थापित किया गया।

बोर्ड का गठन 28 सदस्यों द्वारा किया जाता है जिसमें एक अध्यक्ष; एक उपाध्यक्ष; एक वन महानिरीक्षक; पशुपालन आयुक्त; गृह मंत्रालय और मानव संसाधन मंत्रालय प्रत्येक से एक-एक प्रतिनिधि; लोक सभा से 4 सदस्य; राज्यसभा से 4 सदस्य; मानवतावादी विषयों से संबंधित तीन सदस्य; एवं अन्य सदस्य।

बोर्ड के कृत्यः

* निरंतर अध्ययन के तहत् पशुओं के खिलाफ हिंसा रोकने वाले भारत में प्रवृत्त कानूनों से अद्यतन रहना और समय-समय पर इनमें संशोधन करने का सरकार को सुझाव देना।

* केंद्र सरकार को पशुओं की अनावश्यक पीड़ा या परेशानी रोकने के संदर्भ में नियम बनाने का परामर्श करना।

* भार ढोने वाले पशुओं के बोझ को कम करने के लिए केंद्र सरकार या स्थानीय प्राधिकरण या अन्य व्यक्ति को पशुओं द्वारा चालित वाहनों के डिजाइन में सुधार करना।

* केंद्र सरकार को पशुओं के अस्पताल में प्रदान की जाने वाली चिकित्सकीय देखभाल एवं ध्यान से सम्बद्ध मामलों पर परामर्श देना और जब कभी बोर्ड जरूरी समझे पशु अस्पतालों को वित्तीय एवं अन्य मदद मुहैया कराना।

* वित्तीय मदद एवं अन्य तरीके से पिंजरा, शरणगाहों, पशु शेल्टर, अभ्यारण्य इत्यादि के निर्माण या अवस्थापना को बढ़ावा देना जहां पशुओं एवं पक्षियों को शरण मिल सके जब वे वृद्ध हो जाते हैं एवं बेकार हो जाते हैं या जब उन्हें संरक्षण की जरूरत होती है।

* किसी भी ऐसे मामले पर जो पशु कल्याण या पशुओं पर अनावश्यक पीड़ा एवं हिंसा से सम्बद्ध हो, केंद्र सरकार को परामर्श देना।

केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण

भारत में, चिड़ियाघरों के कृत्यों का विनियमन वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम के तहत् गठित केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण द्वारा किया जाता है। प्राधिकरण में एक अध्यक्ष, दस सदस्य एवं एक सदस्य सचिव होता है। प्राधिकरण का मुख्य उद्देश्य वन्य जीव के संरक्षण में राष्ट्रीय प्रयास को पूरा करना है।

प्राधिकरण की भूमिका विनियामक की अपेक्षा सुसाध्य बनाने की है। इसलिए, यह ऐसे चिड़ियाघरों को तकनीकी एवं वित्तीय मदद प्रदान करता है जिनमें वन्य जीव प्रबंधन के इच्छित मानक प्राप्त करने की क्षमता है।

प्राधिकरण ने इसके गठन के समय से कुछ मुख्य कदम उठाए हैं जिसमें जैव-प्रौद्योगिकी में अनुसंधान जारी रखने के लिए हैदराबाद में संकटापन्न जीवों के संरक्षण हेतु एक प्रयोगशाला की स्थापना करना, लाल पांडा के नियोजित प्रजनन एवं वनों में इनकी संख्या फिर से सामान्य करना, कुछ खास पशु संस्थानों में रोगों की पहचान हेतु रोग पहचान सुविधाओं का उन्नयन करना।

प्राधिकरण के कृत्यः

* चिड़ियाघर में रखे जाने वाले जीवों की देखभाल के लिए उनके आवासों के न्यूनतम मानकों को विशिष्टीकृत करना;

* संस्तुत मानकों एवं मापदंडों के संदर्भ में चिड़ियाघरों के कार्यकरण का मूल्यांकन एवं आकलन करना;

* चिड़ियाघरों को मान्यता प्रदान करना या उनकी मान्यता रद्द करना;

* निरंतर संकटापन्न जीवों के प्रजनन के उद्देश्य को पूरा करने हेतु उनकी पहचान करना और इसकी जिम्मेदारी चिड़ियाघर को सौंपना;

* प्रजनन उद्देश्य हेतु पशुओं के प्रापण, विनिमय, एवं लोनिंग का समन्वय करना;

* चिड़ियाघर में रखे गए जानवरों के प्रदर्शन से सम्बद्ध प्राथमिकताओं एवं थीम्स की पहचान करना;

* भारत में एवं भारत के बाहर चिड़ियाघर कार्मिकों के प्रशिक्षण का समन्वय करना;

* चिड़ियाघरों के उद्देश्य से संरक्षा प्रजनन और शैक्षिक कार्यक्रमों में अनुसंधान का समन्वय करना।

विभिन्न सांविधिक,अर्द्धन्यायिक एवं अन्य निकाय (भाग-7)

शहरी विकास संबंधी निकाय

दिल्ली नगर कला आयोग

दिल्ली नगर कला आयोग (डीयूएसी) एक संविधिक निकाय है जिसकी स्थापना दिल्ली नगर कला आयोग अधिनियम, 1973 के अंतर्गत दिल्ली में शहरी तथा पर्यावरण अभिकल्प की सौंदर्यपरक विशिष्टता की रक्षा, विकास एवं रखरखाव करने के उद्देश्य से 1 मई, 1974 को केंद्रीय सरकार तथा तीन स्थानीय निकायों नामतः दिल्ली विकास प्राधिकरण, दिल्ली नगर निगम तथा नई दिल्ली नगर पालिका परिषद् के परामर्शी निकाय के रूप में हुई। आयोग; अध्यक्ष एवं अधिकतम चार अन्य सदस्यों से निर्मित है। सचिव, आयोग के सचिवालय के प्रमुख हैं।

आयोग द्वारा प्रस्तावों को दिल्ली नगर कला आयोग के अधिनियम की धारा 11 के अंतर्गत विचार किया जाना अपेक्षित है। इनमें जनपद, सामुदायिक केंद्र, रिहायशी परिसर, लुटियन बंगला जोन क्षेत्रा, कनॉट प्लेस परिसर, पुरानी दिल्ली क्षेत्रा, स्मारक स्थलों आदि का संरक्षण शामिल है। आयोग अण्डरपास, ग्रेड सेपरेटरों, विधि-सज्जा सामग्री आदि पर भी विचार करता है। जब स्थानीय निकाय निगम उपनियमों का अनुपालन सुनिश्चित करता है तो आयोग परियोजना के परिवेश के संदर्भ में उसकी सौन्दर्यपरक एवं व्यावहारिकता की दृष्टि से विचार करता है।

दिल्ली नगर कला आयोग के गठन के बाद के वर्षों में दिल्ली के क्षेत्राफल में काफी बढ़ोतरी हुई है और मकानों का सघनता के आधार पर निर्माण हुआ है, इससे मूल अधिदेश में सुपुर्द कार्यों की सार्थकता और भी अधिक बढ़ गई है। अब परिवेश और विरासत अति आवश्यक सरोकार बन गये हैं, तथा जहां निर्णयकारी निकायों की संख्या एक से अधिक हो, वहां समग्र शहर को एक सूत्रा में बांधे रखने में पहले की तुलना में अनेक कठिनाइयां पैदा हो रही हैं। ऐसी स्थिति में शहर के घटक तत्वों के भविष्य को लेकर एक विजन (संकल्पना) की महती आवश्यकता है।

आयोग का प्रमुख सरोकार, अगर 1970 के दशक में अनियंत्रित गगन चुम्बी निर्माणों के मुद्दों के बारे में था, और 1980 के दशक में एशियाई खेलों के आयोजन से जुड़े मुद्दों तथा 1990 के दशक में द्वारका के निर्माण एवं नई दिल्ली बंगला जोन क्षेत्रा को सुस्थिर-संतुलित बनाये रखने के सरोकारों को लेकर था, वहीं वर्तमान दशक के मुख्य सरोकार चार मुद्दोंµखुले हवादार परिसरों, नदी क्षेत्रों और वन क्षेत्रा को खतरे के शेष मामलों, ऐतिहासिक आबादी इलाकों में जीवन की गुणवत्ता, जीर्ण-शीर्ण व जर्जर इलाकों के सुरुचिपूर्ण कायाकल्प को सुनिश्चित करने की जरूरत तथा यातायात नेटवर्क (मार्गों) को मानवीय जीवन की रक्षा की खासियत के साथ अधिक सुविधाजनक बनाने की जरूरत को लेकर हैं।

आयोग के मुख्य क्रियाकलापः आयोग के मुख्य कार्य असंख्य समस्या/सरोकारों में विस्तीर्ण रहे हैं। आयोग ने नए मेट्रो मार्गों तथा राष्ट्रमंडल खेलों की परियोजनाओं तथा वर्तमान संस्थानों के विस्तारों की उनमें निहित पर्यावरण-परिवेश तथा ऐतिहासिक प्रतिवेश के संदर्भ में जांच परख की। शाहजहांनाबाद के कायाकल्प के उपायों की पहचान के लिए परस्परव्यापी कार्यदायरे वाली एजेंसियों से विचार-विमर्श किया। संरचनात्मक ढांचा सुलभ कराने के लिये आयोग द्वारा शुरू की गई अग्रगामी परियोजनाओं के अंतर्गत खिड़की गांव के प्रस्ताव तथा नई दिल्ली नगर पालिका परिषद की जोनल विकास योजना पर कार्यवाही के प्रस्ताव शामिल हैं। परिवहन-कॉरीडोरों (समर्पित मार्गों) के सुधार और विस्तार के अति आवश्यक मुद्दों और उनके समाधान पर काफी समय लगाकर सोच विचार किया गया है। दिल्ली के मास्टर प्लान पर चर्चा के लिये आयोग ने एक सेमिनार का आयोजन किया।

दिल्ली विकास प्राधिकरण

दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) की स्थापना दिल्ली के विकास को सुनिश्चित एवं प्रोत्साहित करने के लिए दिल्ली विकास अधिनियम, 1957 के प्रावधानों के तहत् 1957 में की गई।
प्राधिकरण में एक अध्यक्ष (दिल्ली का उपराज्यपाल एक्सऑफिशियो अध्यक्ष होता है), केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त एक उपाध्यक्ष, एक वित्त एवं लेखा सदस्य, एक इंजीनियर, दिल्ली नगर निगम के दो चयनित प्रतिनिधि, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्रा की विधानसभा के तीन प्रतिनिधि एवं केंद्र सरकार द्वारा नामित तीन अन्य सदस्य होते हैं।

प्राधिकरण का उद्देश्य योजनानुसार दिल्ली के विकास को सुनिश्चित एवं प्रोत्साहित करना है। इसके कार्य के लिए प्राधिकरण को किसी भूमि एवं संपत्ति को अधिगृहीत, रखने, रख-रखाव करने की शक्ति, भवन निर्माण, इंजीनियरिंग, खनन एवं अन्य कार्य करने की शक्ति, जलापूर्ति एवं विद्युत के संबंध में कार्य करने की शक्ति, सीवेज एवं अन्य सेवाओं एवं सुविधाओं को प्रदान करने की शक्ति एवं आमतौर पर कुछ भी जरूरी या महत्वपूर्ण कार्य करने की शक्ति जिससे दिल्ली के विकास का उद्देश्य पूरा होता है।