गृह मंत्रालय के कार्यों की समीक्षा हेतु तीन सदस्यीय समिति का गठन

गृह मंत्रालय के कार्यों की समीक्षा हेतु तीन सदस्यीय समिति का गठन

मधुकर गुप्ता के नेतृत्व वाली तीन सदस्यीय समिति का निर्माण गृह मंत्रालय द्वारा किया गया। यह कमेटी गृह मंत्रालय के कामों की समीक्षा करेगी, इसके द्वारा परिपालित कानूनों का अध्ययन करेगी तथा ऐसे मार्गों के सुझाव देगी जिनके द्वारा संस्थानों को एजेंसी बनाया जा सके तथा पुलिस और केंद्रीय बलों पर नियंत्राण किया जा सके। इस समिति में सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी अर्चना रामसुंदरम तथा अजय साहनी (द्वंद्व प्रबंधन संस्थान के निदेशक सदस्य के तौर पर हैं), गृह मंत्रालय की संस्थागत संरचना से संबंधित सभी पहलुओं का अध्ययन करेंगे जैसे कि कानून, वित्त, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी जानकारी का प्रवाहित होना, समन्वयीकरण तथा देश की सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियों से संबंधित आवश्यकता का भी अध्ययन करेंगे जैसे कि साइबर सुरक्षा तथा तकनीकी विकास। पैनल मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों को उनके क्षेत्रा से जुड़े कामों को बेहतर करने के लिए नए तंत्रों का सुझाव देगा जिससे ये अधिकारी अपने समय को सामरिक महत्व के बड़े कार्यों में लगा सकें।

यह गृह मंत्रालय के उन क्रियाकलापों का अध्ययन भी करेंगे जिसमें सशक्त विधि की बुनियाद की आवश्यकता है तथा यदि आवश्यक हो तो विधि में परिवर्तनों का भी सुझाव देंगे।

भगोड़ा आर्थिक अपराधी अध्यादेश, 2018

भगोड़ा आर्थिक अपराधी अध्यादेश 2018 को राष्ट्रपति ने 21 अप्रैैल, 2018 को मंजूरी प्रदान कर दी जिससे अब यह लागू हो गया है। इसमें आर्थिक अपराध कर देश से भाग गए व्यक्तियों की संपत्ति पर मुकदमें का निर्णय आए बिना जब्त करने और उसे बेच कर कर्ज देने वालों का पैसा वापस करने का प्रावधान है। उल्लेखनीय है कि भगोड़ा आर्थिक अपराधी विधेयक को 12 मार्च, 2018 को लोकसभा में पेश किया गया था, लेकिन संसद में विभिन्न मुद्दों को लेकर गतिरोध के चलते इसे पारित नहीं किया जा सका।

भगोड़ा आर्थिक अपराधी वह है जिसके विरुद्ध किसी अपराध (अनुसूची में दर्ज) के संबंध में गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया है। इसके अतिरिक्त उस व्यक्ति ने (i) मुकदमे से बचने के लिए देश छोड़ दिया है, या (ii) मुकदमे  का सामना करने के लिए देश लौटने से मना कर दिया है। अनुसूची में दर्ज अपराधों में कुछ अपराध निम्नलिखित हैंः

(i) नकली सरकारी स्टाम्प या करंसी बनाना; (ii) पर्याप्त धन न होने पर चेक का भुनाया न जाना; (iii) मनी लांड्रिग; और (iv) क्रेडिटर्स के साथ धोखाधड़ी वाले लेन-देन करना। विधेयक केंद्र सरकार को अधिसूचना के माध्यम से इस अनुसूची में संशोधन की अनुमति देता है।

अध्यक्ष या उपाध्यक्ष (प्रिवेंशन ऑफ मनी लांड्रिग एक्ट, 2002 के अंतर्गत नियुक्त) किसी व्यक्ति को भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित करने के लिए विशेष अदालत (2002 अधिनियम के अंतर्गत नामित) में आवेदन दायर कर सकते हैं। इस आवेदन में निम्नलिखित सम्मिलित किया जाएगाः (i) किसी व्यक्ति को भगोड़ा आर्थिक अपराधी मानने के कारण; (ii) भगोड़े अपराधी के ठिकाने की कोई सूचना; (iii) ऐसी संपत्तियों की सूची जिन्हें अपराध की आय माना जा सकता है और जिनकी जब्ती का प्रयास किया जा रहा है; (iv) बेनामी संपत्तियों या विदेशी संपत्तियों की सूची, जिनकी जब्ती का प्रयास किया जा रहा है; और (v) ऐसे लोगों की सूची जिनके हित इन संपत्तियों से जुड़े हुए हैं।

आवेदन मिलने के बाद विशेष अदालत ऐसे व्यक्ति को नोटिस जारी करेगी, (i) जिसमें उससे छह हफ्ते के भीतर निर्दिष्ट स्थान पर मौजूद होने की अपेक्षा की जाएगी, और (ii) यह कहा जाएगा कि उस स्थान पर मौजूद न होने पर उसे भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित कर दिया जाएगा। अगर वह व्यक्ति निर्दिष्ट स्थान पर उपस्थित हो जाता है तो विशेष अदालत विधेयक के प्रावधानों के अंतर्गत अपनी कार्यवाहियों को पूरा करेगी। अध्यक्ष या उपाध्यक्ष विशेष अदालत की अनुमति के साथ आवेदन में उल्लिखित किसी संपत्ति को कुर्क कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त अगर ये अधिकारी 30 दिनों के भीतर अदालत में आवेदन दायर कर दें तो विशेष अदालत की अनुमति लेने से पहले ही किसी संपत्ति को अस्थायी रूप से कुर्क कर सकते हैं। यह कुर्की 180 दिनों तक जारी रहेगी, अगर विशेष अदालत इस अवधि को आगे न बढ़ा दे। अगर कार्यवाही के अंत में व्यक्ति भगोड़ा आर्थिक अपराधी नहीं पाया जाता, तो उसकी संपत्ति को मुक्त कर दिया जाएगा। विशेष अदालत आवेदन पर सुनवाई के बाद किसी व्यक्ति को भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित कर सकती है। वह उन संपत्तियों को जब्त कर सकती हैः (i) जो भारत में या विदेश में बेनामी संपत्ति हो, और (iii) इसके अतिरिक्त भारत या विदेश में कोई अन्य संपत्ति भी जब्त की जा सकती है। जब्ती के बाद संपत्ति के सभी अधिकार और टाइटिल केंद्र सरकार में निहित होंगे लेकिन केंद्र सरकार संपत्ति से जुड़ी सभी देनदारियों से मुक्त होगी (जैसे संपत्ति पर कोई शुल्क)। केंद्र सरकार इन संपत्तियों के प्रबंधन या निस्तारण के लिए एक प्रशासक को नियुक्त करेगी।

विधेयक सिविल अदालत या ट्रिब्यूनल को इस बात की अनुमति देता है कि वे किसी ऐसे व्यक्ति को सिविल दावा दायर करने या अपनी सफाई देने की अनुमति न दे जिसे भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित किया गया है।

इस विधेयक ने अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को सिविल अदालत के समान ही शक्तियां प्रदान की हैं। इन शक्तियों में निम्नलिखित शामिल हैंः (i) यह मानकर किसी स्थान में प्रवेश करना कि व्यक्ति भगोड़ा आर्थिक अपराधी है और (ii) यह निर्देश देना कि किसी इमारत की तलाशी ली जाए, या दस्तावेजों को जब्त किया जाए। यदि कोई व्यक्ति विशेष अदालत के आदेशों से असंतुष्ट है और आदेशों के खिलाफ अपील करना चाहता है तो वह उच्च न्यायालय में अपील कर सकता है।

आपराधिक विधि (संशोधन) अध्यादेश, 2018

बारह वर्ष से कम आयु की बालिकाओं के साथ बलात्कार करने पर मृत्युदंड की सजा का प्रावधान करने वाले आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश को राष्ट्रपति ने 21 मार्च, 2018 को मंजूरी प्रदान कर दी। इस अध्यादेश के माध्यम से बाल यौन अपराध संरक्षण कानून (पोक्सो) 2012 सहित भारतीय दण्ड संहिता, आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 में भी सख्त बदलाव किए गए हैं।

अध्यादेश के मुख्य प्रावधान इस प्रकार हैंः

* दुष्कर्म के लिए न्यूनतम सजा को 10 वर्ष किया गया है।

* 16 वर्ष से कम आयु की महिला/युवती के साथ दुष्कर्म करने पर न्यूनतम 20 वर्ष की सजा का प्रावधान।

* 12 वर्ष से कम आयु की लड़की के साथ दुष्कर्म करने पर सश्रम कठोर कारावास सहित न्यूनतम 20 वर्ष की सजा और अधिकतम मृत्युदण्ड और आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान।

* पीड़ित के पुनर्वास और चिकित्सकीय खर्चों को पूरा करने के लिए त्वरित एवं न्यायपरक जुर्माना आरोपित करने का प्रावधान।

* पुलिस अधिकारी द्वारा कहीं भी दुष्कर्म करने पर न्यूनतम 10 वर्ष का कठोर कारावास का प्रावधान।

* दुष्कर्म के मामलों में जांच दो माह में पूरी हो जानी चाहिए।

* 16 वर्ष से कम आयु की युवती से दुष्कर्म के आरोपी को अग्रिम जमानत नहीं दिए जाने का प्रावधान।

* दुष्कर्म के मामलों में अपील को छह महीनों में निपटा दिया जाएगा।

भारतीय दण्ड संहिता में संशोधनः

* आईपीसी की धारा 376 में संशोधन करके दुष्कर्म के लिए न्यूनतम कारावास को 7 वर्ष से बढ़ाकर 10 वर्ष कर दिया गया है। अधिकतम सजा आजीवन कारावास ही बनी रहेगी।

* आईपीसी की धारा 376 में एक नई उपधारा (3) जोड़ी गई है, जो 16 वर्ष से कम आयु की महिला/युवती के साथ दुष्कर्म करने पर न्यूनतम सजा को बीस वर्ष करता है।

* एक नई धारा 376AB को जोड़ा गया है जो प्रावधान करती है कि 12 वर्ष से कम आयु की बालिका के साथ दुष्कर्म करने पर न्यूनतम 20 वर्ष का कठोर कारावास दिया जाएगा और ऐसे व्यक्ति को मृत्युदंड भी दिया जा सकता है।

* धारा 376DA और 37DB प्रावधान करती है कि 16 वर्ष की आयु और 12 वर्ष की आयु से कम आयु की बालिका से सामूहिक बलात्कार में संलग्न व्यक्ति को न्यूनतम आजीवन कारावास की सजा दी जाएगी।

* 12 वर्ष से कम आयु की बालिका से सामूहिक दुष्कर्म में लिप्त व्यक्तियों के लिए मृत्युदण्ड का भी प्रावधान किया गया है।

* धारा 376(2)(a) में उल्लिखित वाक्य ‘‘पुलिस थाने की सीमा के भीतर जहां उसे नियुक्त किया गया है’’ को हटा दिया गया है। इसमें यह जोड़ा गया है कि पुलिस अधिकारी द्वारा किसी भी स्थान पर दुष्कर्म करने पर उसे न्यूनतम 10 वर्ष का कठोर कारावास दिया जाएगा।

अपराध प्रक्रिया संहिता में संशोधनः

* पुलिस थाने में दर्ज प्राथमिकी की तिथि से तीन माह के भीतर दुष्कर्म मामलों से संबंधित जांच पूरी कर ली जानी चाहिए।

* एक उपधारा जोड़कर प्रावधान किया गया है कि दुष्कर्म मामलों में अपील का निपटारा छह माह के भीतर किया जाएगा।

* 16 वर्ष से कम आयु की महिला के साथ बलात्कार के आरोपी व्यक्ति को अग्रिम जमानत नहीं दी जाएगी।

* धारा 439 में एक उपधारा जोड़ी गई है जो प्रावधान करती है कि 16 वर्ष से कम आयु की युवती से दुष्कर्म के आरोपी व्यक्ति की जमानत हेतु आवेदन की सुनवाई करते समय सूचना देने वाला या उसके द्वारा अधिकृत व्यक्ति की मौजूदगी अनिवार्य होगी।

पोस्को अधिनियम व साक्ष्य अधिनियम में संशोधनः

पोस्को अधिनियम की धारा 42 में संशोधन करके आईपीसी की नई धाराओं 376AB, 376DA, और 376DBको जोड़ा गया है। साक्ष्य अधिनियम की धारा 53, जो चरित्रा के प्रमाण या पूर्व यौन अनुभव के बारे में है, को भी आईपीसी की नवीन धाराओं  जोड़कर संशोधित किया गया है।

 

सरकार ने उच्चतम न्यायालय को जानकारी दी कि चाइल्ड पोेर्नोग्राफी रोकने के लिए कदम उठाए गए हैं

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी की चाइल्ड पोर्नोग्राफी और रेप वीडियो देखने वालों पर लगाम लगाने के लिए सरकार ने प्रयास आरंभ कर दिए हैं। मंत्रालय ने न्यायालय को बताया कि अंग्रेजी के ऐसे कीवडर््स जो कि आमतौर पर चाइल्ड पोर्नोग्राफी और रेप वीडियो देखने के लिए सर्च किए जाते हैं, की सूची तैयार की गई है। इनकी सूची गूगल, याहू, फेसबुक, माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों को दी गई है, जिससे आवश्यक कदम उठाए जा सकें। यह जानकारी एडिशनल सॉलिसिटर जनरल मनिंदर सिंह ने सीबीआई तथा गृह मंत्रालय की ओर से जस्टिस मदन लोकुर और उदय उमेश ललित को दी। सिंह ने कहा, दूसरी भाषाओं में भी ऐसे कॉमन कीवर्ड्स की सूची बनाई जा रही है जो कि इन सभी कंपनियों को दी जाएगी। सरकार ने ऑनलाइन साइबर क्राइम रोकने के लिए www.cyberpolice.gov.in बनाई है। उल्लेखनीय है कि दिसंबर 2017 में न्यायाधीशों की पीठ ने गृह मंत्रालय को दस जनवरी से पहले चाइल्ड पोर्नोग्राफी और रेप वीडियो से संबंधित शिकायतें दर्ज कराने के लिए ऑनलाइन पोर्टल बनाने का निर्देश दिया था।

न्यायालय ने यह निर्देश हैदराबाद की एक गैर सरकारी संगठन प्रजावाला की याचिका की सुनवाई करते हुए दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने 3 साल की सुनवाई के बाद स्वतः संज्ञान लेते हुए यह निर्देश दिया था। इस याचिका में गैर-सरकारी संगठन ने यह दावा किया था कि इस तरह की वीडियो जिनमें रेप और पोर्नोग्राफी दिखाए जाते हैं, समाज में बच्चों तथा महिलाओं की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकते हैं। एडिशनल सॉलिसिटर ने न्यायालय में बताया कि पोर्टल जब पूर्णतः उपयोग में आने लगेगा तो लोग उसमें अपनी शिकायतें दर्ज करा सकते हैं और साथ ही शिकायत पर की गई कार्यवाही की जानकारी भी शिकायतकर्ता प्राप्त कर सकेगा।

एक व्यस्क लड़की को अपनी पसंद का जीवन जीने का अधिकार है सर्वोच्च न्यायालय

सर्वोच्च न्यायालय ने 6 जनवरी, 2018 को एक मां द्वारा दायर याचिका पर कहा कि व्यस्क लड़की अपनी पसंद का जीवन जीने का अधिकार रखती है। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अगुवाई में बेंच ने कहा, ‘‘इसके लिए विशेष रूप से जोर देने की आवश्यकता नहीं है। बालिगों को अपनी जिंदगी के फैसले लेने का पूरा अधिकार है। चाहे वह कपड़ों के लिए हो या कार्य के लिए या जीवन साथी के लिए हो। उनकी पसंद में न्यायालय उनका सुपर गार्जियन नहीं बन सकता।’’ तिरुवनंतपुरम् की निवासी एक महिला ने न्यायालय में याचिका दायर कर अपनी बेटी की कस्टडी मांगी थी। लड़की ने न्यायालय में कहा कि वह अपने पिता के साथ कुवैत में रह कर अपना करियर बनाना चाहती है।

न्यायालय ने कहा कि लड़की ने बिना किसी झिझक के स्पष्ट रूप से कहा है कि वह अपने पिता के साथ कुवैत में रहना चाहती है तथा लड़की व्यस्क है इसलिए उसे पूरा अधिकार है कि वह अपने लिए निर्णय ले सके। यद्यपि न्यायालय ने याचिकाकर्ता के पति को 13 साल के बेटे को गर्मी की छुट्टियों के दौरान केरल में मां के पास भेजने का आदेश दिया है। लड़की ने कहा कि वह इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन कर रही है तथा साथ ही कुवैत में हुंडई टेक्नोलॉजीस से इंटर्नशिप कर रही है।

बेघर किस तरह से आधार प्राप्त करेगा? सर्वोच्च न्यायालय

सर्वोच्च न्यायालय ने जनवरी 2018 में उत्तर प्रदेश सरकार से पूछा है कि शहरी बेघरों के आधार कार्ड किस प्रकार से बनाए जा रहे हैं। न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने देश भर में शहरी बेघरों को बसेरे उपलब्ध कराने हेतु दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान राज्य सरकार से यह जानकारी मांगी। पीठ ने राज्य सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से यह प्रश्न कियाµ‘यदि कोई व्यक्ति बेघर है तो आधार कार्ड में उसे कैसे वर्णित किया जाता है? मेहता ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि, हां, यही संभावना है कि उनके पास आधार कार्ड नहीं होगा। इस पर पीठ ने प्रश्न किया कि क्या राज्य सरकार के लिए उन बेघर लोगों का कोई अस्तित्व ही नहीं है, जिनके पास आधार नहीं है और क्या ऐसे लोगों को बसेरों में जगह नहीं मिलेगी? जस्टिस लोकुर के पूछे जाने पर कि वो बेघर लोग आधार कार्ड कैसे बनवायेंगे, जिनका कोई स्थायी पता नहीं है, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यह कहना गलत होगा कि सरकार के लिए बेघर लोगों का कोई अस्तित्व ही नहीं है। मेहता ने कहा कि अधिकतर शहरी बेघर ग्रामीण इलाकों से आए हैं, जिनका पैतृक गांव में स्थायी पता होता है। ये लोग अपने उसी पते का उपयोग कर आधार कार्ड बनवा सकते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ व्यभिचार कानून की समीक्षा करेगी

यदि कोई विवाहित महिला किसी गैर पुरुष से शारीरिक संबंध बनाए तो केवल पुरुष को ही दंड क्यों मिले। सर्वोच्च न्यायालय की एक संविधान पीठ इससे जुड़े कानून की समीक्षा करेगी। न्यायालय ने इस विषय को एक महत्वपूर्ण विषय बताते हुए 5 जनवरी, 2018 को 5 जजों की संविधान पीठ को सौंपा दिया। याचिकाकर्ता ने आईपीसी की धारा 497 में व्यभिचार की परिभाषा को भेदभाव पूर्ण बताया है। आईपीसी की धारा 497 में सिर्फ पुरुष को दंड दिए जाने का प्रावधान है। किसी विवाहित महिला से उसके पति की मर्जी के बिना संबंध बनाने वाले पुरुष को 5 साल तक की सजा हो सकती है लेकिन महिला पर कोई कार्यवाही नहीं होती।

याचिकाकर्ता केरल के जोसेफ शाइन के अनुसार, यह कानून 150 वर्ष पुराना है, जब महिलाओं की आर्थिक-सामाजिक स्थिति बहुत कमजोर थी, इसलिए व्यभिचार के मामले में महिला को पीड़ित की तरह माना गया था। आज की महिलाओं की स्थिति इतनी कमजोर नहीं है। यदि वो अपनी इच्छा से दूसरे पुरुष से संबंध बनाती है, तो मुकदमा सिर्फ उस पुरुष पर नहीं चलना चाहिए। ऐसे मामले में महिला को छूट दे देना समानता के अधिकार के विपरीत है।

इस दलील की सहमति में संवैधानिक पीठ ने कहा कि ‘‘आपराधिक कानून लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं करता लेकिन ये धारा एक अपवाद है। इस पर विचार की जरूरत है।’’ न्यायालय ने यह भी कहा कि पति की सहमति से किसी और से संबंध बनाने पर इस धारा का लागू न होना भी यह दिखाता है कि औरत को एक संपत्ति की तरह लिया गया है।

याचिकाकर्ता ने कहा कि 1971 में विधि आयोग तथा 2003 में जस्टिस मलिमथ आयोग आईपीसी 497 में बदलाव की सिफारिश कर चुके हैं परन्तु किसी सरकार ने इस कानून में कोई संशोधन नहीं किया।

न्यायालय में यह भी प्रश्न उठाया गया कि आईपीसी 497 के तहत् पति तो अपनी पत्नी के व्यभिचार की शिकायत कर सकता है परन्तु पति के ऐसे संबंधों की शिकायत पत्नी नहीं कर सकती। न्यायालय ने माना कि ये कानून कहीं पुरुष तो कहीं महिला से भेदभाव करता है। इससे पहले भी 1954, 2004, 2008 में आए निर्णयों में सर्वोच्च न्यायालय आईपीसी 497 में किसी भी तरह के बदलाव की मांग को ठुकरा चुका है तथा यह निर्णय लेने वाली संवेधानिक पीठ में तीन या चार न्यायाधीश होते थे। इसी कारण से इस बार संवैधानिक पीठ में पांच न्यायाधीशों को सम्मिलित किया गया है।

पहली बार सर्वोच्च न्यायालय की न्यायाधीश महिला अधिवक्ता बनेगी

सर्वोच्च न्यायालय की अधिशासी समिति, जिसका नेतृत्व मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा कर रहे हैं ने 11 जनवरी, 2018 को एक इतिहास रचते हुए पहली बार किसी महिला अधिवक्ता को शीर्ष अदालत में सीधे न्यायाधीश के पद पर नियुक्त किया। इंदु मल्होत्रा शीर्ष अदालत में सीधे न्यायाधीश नियुक्त होने वाली पहली महिला वकील होंगी। इससे पहले 68 वर्षों के इतिहास में मात्रा छह महिलाओं को यह पद प्राप्त हुआ है तथा सभी छह महिलाएं उच्च न्यायालय से सर्वोच्च न्यायालय के लिए चुनी गई थीं। वर्ष 2007 में इंदु मल्होत्रा को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वरिष्ठ अधिवक्ता बनाया गया था।

अधिशासी समिति ने इंदु मल्होत्रा के साथ-साथ उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के.एम. जोसेफ के नाम के लिए भी सिफारिश की है। जस्टिस जोसेफ उस पीठ का हिस्सा थे, जिसने 2016 में उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने के निर्णय को रद्द कर दिया था।

शीर्ष न्यायालय में नियुक्त होने वाली प्रथम महिला जस्टिस न्यायमूर्ति एम. फातिमा बीवी थीं। वर्ष 1989 में बीवी सर्वोच्च न्यायालय की न्यायाधीश नियुक्त हुई थीं। इनके बाद सुजाता वी मनोहर, रूमा पाल, ग्यान सुधा मिश्रा, रंजना पी. देसाई तथा आर भानुमति इस पद पर आसीन हुईं। इंदु मल्होत्रा ने अपनी कानून की पढ़ाई दिल्ली युनिवर्सिटी से की तथा 1983 से इन्होंने वकालत आरंभ की। इंदु मल्होत्रा पिछले 35 वर्षों से दिल्ली में वकालत कर रही हैं और वह इन वर्षों में अधिकतर सर्वोच्च न्यायालय में कार्यरत रहीं थीं।

सर्वोच्च न्यायालय समलैंगिकता के कानून पर पुनर्विचार करेगा

सर्वोच्च न्यायालय समलैंगिकता पर 2013 के निर्णय की समीक्षा करेगा, जिसके अनुसार, दो समान लिंग के व्यस्कों के बीच शारीरिक संबंधों को अपराध माना गया है। यह वक्तव्य जनवरी 2018 में दी गई इस पुनर्समीक्षा के कथन ने भारत में पुराने वाद-विवाद को उजागर कर दिया है कि भारत में समलैंगिकता के लिए अब तक औपनिवेशिक युग के कानून अस्तित्व में हैं।

यह वक्तव्य अगस्त 2017 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय-निजता एक मूलभूत अधिकार है, के बाद आया है। निजता के अधिकार में यौन अभिविन्यास भी एक आवश्यक गुण के तौर पर सम्मिलित होता है। तीन जजों की खंडपीठ ने, जिसमें चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड तथा ए.एम. खानविल्कर ने एल.जी.बी.टी. (लेस्बियन, गे, बायसेक्सुअल तथा ट्रांसजेंडर) समूह की अपील की प्रतिक्रिया में यह व्यक्तव्य दिया कि इस मुद्दे पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है जिसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के अनुसार, समान लिंग के बीच शारीरिक संबंधों को अपराध माना गया है चाहे यह दो व्यस्कों के बीच सहमति से हो। न्यायालय ने कहा है कि इस नियम पर पुनर्विचार तथा धारा 377 की संवैधानिक वैधता का निर्णय एक बड़ी पीठ द्वारा किया जाएगा। अदालत ने इस मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। उच्चतम न्यायालय के अनुसार, सामाजिक नैतिकता में समय के साथ भी बदलाव होता है। अपनी व्यक्तिगत पसंद के कारण समाज का कोई वर्ग डर में नहीं जी सकता है।

वर्ष 2013 में सर्वोच्च न्यायालय की एक डिवीजन बेंच द्वारा दिए गए वर्ष 2009 के निर्णय को रद्द कर दिया था, जिसमें दो व्यस्क समलैंगिक पुरुषों के बीच यौन संबंधों को अपराध नहीं माना गया था। एलजीबीटी कार्यकर्ताओं ने अदालत के इस निर्णय का स्वागत किया है तथा कहा है कि हम 21वीं सदी में जी रहे हैं तथा समाज को अब समझना होगा कि समय के साथ इन मामलों के लिए स्वीकार्यता बढ़नी चाहिए।

राष्ट्रीय न्यायिक वेतन आयोग भारत में निचली अदालतों में न्यायाधीशों की संख्या की सिफारिश करेगा

भारत के विधि मंत्रालय द्वारा अधिसूचित द्वितीय राष्ट्रीय न्यायिक वेतन आयोग को भारत में कितनी निचली अदालतों में न्यायाधीशों की आवश्यकता है, का उत्तर देने के लिए कहा गया है।

उच्च न्यायतंत्रा तथा कार्यकारी अधिकारी के बीच इस बात को लेकर विवाद है कि वास्तव में कुल कितने अधीनस्थ न्यायाधीशों की आवश्यकता है। भारत में वर्तमान में अधीनस्थ न्यायतंत्रा में न्यायिक अधिकारियों के 22,000 से कम पदों को मंजूरी दी गई है, जिसमें से 5,000 पद रिक्त हैं। भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने एक कान्फ्रेंस में कहा था कि भारत में पुराने मामले लगभग 3.2 करोड़ हैं जिन्हें निपटाने के लिए 70,000 न्यायाधीशों की आवश्यकता है। न्यायाधीशों की कम संख्या को ही पुराने मुकदमों को न निपटाये जा सकने का कारण माना जा रहा है।

विधि मंत्राी ने सभी 24 उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों से निचली अदालतों के प्रशासन तथा वित्त को संभालने के लिए एक अलग ढांचे के निर्माण हेतु अपना दृष्टिकोण रखने को कहा है। अभी यह कार्य भी न्यायाधीशों द्वारा ही किये जाते हैं। इस कार्य के लिए मंत्रालय ने एक आयोग का गठन किया है, जिसका नेतृत्व सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस पी.वी. रेड्डी करेंगे। यह आयोग निचली न्यायपालिका में कार्य के माहौल की भी समीक्षा करेगा।

यह आयोग निचली अदालतों के न्यायाधीशों के वेतन तथा सुविधाओं हेतु एक स्थायी तंत्रा की भी सिफारिश करेगा जो कि समय-समय पर वेतन तथा अन्य सुविधाओं की समीक्षा करे।

पूर्व न्यायाधीश ठाकुर के कथन से यह निष्कर्ष निकाला गया कि उन्होंने यह बात विधि आयोग की 120वी रिपोर्ट, 1987 का उद्धरण देते हुए से कही, जिसमें कहा गया था कि अमेरिका की तरह भारत में भी हर 50,000 व्यक्तियों पर 50 न्यायाधीशों की आवश्यकता है।

विधि आयोग की 245वीं रिपोर्ट में कहा गया है कि, न्यायाधीशों की संख्या का निर्धारण मुकदमों के निपटान की दर से किया जाना चाहिए न कि न्यायाधीश जनसंख्या अनुपात से। 245वीं रिपोर्ट, जुलाई 2014 में जारी की गई थी। सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को आयोग बनाने का निर्देश दिया जो कि अधीनस्थ न्यायपालिका के न्यायिक अधिकारियों के वेतनमान, कार्य के माहौल, सुविधाओं आदि की समीक्षा करे।

भारत सरकार ने गौ-हत्या पर प्रतिबंध पर रोक लगाई

3 दिसंबर, 2017 को पर्यावरण मंत्री  ने अपने विवादास्पद निर्णय जिसके अनुसार मवेशियों को काटने के लिए बाजार में नहीं बेचा/खरीदा जा सकता है, पर रोक लगा दी गई है।

कई राज्यों ने इस नियम का विरोध किया था तथा बयान दिया था कि यह नियम उनके राज्यों में मवेशियों के व्यापार के अधिकार का उल्लंघन करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने नियम के लागू होने पर रोक लगा दी थी। पशुओं के प्रति क्रूरता रोकथाम अधिनियम 1960, सेक्शन 38 द्वारा प्राप्त अधिकारों का प्रयोग करते हुए केंद्र सरकार ने यह नियम बनाया था परंतु 23 मई, 2017 को दी गई अधिसूचना को केंद्र सरकार ने वापस ले लिया है। मंत्रालय द्वारा लिए गए निर्णय को मुस्लिमों के विरुद्ध देखा गया था तथा इसकी कड़ी आलोचना भी हुई थी।

सरकार ने इसी के साथ मत्स्यपालन को व्यवस्थित करने हेतु जो नियम बनाया था, वह भी वापस ले लिया है। इस नियम के अनुसार, मछलीघर के मालिकों तथा उनके अधिष्ठानों का पंजीकरण अनिवार्य था। उल्लेखनीय है, कुछ समुदायों तथा राज्यों में मवेशियों को भोजन के रूप में प्रयोग किया जाता है, जिन्हें इस प्रकार के कानून से खासी परेशानी का सामना करना पड़ा।

भारतीय रेलवे ने ‘मुखबिर’ पोर्टल लॉन्च किया

भारतीय रेलवे ने 11 फरवरी, 2018 को अपने 13 लाख कर्मचारियों के लिए वॉलन्टरी सेफ्टी रिपोर्टिंग वेबसाइट लॉन्च की। इस वेबसाइट में कर्मचारी सुरक्षा संबंधी कार्यों में कमी तथा जोखिमों के विषय में रिपोर्ट कर सकेंगे तथा रिपोर्ट करने वाले की पहचान गुप्त रखी जाएगी। इन जानकारियों को किसी भी छोटी-बड़ी दुर्घटना से बचने के लिए कमियों को दूर करने में किया जाएगा। सुरक्षात्मक मुद्दों पर कर्मचारियों को चेतावनी देने के लिए इस वेबसाइट का प्रयोग किया जाएगा तथा रिपोर्ट करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध इन जानकारियों को आधार बना कर किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।

वेबसाइट के अनुसार, जो व्यक्ति रिपोर्ट कर रहा है उसकी पहचान मुख्य सुरक्षा अधिकारी तक सीमित रखी जाएगी, जिसका उपयोग मसले की अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए किया जा सकता है या उस कमी को दूर करने के लिए किए गए प्रयासों के विषय में प्रतिपुष्टि करने हेतु उपयोग में लाया जा सकता है।

जो व्यक्ति किसी प्रकार की कमी की रिपोर्ट इस वेबसाइट में करेगा, वह कमी को दूर करने के प्रयासों की जानकारी लेने के लिए वेबसाइट में स्टेट्स भी चेक कर सकेगा। रेलवे बोर्ड के चेयरमेन ने सभी कर्मचारियों को पत्रा लिखकर असुरक्षित गतिविधियों के बारे में रिपोर्ट करने को कहा है। उन्होंने कहा कि यह आवश्यक है कि रेलवे अपने सिद्धांत ‘सेफ्टी फर्स्ट को बनाए रखे। व्यवस्थित सुरक्षा प्रबंधन प्रणाली से खतरों की पहचान कर ट्रेन आपरेशंस को सुरक्षित बनाया जा सकेगा। यह वेबसाइट भारतीय रेलवे की रेलवे सूचना प्रणाली केंद्र  अंतर्गत विकसित की गई है। यह वेबसाइट एक ट्रैकमैन से लेकर अधिकारी तक सभी के लिए है तथा यह एक सार्वभौमिक रिपोर्टिंग प्रणाली है। इसी प्रकार की एक प्रणाली एयर इंडिया में लॉन्च की गई थी। अब ऐसी ही प्रणाली रेलवे के पास होगी। एयर इंडिया के कर्मचारियों तथा रेलवे कर्मचारियों के बीच विचार-विमर्श की व्यवस्था की गई है। जिससे इस प्रणाली के कार्य को समझा जा सके और रेलवे कर्मचारियों को इस व्यवस्था से होने वाले लाभों के विषय में पता चल सके। इस प्रणाली को लागू किए जाने का उद्देश्य है रेलवे के हर कर्मचारी को प्रशासन की आंख तथा कान बनाया जाए जिससे यात्रियों की सुरक्षा को सुनिश्चित किया जा सके। यद्यपि इस व्यवस्था में असत्य रिपोर्ट मिलने की संभावना बहुत अधिक है, फिर भी रेलवे के प्रशासन को आशा है कि इस वेबसाइट के कारण सुरक्षा व्यवस्था में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं रहेगी।

राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यपाल के वेतन में वृद्धि

सातवां वेतन आयोग लागू होने के बाद राष्ट्रपति समेत देश के ऊंचे पदाधिकारियों के वेतन में वृद्धि होगी। यह निर्णय फरवरी 2018 में लिया गया। इससे पहले इनके वेतन में बढ़ोत्तरी वर्ष 2016 में की गई थी। राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के वेतन को बढ़ाकर क्रमशः 5 लाख और 4 लाख रुपये प्रतिमाह तथा राज्यपालों का वेतन बढ़ाकर 3.5 लाख रुपये किया गया है। वित्त मंत्राी ने कहा कि सांसदों के वेतन तथा भत्ते हर पांच साल में बढ़ाए जाएंगे। इसके अलावा पूर्व राष्ट्रपति, दिवंगत राष्ट्रपति के जीवनसाथी, पूर्व उपराष्ट्रपति, दिवंगत उपराष्ट्रपति के जीवनसाथी और पूर्व राज्यपालों की पेंशन में भी बढ़ोत्तरी की गई। वर्तमान में राष्ट्रपति को 1.50 लाख रुपये प्रतिमाह, उपराष्ट्रपति को 1.25 लाख रुपये प्रतिमाह तथा राज्यपाल को 1.10 लाख रुपये प्रतिमाह दिये जाते थे।

आधार-लिंक्ड बैंक खातों की मैपिंग प्रक्रिया बदलने के निर्देश

सरकार ने दिसंबर 2017 में सब्सिडी के लिए आधार-लिंक्ड बैंक खातों की मैपिंग की प्रक्रिया को बदलने के लिए बैंकों और भारत के राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) को निर्देश देने के लिए एक अधिसूचना जारी की। सरकार ने आधार-लिंक्ड बैंक खातों को सब्सिडी भुगतान हेतु मैप करने के लिए अपनी प्रक्रिया के अलावा वर्तमान में सब्सिडी से जुड़े बैंक खातों के मौजूदा अधिग्रहण के प्रावधान को अस्थाई रूप से रोक दिया है।

यह बदलाव शीर्ष दूरसंचार सेवा प्रदाता भारती एयरटेल पर लगे आरोपों के बाद किया गया। कंपनी पर यह आरोप लगाया गया था कि कंपनी ने बैंकों द्वारा अनिवार्य किए गए इलेक्ट्रॉनिक केवाईसी में दी गई जानकारी का प्रयोग बिना आधार धारक की सहमति के किया था। यह आरोप भी लगाया गया था कि खातों की मैपिंग कर सब्सिडी की राशि निर्देशित कर दी जाएगी तथा यह बिना बैंक धारक को सूचित किए किया जाएगा। एक अधिसूचना में यूनीक आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने कहा है कि भारत का राष्ट्रीय भुगतान निगम आधार धारकों के उन्हीं अनुरोध को स्वीकार करेगा जिसके बैंक का नाम एपीबी (आधार पेमेंट ब्रिज) मैपर पर होगा तथा यह अनुरोध बैंक द्वारा भी सत्यापित किया जाएगा कि बैंक को मैपर पर उपस्थित बैंक को चुनने हेतु आधार धारक की अनुमति प्राप्त है।

इसमें यह भी कहा गया है कि नई प्रक्रिया लागू होने तक एनपीसीआई तुरंत एपीबी मैपर पर ओवरराइड सुविधा को अक्षम कर देगी। अधिसूचना में कहा गया है, बैंक एक नए खाते के मानचित्राण या मौजूदा बैंक खाते को एनपीसीआई को अपने ग्राहकों की स्पष्ट सूचित सहमति के बाद ही अधिलेखित करने के लिए अनुरोध करेगा। किसी भी प्रकार से इन निर्देशों का उल्लंघन आधार एक्ट 2016 की धारा 37, 40, 41, 42 और 43 का उल्लंघन माना जाएगा। दो महीनों के रसाई गैस सब्सिडी के लगभग 4.7 मिलियन ग्राहकों के 167 करोड़ रुपए एयरटेल पेमेंट बैंक खातों में भेजे गए थे। भारती एयरटेल पर आरोप लगने के बाद यूआईडीएआई को अस्थाई रूप से एयरटेल और उसके भुगतान बैंक को मोबाइल सत्यापन के लिए लिंक करने या नए खातों को खोलने के लिए आधार का उपयोग करने पर रोक लगा दी गई है। एयरटेल के अनुसार, 2.5 करोड़ रुपए का अंतरिम जुर्माना जमा करा दिया गया है तथा कंपनी द्वारा यह आश्वासन भी दिया गया है कि 190 करोड़ रुपए की धनराशि अवांछित भुगतान बैंक से खाता धारक के द्वारा चुने गए बैंक अकाउंट में भेज दिए जाएंगे।

एसिड हमले के पीड़ितों को केंद्र सरकार की नौकरी में आरक्षण दिया जाएगा

महिला तथा बाल विकास मंत्रालय द्वारा यह निर्णय लिया गया है कि एसिड हमला पीड़ितों, मानसिक व्याधियों से ग्रस्त लोगों, ऑटिज्म से पीड़ित लोगों को केंद्र सरकार की नौकरियों में आरक्षण दिया जाएगा। यह घोषणा विकलांग व्यक्तियों के अधिकार विधेयक 2016 में एसिड हमले के पीड़ितों को सम्मिलित करने पर जनवरी माह में की गई। कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने सभी केंद्र सरकार के विभागों को निर्देशित किया है कि वह प्रत्येक पद के एक प्रतिशत को अंधेपन तथा निम्न दृष्टि के पीड़ितों के लिए, बहरे तथा कम सुनने वालों के लिए, चलने में अक्षम जिनमें सेरिब्रल पाल्सी, कुष्ठरोगी, बौने, मांसपेशीय दुर्विकास, एसिड हमले से पीड़ित व्यक्तियों के लिए आरक्षित रखा जाए। इन पदों के एक प्रतिशत को स्वलीनता (ऑटिज्म), मानसिक व्याधि, बौद्धिक अक्षमता, सीखने में अक्षम व्यक्तियों के लिए आरक्षित रखा जाए।

सभी सरकारी संस्थाओं को शिकायत निवारण अधिकारियों की तैनाती करनी होगी, जिससे ये अधिकारी शिकायतों पर ध्यान दे सकें। कोई भी व्यक्ति जो कि, किसी भी प्रकार विकलांगता से पीड़ित हो, किसी भी प्रकार से भेदभाव का शिकार होने पर नामित अधिकारी के पास रिपोर्ट कर सकता है तथा इस रिपोर्ट पर निर्णय लेने का अधिकतम समय दो माह है तथा लिए गए निर्णय को शिकायतकर्ता को भी बताना होगा। ये कदम इसलिए उठाए गए हैं जिससे कि विकलांगों के लिए आरक्षण समायोजित न किया जा सके।

प्राधिकारी एसिड हमले से पीड़ित व्यक्तियों की शिकायतों को लेकर हमेशा ही सजग रहे हैं। वर्ष 2017 में पांच एसिड हमले से पीड़ितों तथा एक किन्नर द्वारा की गई शिकायत के बाद दिल्ली हाइकोर्ट ने हस्तक्षेप किया तथा शिकायतकर्ताओं को उनके पद दिलाए।

केंद्र सरकार का संसद तथा विधान मंडल में पेपरलेस डिजिटल कार्य प्रणाली लाने का प्रस्ताव

केंद्र सरकार अपने ‘गो ग्रीन इनिशिएटिव’ के तहत् संसद तथा राज्य के सदन में कार्य प्रणाली को कागजरहित (पेपरलेस) बनाने तथा इसका डिजिटाइजेशन करने की इच्छुक है। मोदी सरकार के डिजिटल इंडिया प्लान का हिस्सा है पेपरलेस कार्यशैली तथा संसद और एसेम्बली में अधिकाधिक ऑटोमेशन करना। यह प्रस्ताव जनवरी 2018 में पेश किया गया।

पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार ने संसद के दस्तावेजों तथा रिपोर्ट को कागजों पर प्रिंट कराने में कमी की है। वर्ष 2016 में सरकार ने प्रिंटेट बजट कॉपी की संख्या लगभग आधी कर दी। वर्ष 2017 में बजट पेश किए जाने के दिन केवल संसद सदस्यों को इसकी प्रिंटेड कॉपी दी गई क्योंकि वित्त मंत्राी के भाषण के कुछ ही समय बाद बजट स्पीच और प्रस्तावों को सरकारी वेबसाइट पर डाल दिया गया। पेपरलेस होने से न सिर्फ कागज और मूल्य की बचत की जा रही है बल्कि संसद तथा राज्य की विधायिकाओं को अधिक उत्पादक, पारदर्शी तथा जनता के लिए अधिक उत्तरदायी बनाया जा रहा है।