विभिन्न सांविधिक,अर्द्धन्यायिक एवं अन्य निकाय (भाग-9)

पर्यावरण संबंधी निकाय

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) का गठन एक संविधिक संगठन के रूप में जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के अंतर्गत सितंबर, 1974 में किया गया था। इसके पश्चात् केंद्रीय प्रदूषण नियंत्राण बोर्ड को वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 के अंतर्गत शक्तियां व कार्य सौंपे गये।

यह क्षेत्रा निर्माण के रूप में कार्य करता है तथा पर्यावरण (सुरक्षा) अधिनियम, 1986 के प्रावधानों के अंतर्गत पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को तकनीकी सेवाएं भी उपलब्ध करता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्राण बोर्ड के प्रमुख कार्य जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्राण) अधिनियम, 1974 तथा वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 में व्यक्त किये गये हैं। (1) जल प्रदूषण के निवारण एवं नियंत्रण द्वारा राज्यों के विभिन्न क्षेत्रों में कुओं और सरिताओं की स्वच्छता को सुधारना तथा (2) देश में वायु प्रदूषण के निराकरण अथवा नियंत्रण, निवारण के लिए वायु गुणवत्ता में सुधार लाना।

वायु गुणवत्ता प्रबोधन वायु गुणवत्ता प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण अंग है। राष्ट्रीय वायु प्रबोधन कार्यक्रम (रावप्रका) की स्थापना वर्तमान वायु गुणवत्ता की स्थिति और प्रवृत्ति को सुनिश्चित करने तथा उद्योगों और अन्य òोतों के प्रदूषण को नियमित कर नियंत्रित करने तथा वायु गुणवत्ता मानकों के अनुरूप रखने के उद्देश्य से की गई है। यह औद्योगिक स्थापना तथा शहरों की योजना तैयार करने के लिए अपेक्षित वायु गुणवत्ता के आंकड़ों की पृष्ठभूमि भी उपलब्ध कराता है।

इसके अलावा केंद्रीय बोर्ड का नई दिल्ली स्थित एक स्वचालित प्रबोधन केंद्र भी है। इस केंद्र पर श्वसन निलम्बित व्यक्ति कण, कार्बन मोनो ऑक्साइड, ओजोन, सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइ ऑक्साइड तथा निलम्बित विविक्त कण भी नियमित रूप से प्रबोधित किये जा रहे हैं।

स्वच्छ जल खेती-बाड़ी, उद्योगों में प्रयोग के लिए वन्य जीव तथा मत्स्य पालन के प्रजनन तथा मानव के अस्तित्व के लिए एक चिर स्थाई संसाधन आवश्यक है। भारत नदियों वाला देश है। यहां 14 प्रमुख नदियों, 44 मझोली नदियों और 55 छोटी नदियों के अलावा काफी संख्या में झीलें, तालाब तथा कुएं हैं, जिनका प्रयोग प्राथमिक रूप से बिना उपचार किये पीने के लिए किया जाता है। सामान्य तौर पर अधिकतर नदियां मानसून के दौरान भरी रहती हैं जो वर्ष के केवल तीन माह तक सीमित रहती हैं, प्रायः शेष समय में ये सूखी ही रहती हैं और उद्योगों अथवा शहरों/कस्बों से विसर्जित अपशिष्ट जल ही ले जाती हैं, जो हमारे सीमित जल संसाधनों की गुणवत्ता को खतरे में डालती है। भारतीय संसद ने हमारे जल निकायों की स्वास्थ्यप्रदाता को बरकरार रखने तथा सुरक्षित रखने के विचार से जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 बनाया। जल प्रदूषण से संबंधित तकनीकी तथा सांख्यिकीय आंकड़ों को एकत्रा करना, मिलाना तथा उसका प्रसारण करना केंद्रीय बोर्ड का एक अधिदेश है। इसलिए जल गुणवत्ता का प्रबोधन तथा निगरानी इसकी सबसे महत्वपूर्ण गतिविधि है।

संगठनात्मक संरचनाः

बोर्ड में एक पूर्णकालिक अध्यक्ष होता है, जिसे पर्यावरणीय संरक्षण से सम्बद्ध मामलों में विशेष ज्ञान या अनुभव हो या ऐसा व्यक्ति जिसे उपरिलिखित मामलों के साथ संस्था के प्रशासनिक कार्यों का ज्ञान या अनुभव हो, जिसे केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता है; पांच से अनधिक सदस्य केंद्र सरकार द्वारा, उसका प्रतिनिधित्व करने वाले, नामित किए जाते हैं; केंद्र सरकार द्वारा राज्य बोर्डों में से पांच से अनधिक सदस्य नामित किए जाते हैं; केंद्र सरकार द्वारा कृषि, मत्स्य या उद्योग या व्यापार या अन्य हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले तीन से अनधिक गैर-सरकारी सदस्यों को नामित किया जाता है; केंद्र सरकार के स्वामित्व, नियंत्राण एवं प्रबंधन वाले निगमों एवं कंपनियों का प्रतिनिधित्व करने वाले दो व्यक्तियों को केंद्र सरकार द्वारा नामित किया जाता है; केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त एक पूर्णकालिक सदस्य-सचिव जिसे प्रदूषण नियंत्राण के वैज्ञानिक, अभियांत्रिकी या प्रबंधन पहलुओं की योग्यता, ज्ञान एवं अनुभव हो।

सीपीसीबी के दायित्व एवं कार्य

* भारत सरकार को जल एवं वायु प्रदूषण के निवारण एवं नियंत्रण तथा वायु गुणवत्ता में सुधार से संबंधित किसी भी विषय में परामर्श देना।

* जल तथा वायु प्रदूषण की रोकथाम अथवा निवारण एवं नियंत्रण के लिए एक राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम की योजना तैयार कर तथा उसे निष्पादित कराना।

* राज्य बोर्डों की गतिविधियों का समन्वयन करना तथा उनके बीच उत्पन्न विवादों को सुलझाना।

* राज्य बोर्डों को तकनीकी सहायता व मार्गदर्शन उपलब्ध कराना, वायु प्रदूषण से संबंधित समस्याओं तथा उसके निवारण, नियंत्राण अथवा उपशमन के लिए अनुसंधान और उसके उत्तरदायी कारणों की खोज करना।

* जल तथा वायु प्रदूषण के निवारण तथा नियंत्रण अथवा उपशमन के कार्यक्रम में संलग्न व्यक्तियों के लिए प्रशिक्षण आयोजित करना तथा योजनाएं तैयार करना।

* जल तथा वायु प्रदूषण की रोकथाम अथवा नियंत्रण, निवारण पर एक विस्तृत जन-जागरूकता कार्यक्रम, मास मीडिया के माध्यम से आयोजित करना।

* जल तथा वायु प्रदूषण और उसके प्रभावी निवारण, नियंत्राण अथवा रोकथाम के लिए किये गये उपायों के संबंध में तकनीकी तथा सांख्यिकीय आंकड़ों को संग्रहीत, संकलित कर प्रकाशित करना।

* स्टैक गैस क्लीनिंग डिवाइसिस, स्टैक्स और डक्टस सहित सहित मल-जल तथा व्यावसायिक बहिòावों के विसर्जन तथा शोधन के संबंध में नियमावली, आचार संहिता और दिशा-निर्देश तैयार करना।

* जल तथा वायु प्रदूषण तथा उनके निवारण तथा नियंत्रण से संबंधित मामलों में सूचना का प्रसार करना।

* संबंधित राज्य सरकारों के परामर्श से नदियों अथवा कुओं के लिए मानकों को निर्धारित करना तथा वायु गुणवत्ता के लिए मानक तैयार करना, निर्धारित करना, संशोधित करना अथवा रद्द करना।

* भारत सरकार द्वारा निर्धारित किये गये अन्य कार्य निष्पादित करना।

संघ शासित प्रदेशों के लिए राज्य बोर्डों के रूप में केंद्रीय बोर्ड के कार्यः

* किसी परिसर की उपयुक्तता अथवा किसी उद्योग की अवस्थिति जिससे किसी नदी अथवा कुएं प्रदूषित हो रहे हैं, अथवा उनसे वायु प्रदूषण की संभावना हो, के विषय में संघ शासित प्रदेश की सरकारों को सलाह देना।

* सीवेज के शोधन तथा व्यावसायिक बहिòावों तथा ऑटोमोबाइल्स के उत्सर्जनों, औद्योगिक संयंत्रों तथा अन्य किसी प्रदूषणकारी òोतों के लिए मानकों का निर्धारण करना।

* सीवेज और व्यावसायिक बहिòावों का भूमि पर विसर्जन।

* सीवेज और व्यावसायिक बहिòाव तथा वायु प्रदूषण नियंत्रण उपस्करों हेतु विश्वसनीय और किफायती विधियों का उपयुक्त विकास, वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 के अंतर्गत अधिसूचित क्षेत्रों अथवा केंद्र शासित प्रदेशों के क्षेत्रों में वायु प्रदूषण नियंत्रण क्षेत्रा के रूप में अथवा किसी क्षेत्रा का पता लगाना।

* परिवेशी जल तथा वायु की गुणवत्ता का मूल्यांकन करना, तथा अपशिष्ट जल शोधन स्थापनाओं, वायु प्रदूषण नियंत्राण उपकरणों, औद्योगिक संयंत्रों अथवा विनिर्माण प्रक्रियाओं का निरीक्षण करना तथा जल तथा वायु प्रदूषण की रोकथाम तथा निवारण व नियंत्रण के लिए उठाये गये कदमों तथा उनकी निष्पादन क्षमता का मूल्यांकन करना।

भारत सरकार की निर्धारित नीति के अनुसार केंद्रीय प्रदूषण नियंत्राण बोर्ड ने जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974, जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्राण) उपकर अधिनियम, 1977 तथा वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्राण) अधिनियम, 1981 के अंतर्गत संघ शासित प्रदेशों के विषय में अपनी शक्तियां तथा कार्य संबंधित स्थानीय प्रशासनों को प्रत्यायोजित कर दी हैं। केंद्रीय बोर्ड अपने प्रतिपक्षों राज्य प्रदूषण नियंत्राण बोर्डों के साथ पर्यावरणीय प्रदूषण के नियंत्रण तथा निवारण से संबंधित विधानों के कार्यान्वयन के लिए उत्तरदायी है।

सीपीसीबी का मूल्यांकनः

भारतीय प्रबंधन संस्थान, लखनऊ ने 2011 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्राण बोर्ड (सीपीसीबी) हेतु भविष्य के लिए व्यवसाय योजना तैयार करने पर ध्यान केंद्रित करते हुए एक अध्ययन कराया और योजना की प्राप्ति के लिए संगठनात्मक क्षमताओं, शक्तियों एवं कमजोरियों का मूल्यांकन किया।

अध्ययन के अनुसार, सीपीसीबी के पास प्रदूषण नियंत्रण की पर्याप्त शक्ति नहीं है और इसके कार्य को करने के लिए इसके पास पर्याप्त संसाधन और आधारभूत ढांचा नहीं है। यद्यपि सीपीसीबी और सम्बद्ध राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एसपीसीबी) दो स्वतंत्रा संस्थान हैं, इन्हें संयुक्त रूप से सहयोगात्मक तरीके से कार्य करने की जरूरत है। प्रदूषण नियंत्रण एवं कमी पर सीपीसीबी के कार्य का प्रभाव व्यापक रूप से एसपीसीबी की क्षमता एवं कार्य पर निर्भर करता है। सीपीसीबी को राज्य बोर्डों के शासन में अपना हिस्सा रखना चाहिए। इस उद्देश्य के लिए, सभी एसपीसीबी के गवर्निंग बोर्डों में सीपीसीबी का आवश्यक रूप से प्रतिनिधित्व होना चाहिए। वर्तमान में इस तथ्य को त्रिपुरा में अपनाया जा रहा है।

वर्तमान में नियमित अंतराल पर पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा सीपीसीबी की निष्पादन समीक्षा का कोई अंतनिर्मित तंत्रा नहीं है। समीक्षा में सीपीसीबी की निष्पादन बजटिंग और परिप्रेक्ष्य नियोजन दोनों शामिल होना चाहिए।

यह भी वांछनीय है कि सीपीसीबी को धन के लिए पर्यावरण एवं वन मंत्रालय पर अपनी निर्भरता को कम करना चाहिए और अन्य मार्गों को तलाशना चाहिए।

सीपीसीबी के क्षेत्राीय कार्यालयों को एसपीसीबी के साथ काम करने का एक विस्तारित तंत्रा माना जाता है। एक अविलंब उपाय के तौर पर, मौजूदा क्षेत्राीय कार्यालयों को अधिक मानव एवं आधारिक संसाधन मुहैया कराकर मजबूत किया जाना चाहिए।

सामान्य तौर पर, विगत् वर्षों के दौरान प्रदूषण नियंत्रण रणनीतियां विनियमन पर आधारित रही हैं। तकनीकियों या स्टेकहोल्डर्स को व्यापक सूचना पर आधारित रणनीतियों पर अपर्याप्त बल दिया गया है। सीपीसीबी को नवीन कम लागत पर स्वच्छ तकनीकियों को विकसित करने में अधिक सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।

विभिन्न सांविधिक,अर्द्धन्यायिक एवं अन्य निकाय (भाग-8)

जीव संरक्षण निकाय

भारतीय पशु कल्याण बोर्ड

भारतीय पशु कल्याण बोर्ड, विश्व में अपनी तरह का प्रथम संगठन है। जिसकी स्थापना पशु हिंसा रोकथाम अधिनियम, 1960 के तहत् 1962 में की गई और इसका मुख्यालय चेन्नई में अवस्थापित किया गया।

बोर्ड का गठन 28 सदस्यों द्वारा किया जाता है जिसमें एक अध्यक्ष; एक उपाध्यक्ष; एक वन महानिरीक्षक; पशुपालन आयुक्त; गृह मंत्रालय और मानव संसाधन मंत्रालय प्रत्येक से एक-एक प्रतिनिधि; लोक सभा से 4 सदस्य; राज्यसभा से 4 सदस्य; मानवतावादी विषयों से संबंधित तीन सदस्य; एवं अन्य सदस्य।

बोर्ड के कृत्यः

* निरंतर अध्ययन के तहत् पशुओं के खिलाफ हिंसा रोकने वाले भारत में प्रवृत्त कानूनों से अद्यतन रहना और समय-समय पर इनमें संशोधन करने का सरकार को सुझाव देना।

* केंद्र सरकार को पशुओं की अनावश्यक पीड़ा या परेशानी रोकने के संदर्भ में नियम बनाने का परामर्श करना।

* भार ढोने वाले पशुओं के बोझ को कम करने के लिए केंद्र सरकार या स्थानीय प्राधिकरण या अन्य व्यक्ति को पशुओं द्वारा चालित वाहनों के डिजाइन में सुधार करना।

* केंद्र सरकार को पशुओं के अस्पताल में प्रदान की जाने वाली चिकित्सकीय देखभाल एवं ध्यान से सम्बद्ध मामलों पर परामर्श देना और जब कभी बोर्ड जरूरी समझे पशु अस्पतालों को वित्तीय एवं अन्य मदद मुहैया कराना।

* वित्तीय मदद एवं अन्य तरीके से पिंजरा, शरणगाहों, पशु शेल्टर, अभ्यारण्य इत्यादि के निर्माण या अवस्थापना को बढ़ावा देना जहां पशुओं एवं पक्षियों को शरण मिल सके जब वे वृद्ध हो जाते हैं एवं बेकार हो जाते हैं या जब उन्हें संरक्षण की जरूरत होती है।

* किसी भी ऐसे मामले पर जो पशु कल्याण या पशुओं पर अनावश्यक पीड़ा एवं हिंसा से सम्बद्ध हो, केंद्र सरकार को परामर्श देना।

केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण

भारत में, चिड़ियाघरों के कृत्यों का विनियमन वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम के तहत् गठित केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण द्वारा किया जाता है। प्राधिकरण में एक अध्यक्ष, दस सदस्य एवं एक सदस्य सचिव होता है। प्राधिकरण का मुख्य उद्देश्य वन्य जीव के संरक्षण में राष्ट्रीय प्रयास को पूरा करना है।

प्राधिकरण की भूमिका विनियामक की अपेक्षा सुसाध्य बनाने की है। इसलिए, यह ऐसे चिड़ियाघरों को तकनीकी एवं वित्तीय मदद प्रदान करता है जिनमें वन्य जीव प्रबंधन के इच्छित मानक प्राप्त करने की क्षमता है।

प्राधिकरण ने इसके गठन के समय से कुछ मुख्य कदम उठाए हैं जिसमें जैव-प्रौद्योगिकी में अनुसंधान जारी रखने के लिए हैदराबाद में संकटापन्न जीवों के संरक्षण हेतु एक प्रयोगशाला की स्थापना करना, लाल पांडा के नियोजित प्रजनन एवं वनों में इनकी संख्या फिर से सामान्य करना, कुछ खास पशु संस्थानों में रोगों की पहचान हेतु रोग पहचान सुविधाओं का उन्नयन करना।

प्राधिकरण के कृत्यः

* चिड़ियाघर में रखे जाने वाले जीवों की देखभाल के लिए उनके आवासों के न्यूनतम मानकों को विशिष्टीकृत करना;

* संस्तुत मानकों एवं मापदंडों के संदर्भ में चिड़ियाघरों के कार्यकरण का मूल्यांकन एवं आकलन करना;

* चिड़ियाघरों को मान्यता प्रदान करना या उनकी मान्यता रद्द करना;

* निरंतर संकटापन्न जीवों के प्रजनन के उद्देश्य को पूरा करने हेतु उनकी पहचान करना और इसकी जिम्मेदारी चिड़ियाघर को सौंपना;

* प्रजनन उद्देश्य हेतु पशुओं के प्रापण, विनिमय, एवं लोनिंग का समन्वय करना;

* चिड़ियाघर में रखे गए जानवरों के प्रदर्शन से सम्बद्ध प्राथमिकताओं एवं थीम्स की पहचान करना;

* भारत में एवं भारत के बाहर चिड़ियाघर कार्मिकों के प्रशिक्षण का समन्वय करना;

* चिड़ियाघरों के उद्देश्य से संरक्षा प्रजनन और शैक्षिक कार्यक्रमों में अनुसंधान का समन्वय करना।

विभिन्न सांविधिक,अर्द्धन्यायिक एवं अन्य निकाय (भाग-7)

शहरी विकास संबंधी निकाय

दिल्ली नगर कला आयोग

दिल्ली नगर कला आयोग (डीयूएसी) एक संविधिक निकाय है जिसकी स्थापना दिल्ली नगर कला आयोग अधिनियम, 1973 के अंतर्गत दिल्ली में शहरी तथा पर्यावरण अभिकल्प की सौंदर्यपरक विशिष्टता की रक्षा, विकास एवं रखरखाव करने के उद्देश्य से 1 मई, 1974 को केंद्रीय सरकार तथा तीन स्थानीय निकायों नामतः दिल्ली विकास प्राधिकरण, दिल्ली नगर निगम तथा नई दिल्ली नगर पालिका परिषद् के परामर्शी निकाय के रूप में हुई। आयोग; अध्यक्ष एवं अधिकतम चार अन्य सदस्यों से निर्मित है। सचिव, आयोग के सचिवालय के प्रमुख हैं।

आयोग द्वारा प्रस्तावों को दिल्ली नगर कला आयोग के अधिनियम की धारा 11 के अंतर्गत विचार किया जाना अपेक्षित है। इनमें जनपद, सामुदायिक केंद्र, रिहायशी परिसर, लुटियन बंगला जोन क्षेत्रा, कनॉट प्लेस परिसर, पुरानी दिल्ली क्षेत्रा, स्मारक स्थलों आदि का संरक्षण शामिल है। आयोग अण्डरपास, ग्रेड सेपरेटरों, विधि-सज्जा सामग्री आदि पर भी विचार करता है। जब स्थानीय निकाय निगम उपनियमों का अनुपालन सुनिश्चित करता है तो आयोग परियोजना के परिवेश के संदर्भ में उसकी सौन्दर्यपरक एवं व्यावहारिकता की दृष्टि से विचार करता है।

दिल्ली नगर कला आयोग के गठन के बाद के वर्षों में दिल्ली के क्षेत्राफल में काफी बढ़ोतरी हुई है और मकानों का सघनता के आधार पर निर्माण हुआ है, इससे मूल अधिदेश में सुपुर्द कार्यों की सार्थकता और भी अधिक बढ़ गई है। अब परिवेश और विरासत अति आवश्यक सरोकार बन गये हैं, तथा जहां निर्णयकारी निकायों की संख्या एक से अधिक हो, वहां समग्र शहर को एक सूत्रा में बांधे रखने में पहले की तुलना में अनेक कठिनाइयां पैदा हो रही हैं। ऐसी स्थिति में शहर के घटक तत्वों के भविष्य को लेकर एक विजन (संकल्पना) की महती आवश्यकता है।

आयोग का प्रमुख सरोकार, अगर 1970 के दशक में अनियंत्रित गगन चुम्बी निर्माणों के मुद्दों के बारे में था, और 1980 के दशक में एशियाई खेलों के आयोजन से जुड़े मुद्दों तथा 1990 के दशक में द्वारका के निर्माण एवं नई दिल्ली बंगला जोन क्षेत्रा को सुस्थिर-संतुलित बनाये रखने के सरोकारों को लेकर था, वहीं वर्तमान दशक के मुख्य सरोकार चार मुद्दोंµखुले हवादार परिसरों, नदी क्षेत्रों और वन क्षेत्रा को खतरे के शेष मामलों, ऐतिहासिक आबादी इलाकों में जीवन की गुणवत्ता, जीर्ण-शीर्ण व जर्जर इलाकों के सुरुचिपूर्ण कायाकल्प को सुनिश्चित करने की जरूरत तथा यातायात नेटवर्क (मार्गों) को मानवीय जीवन की रक्षा की खासियत के साथ अधिक सुविधाजनक बनाने की जरूरत को लेकर हैं।

आयोग के मुख्य क्रियाकलापः आयोग के मुख्य कार्य असंख्य समस्या/सरोकारों में विस्तीर्ण रहे हैं। आयोग ने नए मेट्रो मार्गों तथा राष्ट्रमंडल खेलों की परियोजनाओं तथा वर्तमान संस्थानों के विस्तारों की उनमें निहित पर्यावरण-परिवेश तथा ऐतिहासिक प्रतिवेश के संदर्भ में जांच परख की। शाहजहांनाबाद के कायाकल्प के उपायों की पहचान के लिए परस्परव्यापी कार्यदायरे वाली एजेंसियों से विचार-विमर्श किया। संरचनात्मक ढांचा सुलभ कराने के लिये आयोग द्वारा शुरू की गई अग्रगामी परियोजनाओं के अंतर्गत खिड़की गांव के प्रस्ताव तथा नई दिल्ली नगर पालिका परिषद की जोनल विकास योजना पर कार्यवाही के प्रस्ताव शामिल हैं। परिवहन-कॉरीडोरों (समर्पित मार्गों) के सुधार और विस्तार के अति आवश्यक मुद्दों और उनके समाधान पर काफी समय लगाकर सोच विचार किया गया है। दिल्ली के मास्टर प्लान पर चर्चा के लिये आयोग ने एक सेमिनार का आयोजन किया।

दिल्ली विकास प्राधिकरण

दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) की स्थापना दिल्ली के विकास को सुनिश्चित एवं प्रोत्साहित करने के लिए दिल्ली विकास अधिनियम, 1957 के प्रावधानों के तहत् 1957 में की गई।
प्राधिकरण में एक अध्यक्ष (दिल्ली का उपराज्यपाल एक्सऑफिशियो अध्यक्ष होता है), केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त एक उपाध्यक्ष, एक वित्त एवं लेखा सदस्य, एक इंजीनियर, दिल्ली नगर निगम के दो चयनित प्रतिनिधि, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्रा की विधानसभा के तीन प्रतिनिधि एवं केंद्र सरकार द्वारा नामित तीन अन्य सदस्य होते हैं।

प्राधिकरण का उद्देश्य योजनानुसार दिल्ली के विकास को सुनिश्चित एवं प्रोत्साहित करना है। इसके कार्य के लिए प्राधिकरण को किसी भूमि एवं संपत्ति को अधिगृहीत, रखने, रख-रखाव करने की शक्ति, भवन निर्माण, इंजीनियरिंग, खनन एवं अन्य कार्य करने की शक्ति, जलापूर्ति एवं विद्युत के संबंध में कार्य करने की शक्ति, सीवेज एवं अन्य सेवाओं एवं सुविधाओं को प्रदान करने की शक्ति एवं आमतौर पर कुछ भी जरूरी या महत्वपूर्ण कार्य करने की शक्ति जिससे दिल्ली के विकास का उद्देश्य पूरा होता है।

विभिन्न सांविधिक,अर्द्धन्यायिक एवं अन्य निकाय (भाग-6)

कल्याण संबंधी निकाय

बहु-विकलांग व्यक्तियों के कल्याण हेतु राष्ट्रीय न्यास

यह न्यास एक संविधिक निकाय है जिसकी स्थापना आत्मविमोह, मस्तिष्क पक्षाघात और मंदबुद्धि के शिकार व्यक्तियों के लिए राष्ट्रीय न्यास और बहु-विकलांगता अधिनियम, 1999 के तहत् की गई है। इस न्यास का मूल उद्देश्य इस तरह की विकलांगता के शिकार व्यक्तियों को आत्मनिर्भर बनाना है जिससे वे यथासंभव स्वतंत्रा रूप से जी सकें। न्यास जरूरत के अनुसार सेवाएं प्रदान करने वाले पंजीकृत संगठनों को सहायता प्रदान करता है और जरूरतमंद विकलांग व्यक्तियों के लिए कानूनी संरक्षक नियुक्त करने की प्रक्रिया तय करता है।

न्यास में एक अध्यक्ष और 21 सदस्य होते हैं जिन्हें केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता है। अध्यक्ष को केंद्र सरकार द्वारा उन लोगों में से नियुक्त किया जाता है जिन्हें आत्मविमोह, मस्तिष्क पक्षाघात, मंद बुद्धि और बहु-विकलांगता के क्षेत्रा में विशेषज्ञता एवं अनुभव होता है।

केंद्रीय वक्फ परिषद्

केंद्रीय वक्फ परिषद् की स्थापना संविधिक निकाय के तौर पर भारत सरकार द्वारा दिसम्बर 1964 में, वक्फ अधिनियम, 1954 के उपबंधों के तहत् राज्य वक्फ बोर्ड के कामकाज से संबंधित मुद्दों और देश में वक्फ के समुचित प्रशासन से संबंधित मुद्दों के बारे में परामर्श देने के उद्देश्य से की गई।

परिषद् में एक अध्यक्ष, जो वक्फ प्रभारी केंद्रीय मंत्राी होता है, और केंद्र सरकार द्वारा, अधिनियम में उल्लिखित, 20 से अनधिक सदस्यों को नियुक्त किया जाता है। सचिव परिषद् का मुख्य कार्यकारी होता है। वर्तमान में परिषद् का कार्यालय नई दिल्ली में है।

परिषद् को वक्फ की कुल आमदनी का एक प्रतिशत योगदान के रूप में मिलता है। केंद्रीय वक्फ परिषद् मुस्लिम समुदायों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। शहरी वक्फ संपत्तियों का विकास, एवं शैक्षिक विकास कार्यक्रम इसके द्वारा लागू की जाने वाली योजनाएं हैं।

कर्मचारी भविष्य निधि अपीलीय ट्रिब्यूनल

कर्मचारी भविष्य निधि एवं विविध उपबंध अधिनियम, 1952 केंद्र सरकार द्वारा कर्मचारी भविष्य निधि अपीलीय ट्रिब्यूनल के गठन का प्रावधान करता है।
ट्रिब्यूनल में केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त केवल एक व्यक्ति होता है। कोई व्यक्ति ट्रिब्यूनल के प्रीसाइडिंग अधिकारी नियुक्त किए जाने के योग्य नहीं होगा जब तक कि वहः ;पद्ध एक उच्च न्यायालय का न्यायाधीश, या ;पपद्ध जिलाधीश, नहीं है या रहा है या बनने की योग्यता रखता है।
ट्रिब्यूनल, पक्षों द्वारा अपील करने के पश्चात्, दोनों को सुने जाने का अवसर देने के पश्चात्, ऐसा आदेश दे सकता है जैसा वह उचित समझे, आदेश को, जिसके खिलाफ अपील की गई है, पुख्ता कर सकता है, संशोधित या पलट सकता है या ऐसे निर्देशों के साथ जैसा ट्रिब्यूनल सही समझे, आदेश पारित करने वाले प्राधिकरण को वह आदेश, लौटा सकता है। बिल्कुल नवीन अधिनिर्णय या आदेश, जैसाकि प्रकरण बनता हो, अतिरिक्त प्रमाण का संज्ञान लेने के बाद, जारी कर सकता है।

कर्मचारी भविष्य निधि संगठन

कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) की स्थापना भारत सरकार द्वारा कर्मचारी भविष्य निधि और विविध उपबंध अधिनियम, 1952 के अंतर्गत की गई। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन अनेक सेवाएं उपलब्ध कराता है, जैसे प्रतिष्ठान के सदस्यों द्वारा दी गई धनराशि का संग्रहण, सदस्यों के खातों की देखरेख तथा सदस्यों और उनके आश्रितों को विभिन्न लाभकारी योजनाओं के तहत् धनराशि का वितरण। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन और विविध उपबंध अधिनियम, 1952 के अंतर्गत कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति पर कई प्रकार के लाभ उपलब्ध हैं। इनमें भविष्य निधि, पारिवारिक पेंशन और जमाराशि से जुड़ा बीमा शामिल है। जम्मू एवं कश्मीर को छोड़कर यह पूरे भारत में लागू है। यह अधिनियम अनुसूची में निर्देशित सभी प्रतिष्ठानों तथा ऐसे सभी प्रतिष्ठानों जहां बीस या बीस से अधिक व्यक्ति कार्यरत हों, पर लागू होता है। इस अधिनियम के अंतर्गत तीन योजनाएं तैयार की गई हैंµकर्मचारी भविष्य निधि योजना, 1952, कर्मचारी पेंशन योजना, 1995 तथा जमा राशि से जुड़ी कर्मचारी बीमा योजना, 1976। केंद्रीय न्यासी बोर्ड त्रिपक्षीय निकाय है, जिसके अध्यक्ष केंद्रीय श्रम तथा रोजगार मंत्राी होते हैं।

कर्मचारी भविष्य निधि योजना (ईपीएफ), 1952 के प्रावधान के अंतर्गत एक कर्मचारी अपने प्रतिष्ठान में अनिवार्य जमा पूंजी के बल पर अपने को वित्तीय दृष्टि से सुरक्षित महसूस करता है।
प्रशासनिक रूप से, संगठन को जोनों में संगठित किया गया है जिनकी प्रत्येक की अध्यक्षता अतिरिक्त केंद्रीय भविष्य निधि आयुक्त करता है। राज्यों में एक या एक से अधिक क्षेत्राीय कार्यालय होते हैं जिसकी अध्यक्षता क्षेत्राीय भविष्य निधि आयुक्त (ग्रेड-I) करता है, इन्हें फिर उप-क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है, जिनकी अध्यक्षता क्षेत्राीय भविष्य निधि आयुक्त (ग्रेड-II) करता है। इनकी सहायता सहायक भविष्य निधि आयुक्त करता है। प्रत्येक जिले में एक छोटा जिला कार्यालय बनाया गया है जहां पर इन्फोर्समेंट अधिकारी स्थानीय अवस्थापनाओं की जांच करता है और शिकायतों को सुनता है।

पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण (पीएफआरडीए)

पीएफआरडीए की स्थापना भारत सरकार द्वारा 23 अगस्त, 2003 को की गई थी। विधेयक के पारित होने के लंबित रहते सरकार ने 10 अक्टूबर, 2003 के एक कार्यकारी आदेश द्वारा पीएफआरडीए को पेंशन क्षेत्रा में विनियामक के तौर पर कार्य करने के लिए अधिदेशित कर दिया था। पीएफआरडीए को भारत में पेंशन क्षेत्रा का विकास और विनियमन करने का अधिदेश प्राप्त है।
पेंशन निधि विनियामक विकास प्राधिकरण 2011 को संसद द्वारा 2013 में पारित कर दिया गया जिससे अब यह एक संविधिक निकाय बन गया है।

नई पेंशन प्रणाली सेवानिवृत्ति पर समुचित आय की व्यवस्था की समस्या के स्थायी समाधान ढूंढ़ने के सरकार के प्रयास को प्रतिबिंबित करती है। पेंशन संबंधी सुधारों की ओर पहले कदम के रूप में भारत सरकार ने सुस्पष्ट लाभ पेंशन से हटते हुए सुस्पष्ट अंशदान आधारित पेंशन को अपना लिया है और इसे 1 जनवरी, 2004 से अपनी नई भर्तियों (सशस्त्रा बलों को छोड़कर) के लिए अनिवार्य बना दिया है। 1 अप्रैल, 2008 से नई पेंशन प्रणाली में कवर किए गए केंद्र सरकार के कर्मचारियों के पेंशन अंशदानों को गैर-सरकारी भविष्य निधियों पर लागू सरकार के निवेश संबंधी मार्गनिर्देशों के अनुसार पेशेवर पेंशन निधि प्रबंधकों द्वारा निवेशित किया जा रहा है।

26 राज्य/संघ राज्य क्षेत्रा सरकारों ने भी अपने नए कर्मचारियों के लिए नई पेंशन प्रणाली अधिसूचित कर दी है। इनमें से छह राज्यों ने नई पेंशन प्रणाली के कार्यान्वयन को आगे बढ़ाने के लिए पीएफआरडीए द्वारा नियोजित एनपीएस संरचना के मध्यवर्तियों के साथ पहले ही करार हस्ताक्षरित किए जा चुके हैं। अन्य राज्य प्रलेखन तैयार करने में लगे हुए हैं।

सरकार ने घोषित किया है कि न्यू पेंशन प्रणाली (एनपीएस) 1 अप्रैल, 2009 से स्वैच्छिक आधार पर प्रत्येक नागरिक को उपलब्ध होगी। तदनुसार, पीएफआरडीए एनपीएस संरचना के विस्तार की प्रक्रिया में लगा हुआ है ताकि इसे सभी नागरिकों के लिए उपलब्ध कराया जा सके। एनपीएस संरचना पारदर्शी और वेब-समर्थित होगी। यह अभिदाता को एनपीएस के अंतर्गत अपने निवेशों और लाभों का अनुवीक्षण करने में समर्थ बनाएगी और पेंशन निधि प्रबंधक (पीएफएम) और निवेश विकल्प का चयन भी अभिदाता के पास होगा। इस ढांचे में अभिदाता को अपने निवेश विकल्पों के साथ पेंशन निधियों को बदलने की अनुमति दी गई है। पीएफएम के बीच निर्बाध सुवाह्यता और अदला-बदली की सुविधा को इस ढंग से तैयार किया गया है कि अभिदाता अपनी बचत करने की पूरी अवधि में एकल पेंशन खाता रखने में समर्थ रहें।

पीएफआरडीए ने पीएफएम के कार्यों की निगरानी के लिए भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 के अंतर्गत एक न्यास का गठन किया है। एनपीएस न्यास में विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्ति शामिल हैं और विनियामक ढांचे में विविध प्रकार की प्रतिभा लायी जाएगी।

नई पेंशन प्रणाली की ऐसी रूपरेखा बनाई गई है ताकि अभिदाता अपने भविष्य के बारे में अभीष्ट निर्णय ले सकें और वे अपने रोजगार शुरू करने के दिन से ही प्रणालीगत बचतों के माध्यम से वृद्धावस्था में भरण-पोषण की व्यवस्था करने में सक्षम हो सकें। इसमें प्रयास किया गया है कि नागरिक सेवानिवृत्ति के लिए बचत करने की आदत बनाएं।

पीएफआरडीए अभिदाताओं के हितों की रक्षा करने की अपनी कार्ययोजना के अंतर्गत वित्तीय शिक्षा और जागरूकता के लिए अपना प्रयास तेज करने का भी इच्छुक है। पीएफआरडीए के प्रयास भारत में निरंतर और सक्षम स्वैच्छिक सुस्पष्ट अंशदान आधारित पेंशन प्रणाली के विकास में मील के पत्थर हैं।

प्राधिकरण का संगठनः प्राधिकरण में एक अध्यक्ष, पांच से अनधिक सदस्य होंगे, जिसमें से कम-से-कम तीन सदस्य पूर्णकालिक होंगे और इनकी नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाएगी।
नई पेंशन प्रणाली की मुख्य विशेषताएं और संरचनाः * नई पेंशन प्रणाली स्पष्ट अंशदानों पर आधारित होगी। अंशदानों के संग्रहण हेतु इसमें बैंकों की शाखाओं और डाकघरों आदि के मौजूद तंत्रा का प्रयोग किया जाएगा। रोजगार और/अथवा स्थान परिवर्तित हो जाने के मामले में, संग्रहणों के अंतरण बिना किसी बाधा के किये जाएंगे। यह निवेश विकल्पों और निधि प्रबंधकों के समूह की भी पेशकश करेगी। यह नई पेंशन प्रणाली स्वैच्छिक होगी।

* परंतु यह प्रणाली, केंद्र सरकार की सेवा में आने वाले नए प्रवेशकर्ताओं (सशस्त्रा बलों के सिवाय) के लिए अनिवार्य होगी। मासिक अंशदान वेतन और मंहगाई भत्ते का 10 प्रतिशत होगा जो कर्मचारी द्वारा अदा किया जाएगा और केंद्र सरकार द्वारा समतुल्य राशि दी जाएगी। तथापि, उन व्यक्तियों के संबंध में जो सरकारी कर्मचारी नहीं हैं, सरकार की तरफ से कोई अंशदान नहीं होगा। अंशदान और उन पर प्रति फलों को एक अनाहरणीय पेंशन खाते में जमा कराया जाएगा। परिभाषित लाभ पेंशन और सामान्य भविष्य निधि के मौजूदा प्रावधान केंद्र सरकार की सेवा में आने वाले नए प्रवेशकर्ताओं को उपलब्ध नहीं होंगे।

* उपर्युक्त पेंशन खाते के अतिरिक्त, प्रत्येक व्यक्ति अपनी पसंद स्वैच्छिक टियर-प्प् आहरणीय खाता रख सकता है। सरकार इस खाते में कोई अंशदान नहीं करेगी। इन परिसंपत्तियों की प्रबंध-व्यवस्था उसी तरीके से होगी जैसे पेंशन की होती है। इस खाते में संग्रहणों को किसी भी समय बिना कारण बताए निकाला जा सकता है।

* व्यक्ति सामान्यतया 60 वर्ष की आयु में अथवा बाद में इस पेंशन प्रणाली से बाहर निकल सकता है। बाहर निकलते समय उस व्यक्ति से अपेक्षित होगा कि वह पेंशन धन का कम से कम 40 प्रतिशत वार्षिक खरीद में निवेश करे। सरकारी कर्मचारियों के मामले में यह वार्षिक सेवानिवृत्ति के समय कर्मचारी को जीवन पर्यंत और उस पर आश्रित माता-पिता और उसके पति/पत्नी के लिए पेंशन की व्यवस्था करेगी। वह व्यक्ति शेष पेंशन धन को एकमुश्त रूप में प्राप्त करेगा जिसका उपयोग किसी भी तरह से करने के लिए वह स्वतंत्रा होगा। व्यक्तियों को 60 वर्ष की आयु से पहले पेंशन प्रणाली छोड़ने की छूट प्राप्त होगी। लेकिन इस मामले में अनिवार्य वार्षिकीकरण पेंशन धन का 80» होगा।

* चयन के लिए एक या अधिक केंद्रीय अभिलेखपाल एजेंसी (सीआरए), अनेक पेंशन निधि प्रबंधक (पीएफएम) होंगे जो विभिन्न श्रेणियों की स्कीमों की पेशकश करेंगे।
* प्रतिभागी निकाय (पीएफएम, सीआरए आदि) पिछले कार्यनिष्पादन और नियमित निवल परिसंपत्ति मूल्य (एनएवी) के बारे में आसानी से समझी जा सकने वाली सूचना देंगे ताकि व्यक्ति अपनाई जाने वाली योजना के बारे में सुविज्ञ निर्णय ले सके।
राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग
राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग एक संवैधानिक संस्था है जिसे अन्य बातों के अतिरिक्त सफाई कर्मचारियों की विशिष्ट शिकायतों और उनके कल्याण की योजनाओं और कार्यक्रमों को लागू करने संबंधी मामलों की जांच का अधिकार दिया गया है।
आयोग में एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष एवं पांच सदस्य होते हैं। इनकी नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा सफाई कर्मचारियों के सामाजिक, आर्थिक विकास और कल्याण से संबंधित प्रतिष्ठित व्यक्तियों में से की जाती है, परंतु इनमें कम से कम एक सदस्य महिला होगी।
आयोग के कृत्य एवं शक्तियांः आयोग निम्नलिखित सभी या किन्हीं कृत्यों का पालन करेगा, अर्थात्
* सफाई कर्मचारियों के लिए हैसियत, सुविधाओं और अवसरों में असमानताओं को दूर करने के लिए समयबद्ध कार्य योजना के अधीन कार्रवाई के विनिर्दिष्ट कार्यक्रम के लिए केंद्रीय सरकार को सिफारिश करना;
* सफाई कर्मचारियों के सामाजिक और आर्थिक पुनर्वास से संबंधित कार्यक्रमों और स्कीमों के कार्यान्वयन का अध्ययन और मूल्यांकन करना तथा केंद्रीय सरकार और राज्य सरकार को ऐसे कार्यक्रमों तथा स्कीमों के बेहतर समन्वय और कार्यान्वयन के लिए सिफारिश करना;
* विनिर्दिष्ट शिकायतों का प्रन्वेषण करना और निम्नलिखित के न किए जाने से संबंधित मामलों की स्वप्रेरणा से अपेक्षा करना;
* सफाई कर्मचारियों के किसी समूह की बाबत कार्यक्रम और स्कीमें;
* सफाई कर्मचारियों की कठिनाइयों को कम करने के लिए विनिश्चय; मार्गदर्शन या अनुदेश;
* सफाई कर्मचारियों के सामाजिक और आर्थिक उत्थान के लिए अध्युपाय;
* सफाई कर्मचारियों को लागू किसी विधि के उपबन्ध और ऐसे मामलों के संबंध में संबद्ध प्राधिकारियों अथवा केन्द्रीय या राज्य सरकारों से परामर्श करना;
* सफाई कर्मचारियों द्वारा जिन कठिनाइयों या निर्योग्यताओं का सामना किया जा रहा है उनको ध्यान में रखते हुए सफाई कर्मचारियों से संबंधित किसी विषय पर केंद्रीय सरकार या राज्य सरकारों को नियतकालिक रिपोर्ट देना;
* कोई अन्य विषय जो केन्द्रीय सरकार द्वारा उसे निर्दिष्ट किए जाएं।
2. आयोग को अपने कृत्यों का निर्वहन करते समय किसी सरकार या स्थानीय या अन्य प्राधिकारी से उपर्युक्त विनिर्दिष्ट किसी विषय की बाबत जानकारी मांगने की शक्ति होगी।
भारतीय पुनर्वास परिषद्
पुनर्वास परिषद् को एक पंजीकृत सोसायटी के रूप में 1986 में स्थापित किया गया था। सितंबर 1992 को भारतीय पुनर्वास परिषद् अधिनियम संसद द्वारा पारित किया गया और उस अधिनियम के द्वारा भारतीय पुनर्वास परिषद् एक संविधिक निकाय के रूप में 22 जून, 1993 को अस्तित्व में आयी। अधिनियम को संसद द्वारा वर्ष 2000 में इसे और अधिक व्यापक बनाने के लिए इसमें संशोधन किया गया। इस जनादेश के द्वारा भारतीय पुनर्वास परिषद् की नीतियों व कार्यक्रमों को विनियमित करने, विकलांगता वाले व्यक्तियों को पुनर्वास एवं शिक्षा का दायित्व दिया गया, पाठ्यक्रमों का मानकीकरण करना और एक केंद्रीय पुनर्वास रजिस्टर सभी योग्य पेशेवरों और विशेष शिक्षा के क्षेत्रा में काम करने वाले व्यावसायिकों और कार्मिकों को एक केंद्रीय पुनर्वास पंजिका में पंजीकृत करने का कार्य सौंपा गया। इस अधिनियम के तहत् अयोग्य व्यक्तियों के द्वारा विकलांगता वाले व्यक्तियों को सेवाएं देने के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करने का अधिकार प्रदान किया गया है।
परिषद् का संगठनः राष्ट्रीय पुनर्वास परिषद् अधिनियम 1992, की धारा 3 की उपधारा (1) और (3) के अनुरूप, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार एक जनरल कौंसिल का गठन करती है। जनरल कौंसिल सर्वोच्च निकाय है और विकलांग लोगों एवं उनके मूल्यांकन हेतु प्रशिक्षण नीतियों एवं कार्यक्रमों, पेशेवरों के लिए प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों के मानकीकरण का विनियमन करती है।
परिषद् के उद्देश्य, कृत्य एवं दायित्वः * देशभर में सभी प्रशिक्षण संस्थानों में विभिन्न स्तरों पर प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों का मानकीकरण एवं नियमन करना,
* विकलांगों के पुनर्वास के संदर्भ में देश में और देश के बाहर प्रशिक्षण पाठ्यक्रम चलाने वाले प्रशिक्षण संस्थानों/विश्वविद्यालयों को मान्यता देना,
* पुनर्वास और विशिष्ट शिक्षा में अनुसंधान को बढ़ाना,
* पुनर्वास के क्षेत्रा में मान्य योग्यता रखने वाले व्यक्तियों के व्यवसायों का एक केंद्रीय पुनर्वास रजिस्टर रखना,
* पुनर्वास शिक्षा कार्यक्रम जारी रखने को प्रोत्साहन देना और इसके लिए विकलांगता के क्षेत्रा में कार्यरत संगठनों के साथ मिलकर कार्य करना,
* अक्षमता या विकलांग के लिए काम करने वाली संस्थाओं एवं संगठनों के साथ सहयोग करके पुनर्वास एवं विशेष शिक्षा के क्षेत्रा में निरंतर शिक्षा को प्रोत्साहित करना,
* व्यावसायिक पुनर्वास केंद्रों को मानव संसाधन विकास केंद्रों के रूप में मान्यता प्रदान करना,
* व्यावसायिक पुनर्वास केंद्रों में कार्यरत व्यावसायिक इंस्ट्रक्टर एवं अन्य कार्मिकों को पंजीकृत करना,
* अपंगता के सम्बद्ध राष्ट्रीय संस्थानों एवं उच्च या शीर्ष निकायों को मानव संसाधन विकास केंद्रों के तौर पर मान्यता प्रदान करना।
* अपंगता संबंधी राष्ट्रीय संस्थानों और शीर्ष संस्थानों में कार्यशील कार्मिकों को सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के अधीन पंजीकृत करना।

 

विभिन्न सांविधिक,अर्द्धन्यायिक एवं अन्य निकाय (भाग-5)

चिकित्सा संबंधी निकाय

भारतीय चिकित्सा परिषद्

चिकित्सा शिक्षा, अनुसंधान क्रियाविधि प्रशिक्षण प्रोत्साहन के मानक की निगरानी हेतु केंद्र ने नियामकीय निकाय की स्थापना की है। भारतीय चिकित्सा परिषद् की स्थापना एक विधायी संस्था के रूप में भारतीय चिकित्सा परिषद् अधिनियम, 1933 के अंतर्गत की गई, जिसे बाद में निरस्त कर भारतीय चिकित्सा परिषद् अधिनियम, 1956 (1956 का 102) लाया गया। इसे 1964, 1993 और 2001 में पुनः संशोधित किया गया।

परिषद् का संगठनः

(i) संघ क्षेत्रा के अलावा प्रत्येक राज्य से एक सदस्य जिसे केंद्र सरकार सम्बद्ध राज्य सरकार से परामर्श कर नामित करती है।

(ii) प्रत्येक विश्वविद्यालय से एक सदस्य।

(iii) प्रत्येक राज्य से एक सदस्य जहां एक राज्य चिकित्सा रजिस्टर की व्यवस्था हो।

(iv) उन व्यक्तियों में से जो किसी राज्य चिकित्सा रजिस्टर में नामांकित हो, सात सदस्यों का चयन किया जाएगा।

(v) केंद्र सरकार द्वारा आठ सदस्य नामित किए जाएंगे।

चिकित्सा परिषद् के कृत्य एवं उद्देश्यः

* परास्नातक और उच्च स्तर पर चिकित्सा शिक्षा के मानक यूनिफॉर्म की देख-रेख;

* भारतीय चिकित्सा रजिस्टर की देख-रेख;

* चिकित्सा योग्यता के वास्तविक पहचान के मामले में विदेशी राष्ट्रों के साथ परस्पर निर्भरता;

* बाहर जाने वाले चिकित्सकों के लिए चिन्हित चिकित्सा योग्यता, अतिरिक्त योग्यता का पंजीकरण तथा बेहतर प्रमाणपत्रा के मामले में चिकित्सकों का स्थायी/अस्थायी पंजीकरण;

* चिकित्सा शिक्षा चालू रखना;

* चिकित्सा कॉलेजों को मान्यता देना;

* मान्यता प्राप्त चिकित्सा योग्यता के साथ चिकित्सकों का पंजीकरण करना।

भारतीय चिकित्सा परिषद् का पुनर्गठनः

वर्ष 2006 में राष्ट्रीय ज्ञान आयोग द्वारा चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्रा में गठित शिक्षा पर कार्यदल ने विनियामक प्राधिकरण के तौर पर भारतीय चिकित्सा परिषद् (एमसीआई) के कार्यकरण एवं स्वायतत्ता के संबंध में विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की।

कार्य समूह के अनुसार, बढ़ता वैश्वीकृत विश्व पूरे देश में चिकित्सा शिक्षा के सभी स्तरों पर मानकों के प्रवर्तन और पहल करने, प्रोत्साहन, निगरानी हेतु उभरती चुनौतियों को पूरा करने के लिए एक आयामीय, परिवर्तन के प्रति प्रत्युत्तरकारी और बेहतर सूचनाबद्ध स्वायत्त विनियामक निकाय की मांग करता है। इस निकाय को स्वास्थ्य देखभाल व्यवस्था के सभी संस्तरों पर निर्देशन, प्रमाणीकरण, मानकीकरण विनियमन और चिकित्सा/स्वास्थ्य उन्मुखी शिक्षा का मूल्यांकन तथा मानव शक्ति जरूरतों की जिम्मेदारियों के साथ लैस करना चाहिए। ऐसे निकाय को पर्याप्त शक्ति के साथ जरूरी स्वायत्तता दी जानी चाहिए और इसका प्रबंधन अत्यधिक योग्य चिकित्सा शिक्षाविद्ों द्वारा किया जाना चाहिए। इसे विशुद्ध रूप से स्वायत्त संविधिक निकाय के रूप में कार्य करना चाहिए न कि मौजूदा भारतीय चिकित्सा परिषद् की तरह केंद्र सरकार को अनुशंसा देने वाले निकाय के तौर पर। कार्य दल अनुशंसा करता है कि एमसीआई को सरकारी नियंत्राण से स्वतंत्रा रखा जाना चाहिए और सौंपे गए कार्यों एवं जिम्मेदारियों को निभाने के लिए शक्ति प्रदान की जानी चाहिए।

विगत् वर्षों में एमसीआई द्वारा किए गए कार्यों के अनुभव के आधार पर कार्यसमूह ने निम्न अनुशंसाएं दींः

* चिकित्सा शिक्षा हेतु विनियामक निकाय का एक पूर्णकालिक अध्यक्ष होना चाहिए।

* नए संगठन गठित करने की बजाय, मौजूदा एमसीआई का पुनर्गठन किया जाए और इसकी शक्तियों एवं क्षेत्रा में वृद्धि की जाए जिसके लिए अधिनियम में उचित संशोधन किया जाए।

* अध्यक्ष, जो एक पेशेवर होगा, को चुनने के लिए उपराष्ट्रपति की अध्यक्षता में एक तीन सदस्यीय सर्च कमेटी गठित की जाए जिसमें एक वैज्ञानिक/शिक्षाविद् और लोकसभा अध्यक्ष होंगे।

* अध्यक्ष उच्च शिक्षा के लिए नियामक निकाय को चलाने हेतु जिम्मेदार होगा।

केंद्रीय औषध मानक नियंत्राण संगठन

केंद्रीय औषध मानक नियंत्राण संगठन (सीडीएससीओ) भारतीय दवा एवं चिकित्सा उपकरणों के लिए एक राष्ट्रीय विनियामक निकाय है। औषधि एवं प्रसाधन अधिनियम के अंतर्गत केंद्र सरकार द्वारा सौंपे गए कृत्यों का निर्वहन करने के लिए यह केंद्रीय औषधि प्राधिकरण है।

सीडीएससीओ में, भारतीय औषधि महानियंत्राक (डीसीजीआई) औषधि एवं चिकित्सा उपकरणों का विनियमन करता है। इस कार्य में डीजीसीआई को औषधि तकनीकी परामर्शी बोर्ड (डीटीएबी) और औषध परामर्श समिति (डीसीसी) सलाह देते हैं। इसे जोन कार्यालयों में विभाजित किया गया है जो लाइसेंस पूर्व एवं लाइसेंस पश्चात् निरीक्षण, बाजार पश्चात् निगरानी, और आवश्यकता होने पर बुलाते हैं।

औषध एवं कॉस्मेटिक अधिनियम के अंतर्गत, औषधि उत्पादन, बिक्री और वितरण का विनियमन राज्य प्राधिकरण का कार्य है जबकि नई औषधियों के अनुमोदन, देश में क्लीनिकल ट्रायल, औषधि के लिए मानकों का निर्धारण, आयातित औषधियों की गुणवत्ता नियंत्राण, राज्य औषधि नियंत्राण संगठन की गतिविधियों का समन्वय और औषधि एवं कॉस्मेटिक अधिनियम के प्रवर्तन में एकात्मकता लाने के विचार से विशेषज्ञ परामर्श प्रदान करना केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है।

सीडीएससीओ के कृत्यः

* औषधि के आयात पर विनियामक नियंत्राण, नई औषधियों एवं क्लीनिकल ट्रायल्स का अनुमोदन, औषधि परामर्शीय समिति एवं औषधि तकनीकी सलाहकारी बोर्ड की बैठकें, केंद्रीय लाइसेंस अनुमोदन प्राधिकरण के तौर पर कुछ विशिष्ट लाइसेंसों की अनुमति देना, इत्यादि सीडीएससीओ के कृत्य हैं।

* जोनल कार्यालय संयुक्त निरीक्षण करते हैं और अपने अधिकार क्षेत्रा के तहत् राज्य औषधि नियंत्राकों के साथ समन्वय करते हैं।

* आयातित औषधियों का गुणवत्ता नियंत्राण पत्तन कार्यालयों द्वारा किया जाता है।

* टेस्ट के लिए भेजे गए औषधि नमूनों का परीक्षण औषधि परीक्षण प्रयोगशालाओं द्वारा किया जाता है।

राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण

राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) की स्थापना, संसद में चर्चा के आधार पर, औषध नीति 1986 के संशोधनों में निरूपित उदारवादी प्रक्रिया के क्रम में वर्ष 1994 में कल्पित की गई थी।

औषध नीति, 1986 में संसाधनों का अनुमोदन करते हुए आर्थिक मामलों पर मंत्रिमंडल-समिति ने सितंबर, 1994 में राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण कहलाए जाने वाले विशेषज्ञों के एक स्वतंत्रा निकाय की स्थापना का अनुमोदन किया और उसके आलोक में एनपीपीए प्राधिकरण की स्थापना और विशेषीकृत कार्यों को उसे सौंपने सम्बन्धी सरकारी संकल्प 29 अगस्त, 1997 को अधिसूचित किया गया। इस प्रकार एनपीपीए दिनांक 29 अगस्त, 1997 से पूरी तरह से कार्यात्मक रूप में आ गया।

मूल्य निर्धारण, औषध (मूल्य नियंत्राण) आदेश, 1995 (डीपीसीओ) का क्रियान्वयन, औषध (मूल्य नियंत्राण) आदेश, 1995 के अधीन अनुसूचित प्रपुंज औषधों एवं विनिर्मितियों के निर्धारित/संशोधित मूल्यों का प्रवर्तन और गैर-अनुसूचित औषधों के मूल्यों के अनुश्रवण से सम्बन्धित सरकार की शक्तियों एवं कार्यों को 4 सितंबर, 1997 को राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण को प्रत्यायोजित कर दिया गया।

राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण, भारत सरकार के रसायन और उर्वरक मंत्रालय के रसायन और पेट्रोरसायन विभाग के अधीन विशेषज्ञों का एक स्वतंत्रा निकाय है। एनपीपीए में लागत निर्धारण, तकनीकी (औषध) और आर्थिक क्षेत्रा से पेशेवर समन्वय से कार्य करते हैं।

* मूल्य निर्धारण और पुनर्विलोकन करना।

* स्थापित मापदण्ड/दिशानिर्देशों के आधार पर समावेशन/अपवर्जन द्वारा मूल्य नियंत्राण के अधीन औषधों की सूची को अद्यतन।

* अनियंत्रित औषधों एवं विनिर्मितियों के मूल्यों का अनुश्रवण करना।

* प्रत्यायोजित शक्तियों के अनुसार डीपीसीओ, 1995 के प्रावधानों का क्रियान्वयन एवं प्रवर्तन करना।

* प्राधिकरण के निर्णयों से उत्पन्न होने वाले सभी कानूनी मामलों पर कार्रवाई करना।

* औषधों की उपलब्धता को मॉनिटर करना, कोई कमी यदि हो तो उसका पता लगाना और सुधारात्मक उपाय करना।

* प्रपुंज औषधों और विनिर्मितियों के लिए उत्पादन, निर्यात और आयात, अलग-अलग कंपनियों के मार्किट शेयर, उनकी लाभदेयता के आंकड़े एकत्रा करना और उनका रख-रखाव करना।

* औषधों और भेषजों के मूल्य निर्धारण के संबंध में संभावित अध्ययन करना/प्रायोजित करना।

* औषध-नीति में परिवर्तन/संशोधन के संबंध में केंद्रीय सरकार को परामर्श देना।

* औषध मूल्य निर्धारण से संबंधित संसदीय कार्य से संबंधित मामलों में केंद्रीय सरकार की सहायता करना।

* प्राधिकरण के अधिकारियों और स्टाफ के अन्य सदस्यों की सरकार द्वारा निर्धारित नियमों और प्रक्रियाओं के अनुसार भर्ती/नियुक्ति करना।

* सरकार द्वारा प्रदत्त शक्तियों के अनुसार औषध (मूल्य नियंत्राण) आदेश के उपबंधों को लागू करना।

भारतीय औषधि परिषद्

भारतीय औषधि परिषद् भारत का एक संविधिक निकाय है जो औषधि अधिनियम, 1948 के प्रावधानों से निर्देशित होता है। यह निकाय फार्मेसी अधिनियम के अंतर्गत भेषजज्ञ (फार्मासिस्ट) के तौर पर पंजीकरण करने के उद्देश्य हेतु देश में औषधि शिक्षा का विनियमन करती है और औषधि के पेशे और प्रैक्टिस को विनियमित करती है।

परिषद् का संगठनः

(क) छह सदस्यों जो विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा चुने जाते हैं, में से कम से कम प्रत्येक विषयµऔषधीय रसायन विज्ञान, औषधिशाला, औषधि विज्ञान में एक प्राध्यापक होगा।

(ख) छह सदस्यों, जिनमें से कम से कम चार सदस्य फार्मेसी संबंधी डिग्री या डिप्लोमा धारक होते हैं और फार्मेसी या औषधीय रसायन विज्ञान में प्रैक्टिस करते हैं, केंद्र सरकार द्वारा नामित किए जाते हैं।

(ग) एक सदस्य को भारतीय चिकित्सा परिषद् के सदस्य अपने में से चुनते हैं।

(घ) स्वास्थ्य सेवाओं का महानिदेशक पदे्न सदस्य होता है या यदि वह कोई मीटिंग में उपस्थित होने में असमर्थ है तो वह व्यक्ति जिसे वह लिखित में इसके लिए प्राधिकृत करता है, सदस्य होगा।

(ङ) भारत का औषधि नियंत्राक, पदे्न सदस्य होता है।

(च) केंद्रीय औषधि प्रयोगशाला का निदेशक, पदे्न सदस्य होता है।

(छ) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का एक प्रतिनिधि और अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् का एक प्रतिनिधि।

(ज) प्रत्येक राज्य का एक प्रतिनिधि सदस्य जिसे सम्बद्ध राज्य परिषद् के सदस्यों द्वारा चुना जाएगा और जो एक पंजीकृत भेषजज्ञ (फार्मासिस्ट) होगा।

(झ) प्रत्येक राज्य का एक प्रतिनिधि सदस्य जिसे सम्बद्ध राज्य सरकार द्वारा चुना जाएगा।

परिषद् के कृत्य एवं दायित्वः

* भेषजज्ञ के तौर पर अर्हता प्राप्त करने के लिए शिक्षा के न्यूनतम मानक तैयार करना।

* पूरे देश में एक समान शैक्षिक मानकों के क्रियान्वयन को सुनिश्चित करना।

* फार्मेसी अधिनियम के तहत् अनुमोदन चाहने वाले संस्थानों का वांछित मानकों की उपलब्धता के सत्यापन के लिए जांच करना।

* केंद्रीय भेषजज्ञ रजिस्टर का प्रबंधन करना।

* भेषजज्ञों के लिए अध्ययन पाठ्यक्रम एवं परीक्षा का अनुमोदन करना।

* अनुमोदन को निरस्त करना, यदि भारतीय औषधि परिषद् द्वारा उपबंधित शैक्षिक मानकों के साथ अनुमोदित अध्ययन पाठ्यक्रम या अनुमोदित परीक्षण निरंतर सुसंगत नहीं है।

भारतीय दंत परिषद्

भारतीय दंत परिषद्, जो एक संविधिक निकाय है, का गठन दंत चिकित्सक अधिनियम, 1948 के अंतर्गत 12 अप्रैल, 1949 को किया गया। परिषद् का वित्त पोषण मुख्यतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार के अनुदान द्वारा होता है और परिषद् की आय का अन्य òोत विभिन्न राज्य दंत परिषदों के शुल्क में एक-चौथाई हिस्सा है।

परिषद् का संगठनः

(i) एक पंजीकृत दंत चिकित्सक;

(ii) भारतीय चिकित्सा परिषद् के सदस्यों में से चुना गया एक सदस्य;

(iii) राज्यों के दंत कॉलेजों के प्रिंसिपल, वाइस प्रिंसिपल, निदेशक, डीन में से चुने गए चार से अनधिक सदस्य;

(iv) राज्यों के मेडिकल कॉलेजों के दंत विभाग के अध्यक्ष;

(v) प्रत्येक विश्वविद्यालय से एक सदस्य;

(vi) एक प्रतिनिधि सदस्य;

(vii) केंद्र सरकार द्वारा नामित 6 सदस्य; और

(viii) पदे्न स्वास्थ्य सेवाओं का महानिदेशक।

परिषद् के कृत्य एवं दायित्वः

* स्नातक एवं परास्नातक स्तर पर दंत चिकित्सा के एकसमान मानकों का प्रबंधन करना।

* दंत चिकित्सकों के प्रशिक्षण, दंत स्वच्छता इत्यादि पर मानकों को अनुशंसित करना।

* अधिनियम के अंतर्गत परीक्षण के मानकों एवं अन्य आवश्यकताओं का प्रबंधन करना।

विभिन्न सांविधिक,अर्द्धन्यायिक एवं अन्य निकाय (भाग-4)

शिक्षा संबंधी निकाय

अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद्

अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् (एआईसीटीआई) का गठन सन् 1945 में किया गया और एआईसीटीई अधिनियम, 1987 के तहत् एक संविधिक निकाय बना। परिषद् का गठन पूरे देश में तकनीकी शिक्षा तंत्रा के सहयोगी विकास एवं उचित नियोजन के विचार के साथ किया गया। तकनीकी शिक्षा में नियोजित मात्रात्मक संवृद्धि एवं मापदंडों एवं मानकों की उचित व्यवस्था तथा विनियमन के संबंध में ऐसी शिक्षा के गुणात्मक सुधार को प्रोत्साहित करना। अधिनियम में उल्लिखित एआईसीटीई के संविधिक निकाय हैं परिषद्, कार्यकारी समिति, क्षेत्राीय समितियां एवं अखिल भारतीय अध्ययन बोर्ड। परिषद् एक 51 सदस्यीय निकाय है जिसमें 1 अध्यक्ष, उपाध्यक्ष एवं सदस्य सचिव हैं जिनकी पूर्णकालिक नियुक्ति होती है। इसके अतिरिक्त परिषद् में भारत सरकार के विभिन्न विभागों के प्रतिनिधि, राज्यसभा एवं लोकसभा के प्रतिनिधि शामिल हैं। परिषद् का मुख्यालय नई दिल्ली में अवस्थित है।

परिषद् के कृत्य एवं दायित्वः * तकनीकी शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में सर्वेक्षण कराना, सम्बद्ध मामलों पर आंकड़े एकत्रित करना और तकनीकी शिक्षा में जरूरी संवृद्धि एवं विकास का अनुमान लगाना।

* देश में सभी स्तरों पर तकनीकी शिक्षा के विकास को समन्वित करना।

* परिषद् के वित्तीय कोष का आबंटन ऐसे अनुदानों, ऐसी सेवा शर्तों पर करना जोµ;पद्ध तकनीकी संस्थानों, एवं विकास ;पपद्ध विश्वविद्यालयों में तकनीकी शिक्षा के विकास के लिए उपयुक्त हो।

* नई एवं स्थापित तकनीकियों, पीढ़ियों में नवाचारों, शोध एवं विकास को प्रोत्साहित करना और शिक्षा पद्धति के सर्वांगीण विकास के लिए और विकास की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नई तकनीकियों को अपनाना एवं अनुकूलन करना।

* समाज के कमजोर वर्गों, विकलांगों एवं महिलाओं के लिए तकनीकी शिक्षा प्रदान करने हेतु योजनाएं तैयार करना।

* अनुसंधान एवं विकास संगठनों, उद्योगों एवं समुदायों को शामिल करते हुए तकनीकी शिक्षा व्यवस्था एवं अन्य सम्बद्ध व्यवस्थाओं के बीच एक प्रभावी सम्पर्क सूत्रा को बढ़ावा देना।

* ट्यूशन एवं अन्य शुल्कों के लिए मापदण्ड एवं निर्देश निर्धारित करना।

* पाठ्यक्रम, शारीरिक एवं निर्देशात्मक सुविधाएं, स्टाफ पैटर्न, स्टाफ योग्यताएं, गुणवत्तापरक निर्देश, मूल्यांकन एवं परीक्षाओं हेतु मापदण्ड एवं मानक तैयार करना।

* तकनीकी संस्थानों को स्वायत्तता देने संबंधी मापदण्ड तैयार करना।

* तकनीकी शिक्षा के व्यापारीकरण को रोकने हेतु सभी आवश्यक कदम उठाना।

* किसी तकनीकी संस्थान की जांच करना।

* परिषद् द्वारा निर्धारित मापदण्डों एवं मानकों पर तकनीकी संस्थानों एवं कार्यक्रमों के आवधिक मूल्यांकन हेतु एक राष्ट्रीय एक्रीडिटेशन (मान्यता) बोर्ड का गठन करना।

* अन्य ऐसे कार्य करना जो इसे सौंपे जाएं।

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद्

1973 से अपनी पूर्व स्थिति में राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् (एनसीटीई) अध्यापक शिक्षा से संबंधित सभी मामलों में केंद्रीय और राज्य सरकारों के लिए एक सलाहकार निकाय थी जिसका सचिवालय राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान तथा प्रशिक्षण परिषद् (एनसीईआरटी) के अध्यापक शिक्षा विभाग में स्थित था। शैक्षणिक क्षेत्रों में इसके प्रशंसनीय कार्य के बावजूद यह अध्यापक शिक्षा में मानकों का पालन सुनिश्चित करने तथा घटिया अध्यापक शिक्षा संस्थानों की बहुलता रोकने के अपने अनिवार्य विनियामक कार्य नहीं कर सकी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनपीई) 1986 और उसके अधीन कार्य योजना ने अध्यापक शिक्षा की प्रणाली में आमूलचूल सुधार लाने की दिशा में पहले उपाय के रूप में एक संविधिक दर्जे और आवश्यक संसाधनों से युक्त राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् की परिकल्पना की गई थी। राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् अधिनियम, 1993 (1993 का 73वां) के अनुसरण में एक संविधिक निकाय के रूप में राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् 17 अगस्त, 1995 को स्थापित की गई।

उद्देश्यः राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् (एनसीटीई) का मुख्य उद्देश्य समूचे देश के भीतर अध्यापक शिक्षा प्रणाली की नियोजित और समन्वित उन्नति प्राप्त करना, अध्यापक शिक्षा प्रणाली में मानदण्डों और मानकों का विनियमन करना और उन्हें बनाए रखना तथा तत्संबंधी मामलों की देखभाल करना है। एनसीटीई को दिया गया अध्यादेश अत्यंत व्यापक है और वह अध्यापक शिक्षा कार्यक्रमों के समूचे कार्यक्षेत्रा को समाहित करता है जिसमें स्कूलों में, पूर्व-प्राथमिक, प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तरांे पर तथा गैर-औपचारिक शिक्षा, अंशकालिक शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा तथा दूरस्थ शिक्षा (पत्राचार) शिक्षा पाठ्यक्रमों को पढ़ाने के लिए व्यक्तियों को सुसज्जित करने के निमित्त अनुसंधान तथा व्यक्तियों का प्रशिक्षण शामिल है।

संगठनात्मक ढांचाः एनसीटीई का मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है तथा इसके संविधिक दायित्वों की पूर्ति करने के लिए इसकी चार क्षेत्राीय समितियां हैं, जो बंगलुरू, भोपाल, भुवनेश्वर तथा जयपुर में स्थित हैं। एनसीटीई को नियोजित और समन्वित विकास तथा अध्यापक शिक्षा में नवाचारों की शुरुआत करने सहित अपने आबंटित कार्य निष्पादित करने में समर्थ बनाने के उद्देश्य से दिल्ली स्थित एनसीटीई में और साथ ही इसकी चार क्षेत्राीय समितियों में वित्त, स्थापना और विधिक मामलों और अनुसंधान, नीति नियोजन, मॉनीटरन, पाठ्यचर्चा, नवाचारों, पुस्तकालय तथा प्रलेखन, सेवाकालीन कार्यक्रमों पर कार्रवाई करने के लिए क्रमशः प्रशासनिक और शैक्षणिक स्कन्ध हैं। एनसीटीई मुख्यालय अध्यक्ष की अध्यक्षता में तथा प्रत्येक क्षेत्राीय समिति क्षेत्राीय निदेशक की अध्यक्षता में काम करती है।

क्षेत्राीय समितियांः जैसाकि राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् (एनसीटीई) अधिनियम के खण्ड 20 में परिकल्पना की गई है पूर्वी, पश्चिमी, उत्तरी और दक्षिणी क्षेत्रों में अध्यापक शिक्षा के संबंध में अपने संविधिक दायित्वों की देखभाल करने के लिए एनसीटीई की चार क्षेत्राीय समितियां हैं। क्षेत्राीय निदेशक की अध्यक्षता में ये समितियां क्रमशः भुवनेश्वर, भोपाल, जयपुर तथा बंगलुरू में स्थित हैं।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग

भारत का, प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक, उच्च शिक्षा के इतिहास में सदैव महत्वपूर्ण स्थान रहा है। प्राचीन काल में नालंदा, तक्षशिला एवं विक्रमशिला विश्वविद्यालय, उच्च प्रशिक्षण के सुप्रसिद्ध पीठ थे जिनमें न केवल हमारे ही देश के छात्रा आकर्षित होते थे, बल्कि सुदूरवर्ती देशों, जैसेµकोरिया, चीन, बर्मा (म्यांमार), सीलोन (श्रीलंका), तिब्बत एवं नेपाल आदि के छात्रा भी आकर्षित होते थे। आज भारतवर्ष, विश्व के उच्चतम स्तर पर शिक्षा प्रणाली का प्रबंधन करता है।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी), देश में अनुदान प्रदान करने वाला एकमात्रा ऐसा अनूठा अभिकरण है जिसके अंतर्गत दो उत्तरदायित्व निहित हैं, पहला है निधि उपलब्ध कराना तथा दूसरा है उच्च शिक्षण संस्थानों में परस्पर समन्वयन, निर्धारण तथा मानकों का अनुरक्षण करना।

यूजीसी के विभिन्न स्वायत्त केंद्रः (i) इन्टर यूनिवर्सिटी एक्सीलरेटर सेंटर (पूर्व-न्यूक्लियर साइंस सेंटर); (ii) इंटर यूनिवर्सिटी सेन्टर फॉर एस्ट्रोनॉमी एण्ड एस्ट्रोफिजिक्स (IUCAA) पुणे, महाराष्ट्र; (iii) यूजीसी-(DAE) कंसोर्शियम फॉर साइंटिफिक रिसर्च (1989); (iv) कंसोर्शियम फॉर एजूकेशनल कम्यूनिकेशन (CEC) (1991); (v) सूचना एवं पुस्तकालय संचार तंत्रा (INFLIBNET (vi) अंतरराष्ट्रीय अध्ययन का अंतर-विश्वविद्यालय केंद्र तथा (IUCIS) (vii) राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद् (NAAC)

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का कार्यकरणः * विश्वविद्यालयी शिक्षा को प्रोन्नत एवं उसका समन्वयन करना।

* विश्वविद्यालयों में अध्यापन, परीक्षाओं एवं अनुसंधान के मानकों को निर्धारित एवं अनुरक्षित करना।

* शिक्षा के न्यूनतम मानकों पर विनियम तैयार करना।

* विश्वविद्यालयी/महाविद्यालयी शिक्षा के क्षेत्रों में विकास का पर्यवेक्षण करना तथा विश्वविद्यालयों/महाविद्यालयों के अनुदानों का संवितरण करना।

* संघ एवं राज्य सरकारों एवं उच्च शिक्षण संस्थानों के मध्यम एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में सेवाएं प्रदान करना।

* विश्वविद्यालयी शिक्षा में सुधार लाने के लिए जो उपाय आवश्यक हैं, उनके विषय में केंद्रीय एवं राज्य सरकारों को परामर्श प्रदान करना।

आयोग के उद्देश्यः राष्ट्रीय शिक्षण नीति (1986) के अनुसरण में, आयोग द्वारा अपनी कार्यप्रणाली को विकेन्द्रित करते हुए राज्यों की आवश्यकतानुसार 7 राज्यों में क्षेत्राीय कार्यालयों को खोला गया। इन कार्यालयों को स्थापित करने का लक्ष्य, विकेन्द्रीकरण, क्रियान्वयन तथा यह सुनिश्चित करना था कि देश भर में अनेक महाविद्यालय, जो कि यूजीसी अधिनियम की धारा (2च) एवं (12ख) से आवृत्त हैं उन्हें उनकी आवश्यकता एवं समस्यानुसार अधिकाधिक सुविधाएं सरलतापूर्वक उपलब्ध करायी जा सकें।

यूजीसी का निष्पादन मूल्यांकनः यूजीसी के भूतपूर्व अध्यक्ष हरि गौतम की अध्यक्षता में एक पैनल गठित किया गया जिसने अप्रैल 2015 में केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय को यूजीसी के कार्य के संबंध में अपनी रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं

* यूजीसी को समाप्त कर दिया जाना चाहिए और इसके स्थान पर एक राष्ट्रीय उच्च शिक्षा प्राधिकरण बनाया जाना चाहिए। यूजीसी के पुनर्गठन का कोई कार्य बेकार साबित होगा।

* यूजीसी अपना कार्य करने में विफल हो गया है। यह उभरती विविध जटिलताओं को देखने में योग्य नहीं रहा है।

* इस पर पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं। यूजीसी ने शिक्षा में उत्कृष्टता स्थापित करने के अपने कार्य को दरकिनार कर दिया है।

* यूजीसी के अध्यक्ष को जवाबदेह बनाया जाए और तीन वर्ष में एक बार और पांच वर्ष के उनके कार्यकाल के अंत में उनके कार्य निष्पादन का मूल्यांकन किया जाए, जो कार्य मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा गठित समिति करे।

* यूजीसी की शक्तियों का धीरे-धीरे क्षरण हो रहा है।

* योगा और दिव्य साधना को विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए।

* उपकुलपति बनने के 10 वर्ष के प्रोफेसर के मापदण्ड को समाप्त कर दिया जाना चाहिए।

हरि गौतम समिति की अनुशंसाओं के जवाब में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने कहा कि यूजीसी को एकपक्षीय तौर पर समाप्त नहीं किया जा सकता क्योंकि इसका गठन संसद के अधिनियम के माध्यम से किया गया है। शस्त्रा विश्वविद्यालय, तंजावुर के उपकुलपति आर. सेथुरमन ने कहा कि यूजीसी जैसा संविधिक निकाय विश्वविद्यालय शिक्षा के लिए जरूरी नीति वाहक है और मात्रा अनुदान वितरण प्राधिकरण नहीं हो सकता।

हालांकि, यूजीसी के भूतपूर्व सदस्य मानते हैं कि यूजीसी अपने कार्य में विफल नहीं हुआ है, लेकिन विगत समय में, नौकरशाही के कारण, यह अपनी सेवाओं को प्रदान करने में अक्षम रहा है। वैकल्पिक संरचना का सृजन समस्या का समाधान नहीं करेगा।

विभिन्न सांविधिक,अर्द्धन्यायिक एवं अन्य निकाय (भाग-3)

उद्यम संबंधी निकाय

भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण

भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) का गठन भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण अधिनियम, 1988 द्वारा किया गया। यह इसे सौंपे गए राष्ट्रीय राजमार्गों के विकास, रख-रखाव एवं प्रबंधन की जिम्मेदारी संभालता है। प्राधिकरण ने फरवरी, 1995 में एक पूर्णकालिक अध्यक्ष और अन्य सदस्यों के साथ काम करना शुरू किया।

एनएचएआई का मिशन है वैश्विक मानकों के अनुरूप राष्ट्रीय राजमार्गों का प्रबंधन एवं रख-रखाव करना एवं उपयोगकर्ताओं की आशाओं को समयबद्ध एवं न्यूनतम लागत में पूरा करना जिससे आर्थिक संपन्नता एवं लोगों की गुणवत्तापरक जीवन की संवृद्धि की जा सके।

प्राधिकरण में एक अध्यक्ष होता है, पांच से अनधिक पूर्णकालिक सदस्य होते हैं और चार से अनधिक अंशकालिक सदस्य होते हैं।

एनएचएआई को राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना (एनएचडीपी) के क्रियान्वयन हेतु अधिकृत किया गया है जो अबाधित परिवहन प्रवाह के साथ विश्वस्तरीय सड़क निर्माण का अभी तक का भारत का सबसे बड़ा राजमार्ग प्रोजेक्ट है। भारत सरकार ने एनएचडीपी के विभिन्न चरणों के माध्यम से राष्ट्रीय राजमार्गों के उन्नयन एवं सशक्तिकरण के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।

एनएचएआई के कृत्य इस प्रकार हैं

* इसे सौंपे गए एवं इसमें निहित राजमार्गों का सर्वेक्षण, विकास, रख-रखाव एवं प्रबंधन करना;

* इसे सौंपे गए एवं इसमें निहित राजमार्गों के नजदीक या इन पर कार्यालय या वर्कशॉप्स निर्मित करना और होटल, मोटल, रेस्टोरेंट एवं विश्राम गृह बनाना एवं उनका प्रबंधन करना;

* अपने कर्मचारियों के लिए अवासीय भवन एवं टाउनशिप बनाना;

* राजमार्गों से सम्बद्ध मामलों पर केंद्र सरकार को सलाह देना;

* सेवाओं और प्रदत्त लाभों के लिए केंद्र सरकार की तरफ से शुल्कों का संग्रह करना;

* दिए गए कार्यों को दक्षतापूर्वक करने के लिए कम्पनी अधिनियम, 1956 के तहत् एक या एक से अधिक कम्पनी बनाना।

* राजमार्गों के विकास हेतु योजना के निर्माण एवं कार्यान्वयन में पूर्व निर्धारित सहमति एवं सेवा शर्तों पर राज्य सरकार को मदद करना;

* इसको प्रदत्त किसी कार्य को करने के लिए शक्तियों का प्रयोग करना और सभी जरूरी एवं महत्वपूर्ण कदम उठाना।

रेलवे सुरक्षा आयोग

रेलवे सुरक्षा आयोग एक उच्चस्तरीय संविधिक निकाय है जो रेलवे अधिनियम, 1989 के अंतर्गत नई रेलवे लाइनों की जांच, खुली लाइनों की जांच, गंभीर रेल दुर्घटनाओं की जांच, और कुछ अन्य खास कृत्य जो रेलवे सुरक्षा से सम्बद्ध हैं, करता है।

लखनऊ में स्थित रेलवे सुरक्षा मुख्य आयुक्त, आयोग का मुखिया होता है, जो रेलवे सुरक्षा से जुड़े सभी मामलों पर केंद्र सरकार के प्रधान तकनीकी सलाहकार के तौर पर भी कार्य करता है। रेलवे सुरक्षा मुख्य आयुक्त (सीसीआरएस) के प्रशासनिक नियंत्राणाधीन रहते हुए 9 रेलवे सुरक्षा आयुक्त (सीआरएस) होते हैं, जिसमें से प्रत्येक 16 जोनल (रेल) में से एक या अधिक पर अधिकार क्षेत्रा रखता है। इसके अतिरिक्त मेट्रो रेल, कोलकाता; डीएमआरसी, दिल्ली; एमआरटीपी, चेन्नई और कोंकण रेलवे भी इनके अधिकार क्षेत्रा में आती हैं। जब आवश्यकता होती है तब मुख्यालय, लखनऊ में सीसीआरसी की सहायता हेतु 5 रेलवे सुरक्षा उपायुक्त नियुक्त किए जाते हैं। इसके अतिरिक्त, सिग्नल एवं दूरसंचार से सम्बद्ध मामलों में रेलवे सुरक्षा आयुक्त की मदद के लिए मुम्बई एवं कोलकाता, प्रत्येक में 2 फील्ड उपायुक्त होते हैं।

रेलवे सुरक्षा आयोग रेलवे अधिनियम, 1989, में उल्लिखित रेल यात्रा एवं संचालन से सम्बद्ध सुरक्षा हेतु कार्य करने वाली संविधिक संस्था है, जो अन्वेषणीय, जांच करने वाली और सलाहकारी प्रकृति की है। आयोग रेलवे अधिनियम एवं समय-समय पर जारी कार्यकारी निर्देशों के तहत् बनाए गए नियमों से दुर्घटना मामलों में संविधिक जांच करता है। आयोग का बेहद महत्वपूर्ण कार्य है यह सुनिश्चित करना कि यात्राी परिवहन के लिए खुली नई लाइन रेल मंत्रालय द्वारा जारी मानकों एवं नियमों के अनुसार है या नहीं और नई लाइन यात्राी परिवहन के लिए सभी तरह से सुरक्षित है।

रेलवे दावा न्यायाधिकरण

रेलवे दावा ट्रिब्यूनल अधिनियम, 1987 रेलवे प्रशासन के खिलाफ नुकसान, विध्वंस, हानि, या पशुओं या सामान न पहुंचा पाने या किराया या मालभाड़ा लौटाने या यात्रियों की मृत्यु या चोट की क्षतिपूर्ति करने (रेलवे दुर्घटना की स्थिति में) या रेलवे से संबंधित अन्य मामलों के लिए एक रेलवे दावा ट्रिब्यूनल के गठन का प्रावधान करता है। रेलवे दावा ट्रिब्यूनल में एक अध्यक्ष, चार उपाध्यक्ष और न्यायिक सदस्यों और तकनीकी सदस्यों की ऐसी संख्या जो केंद्र सरकार उचित समझे, होंगे।

अपने कृत्यों का निर्वहन करने के लिए ट्रिब्यूनल को निम्न मामलों में दीवानी न्यायालय के समान शक्तियां प्राप्त होंगी

* किसी व्यक्ति को ट्रिब्यूनल के समक्ष उपस्थित होने का सम्मन भेजना और शपथ देकर उसका मूल्यांकन करना;

* दस्तावेजों की खोज एवं प्रस्तुति की मांग करना;

* शपथपत्रा पर प्रमाण प्राप्त करना;

* साक्ष्यों या दस्तावेजों के परीक्षण हेतु समिति गठित करना;

* स्वयं के निर्णयों की समीक्षा करना;

* डिफॉल्ट के लिए आवेदन रद्द करना;

* डिफॉल्ट (अयोग्य) के लिए किसी आवेदन को रद्द करने के आदेश को एक तरफ रखना;

* अन्य कोई मामला जो अनुशंसित किया गया हो।

विमानपत्तन आर्थिक विनियामक प्राधिकरण अपीलीय ट्रिब्यूनल

विमानपत्तन आर्थिक विनियामक प्राधिकरण अपीलीय ट्रिब्यूनल (एईआरएएटी) की स्थापना विमानपत्तन आर्थिक विनियामक प्राधिकरण अधिनियम, 2008 के अंतर्गत दो या अधिक सेवा प्रदाताओं के बीच किसी विवाद या सेवा प्रदाताओं और उपभोक्ता के समूह के बीच किसी विवाद के अधिनिर्णयन के लिए और विमानपत्तन आर्थिक विनियामक प्राधिकरण के किसी निर्देश, निर्णय या आदेश के विरुद्ध किसी अपील को सुनने एवं इसका निपटान करने के लिए की गई।

अपीलीय ट्रिब्यूनल दोनों पक्षों को सुनने का अवसर देने के पश्चात् ऐसा आदेश दे सकता है जो वह सही समझे। कोई व्यक्ति जो जानबूझकर अपीलीय ट्रिब्यूनल के आदेश की अनुपालना नहीं करता है उस पर जुर्माना आरोपित किया जाएगा जो 1 लाख रुपए तक हो सकता है और दूसरी एवं निरंतर अपराध की स्थिति में यह दो लाख रुपए तक हो सकता है और निरंतर उल्लंघन की स्थिति में इसमें अतिरिक्त जुर्माना जो दो लाख रुपए प्रतिदिन तक का हो सकता है। ट्रिब्यूनल के आदेश के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील की जा सकती है। किसी भी न्यायालय को किसी भी मामले एवं प्रक्रिया को देखने का अधिकार नहीं होगा जिसे अधिनियम के अंतर्गत देखने की अधिकारिता अपीलीय ट्रिब्यूनल की होगी।

अपीलीय ट्रिब्यूनल में एक अध्यक्ष एवं दो से अनधिक सदस्य होंगे जिनकी नियुक्ति केद्र सरकार द्वारा की जाएगी।

विमानपत्तन आर्थिक विनियामक प्राधिकरण

विमानपत्तन आर्थिक विनियामक प्राधिकरण (एईआरए) की स्थापना मई, 2009 में भारत सरकार द्वारा की गई। प्राधिकरण में एक अध्यक्ष एवं दो अन्य सदस्य होते हैं जिनकी नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाती है। प्राधिकरण के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा वैमानिकी, कानून, अर्थव्यवस्था, वाणिज्य या उपभोक्ता मामलों का ज्ञान एवं पेशेवर अनुभव रखने वाले योग्य लोगों में से की जाएगी।

भारतीय विमानपत्तन आर्थिक विनियामक प्राधिकरण अधिनियम, 2008 में उल्लिखित उपबंधों के अनुरूप एईआरए के निम्न संविधिक कृत्य हैं

(क) वैमानिकी सेवाओं के शुल्कों के निर्धारण में ध्यान रखा जाता है,

(i) पूंजीगत व्यय को उठाना और विमानपत्तन सुविधाओं के सुधार में समयबद्ध निवेश करना

(ii) प्रदान की गई सेवा की गुणवत्ता एवं अन्य सम्बद्ध कारक,

(iii) कार्यक्षमता के सुधार की लागत,

(iv) बड़े एवं प्रमुख विमानपत्तनों का मितव्ययी एवं सक्षम संचालन,

(v) वैमानिकी सेवाओं के अतिरिक्त सेवाओं से प्राप्त राजस्व

(vi) केंद्र सरकार द्वारा किसी समझौते, सहमति या एमओयू में किसी प्रकार की रियायत,

(vii) अन्य कोई कारक जो इस अधिनियम के उद्देश्यों के लिए प्रासंगिक हो सकता है।

(ख) प्रमुख विमानपत्तनों के संबंध में विकास शुल्क की राशि का निर्धारण करना।

(ग) विमान नियम, 1937 के नियम 88 के अंतर्गत आरोपित यात्राी सेवा शुल्क की राशि का निर्धारण करना

(घ) सेवा गुणवत्ता, निरंतरता एवं विश्वसनीयता से सम्बद्ध तय निष्पादन मानकों, जैसा कि केंद्र सरकार या अन्य प्राधिकृत प्राधिकरण द्वारा विशेषित किया गया हो, की निगरानी करना।

(ङ) उपबंध ;कद्ध के तहत् शुल्कों के निर्धारण हेतु ऐसी सूचना मांगना जो आवश्यक हो।

(च) शुल्क से सम्बद्ध अन्य ऐसे कृत्य, जो केंद्र सरकार द्वारा इसे सौंपे गए हों या इस अधिनियम के प्रावधानों की पूर्ति के लिए अत्यावश्यक हों।

दूरसंचार विवाद निपटान एवं अपीलीय ट्रिब्यूनल

अध्यादेश द्वारा ट्राई अधिनियम, 1997 का संशोधन किया गया, जो 24 जनवरी, 2000 से प्रभावी हुआ। इसके द्वारा दूरसंचार विवाद निपटान एवं अपीलीय ट्रिब्यूनल (टीडीएसएटी) को स्थापित किया गया, जिसने ट्राई से अधिनिर्णयन एवं विवाद निपटान कृत्यों को हस्तगत कर लिया। टीडीएसएटी की स्थापना लाइसेंस प्रदानकर्ता एवं लाइसेंस प्राप्तकर्ता के बीच किसी विवाद, दो या दो से अधिक सेवा प्रदाताओं के मध्य, सेवा प्रदाता और उपभोक्ताओं के समूह के मध्य विवाद का निपटान करने और ट्राई के किसी आदेश, निर्णय या निर्देश के खिलाफ अपील को सुनने एवं उसका निपटान करने के लिए किया गया।

अपीलीय ट्रिब्यूनल में एक अध्यक्ष एवं दो से अधिक सदस्यों की नियुक्ति, अधिसूचना द्वारा केंद्र सरकार द्वारा की जाती है।

अपीलीय ट्रिब्यूनल सिविल आचार संहिता 1908 द्वारा निर्धारित प्रक्रिया से बंधा नहीं है, लेकिन प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों से निर्देशित होता है और इस अधिनियम के अन्य प्रावधानों के विषयगत है, अपीलीय ट्रिब्यूनल को स्वयं की प्रक्रियाओं को विनियमित करने की शक्ति होगी। ट्रिब्यूनल के पास, उसके कृत्यों के निर्वहन के लिए, सिविल आचार संहिता, 1908 के तहत् दीवानी न्यायालय में निहित शक्तियों के समान शक्तियां होंगी, जब वह निम्न मामलों से संबंधित प्रकरणों पर विचार करता हैµ

* किसी व्यक्ति को उसके समक्ष प्रस्तुत होने का सम्मन भेजना और बाध्य करना;

* किसी दस्तावेज की प्रस्तुति की मांग करना;

* शपथपत्रा पर साक्ष्य प्राप्त करना;

* भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 123 और 124 के प्रावधानों के विषयाधीन रहते हुए, किसी कार्यालय से किसी सार्वजनिक रिकॉर्ड, या दस्तावेज या ऐसे रिकॉर्ड या दस्तावेज की छायाप्रति की आवश्यकता;

* साक्ष्य या दस्तावेज के परीक्षण हेतु आयोग गठित करना;

* स्वयं के निर्णयों की समीक्षा करना;

* कोई अन्य मामला, जो इसे संदर्भित किया गया हो।

भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई)

भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) की स्थापना भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण अधिनियम, 1997 द्वारा दूरसंचार सेवाओं को विनियमित करने हेतु 20 फरवरी, 1997 को की गई। ट्राई का मिशन देश में दूरसंचार के विकास के लिए दशाओं को इस प्रकार निर्मित करना है जिससे भारत उदीयमान वैश्विक सूचना समाज में एक अग्रणी भूमिका निभाने में सक्षम हो सकेगा। स्वच्छ प्रतिस्पर्द्धा सुसाध्य एवं सभी को बराबरी का अवसर देने के लिए निष्पक्ष एवं पारदर्शी नीति का माहौल प्रदान करना ट्राई का मुख्य उद्देश्य है।

प्राधिकरण में एक अध्यक्ष एवं न्यूनतम दो और अधिकतम छह सदस्य होते हैं, तथा इनकी नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाती है। अध्यक्ष ऐसा व्यक्ति होगा जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश है या रहा हो या वह उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश हो या रहा हो। सदस्य ऐसा व्यक्ति होगा जिसे दूरसंचार, उद्योग, वित्त, लेखांकन, विधि, प्रबंधन एवं उपभोक्ता मामलों के क्षेत्रा में से किसी में विशेष ज्ञान एवं पेशेवर अनुभव है।

ट्राई के कृत्य एवं दायित्वः

* नए सेवा प्रदाताओं हेतु समय एवं जरूरतों की अनुशंसा करना।

* एक सेवा प्रदाता के लिए लाइसेंस की सेवा शर्तों की अनुशंसा करना।

* विभिन्न सेवा प्रदाताओं के बीच तकनीकी सुसंगतता एवं प्रभावी अंतर्संपर्क सुनिश्चित करना।

* सेवा प्रदाताओं को दूरसंचार सेवाओं के प्रदायन से प्राप्त राजस्व का सेवा प्रदाताओं के बीच हिस्सेदारी के प्रबंध का विनियमन करना।

* लाइसेंस हेतु सेवा शर्तों के अनुपालन को सुनिश्चित करना।

* विभिन्न सेवा प्रदाताओं के मध्य दूरसंचार की स्थानीय एवं लंबी दूरी सर्किटों की समयावधि सुनिश्चित करना।

* दूरसंचार सेवाओं के प्रचालन में प्रतिस्पर्द्धा को सुसाध्य बनाना और कार्यदक्षता को बढ़ावा देना ताकि इन सेवाओं में संवृद्धि हासिल की जा सके।

* दूरसंचार सेवा के उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करना।

* सेवा की गुणवत्ता की निगरानी करना और सेवा प्रदाताओं द्वारा मुहैया कराई गई ऐसी सेवाओं का आवधिक सर्वेक्षण करना।

* नेटवर्क में प्रयुक्त उपकरण की जांच करना और सेवा प्रदाताओं द्वारा किस प्रकार के उपकरणों के प्रयोग करने की अनुशंसा करना।

* सेवा प्रदाताओं के मध्य विवादों का निपटारा करना।

* विनियमों द्वारा निर्धारित, इन सेवाओं के संबंध में, दरों पर शुल्क एवं अन्य भारों का आरोपण करना।

* सार्वभौमिक सेवा दायित्वों के प्रभावी अनुपालन को सुनिश्चित करना; और

* ऐसे अन्य कार्य करना, जिसमें प्रशासनिक एवं वित्तीय कार्य भी शामिल हैं, जो केंद्र सरकार द्वारा उसे सौंपे गए हैं।

 नागर विमानन महानिदेशालय

नागर विमानन महानिदेशालय (डीजीसीए) नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अधीन एक भारतीय सरकारी नियामक संगठन है। भारत में उड्डयन के क्षेत्रा में डीजीसीए नागरिक उड़ान नियमों को लागू करने वाला एक प्रमुख निकाय है। यह महानिदेशालय विमानन दुर्घटनाओं एवं घटनाओं की जांच करता है। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में है। विनियमन एवं पूर्व गतिशील सुरक्षा निगरानी तंत्रा द्वारा सुरक्षित एवं दक्ष वायु परिवहन को प्रोत्साहित करने का उद्यम करना निदेशालय का मिशन है।

महानिदेशालय के कृत्य एवं दायित्वः स विभिन्न प्रकार के विमान को प्रमाणित करना।

* नागरिक विमानों का पंजीकरण करना।

* हल्के विमानों, ग्लाइडरों और एयरोड्रम की निगरानी करना।

* हवाई अड्डों और विमान वाहकों को लाइसेंस जारी करना।

* विमान अधिनियम, 1937 के प्रावधानों के अंतर्गत देश से, देश को और देश के भीतर विमान यातायात सेवाओं का नियमन करना।

* विभिन्न देशों के साथ द्विपक्षीय उड़ान सेवाओं सहित विमान परिवहन से संबद्ध मामलों पर सरकार को सलाह देना।

* विमान चालकों और विमान रखरखाव इंजीनियरों को लाइसेंस जारी करना, और विमान कर्मी मानकों की निगरानी करना।

* विमान अधिनियम 1934 और विमानन अधिनियम 1937 तथा संबंधित अन्य कानूनों में संशोधन करना ताकि शिकागो संधि और उसके अनुलग्नकों के प्रावधानों को तथा विमानन संबंधी अन्य अंतरराष्ट्रीय समझौतों को देश में लागू किया जा सके।

* भारत में नागरिक विमानों के पंजीकरण के लिए उड़ान योग्य आवश्यकताओं को देखना और उपयुक्त विमानों को प्रमाणपत्रा जारी करना।

* उड़ान ग्लाइडिंग क्लबों की प्रशिक्षण गतिविधियों पर निगरानी रखना।

* उड़ान के दौरान होने वाली दुर्घटनाओं की जांच और सरकार द्वारा नियुक्त न्यायालय, जांच समितियों को तकनीकी सहायता उपलब्ध कराना।

* अंतरराष्ट्रीय नागरिक विमानन संगठनों से संबंद्ध कार्यों में समन्वय स्थापित करना।

बीमा विनियामक विकास प्राधिकरण

वर्ष 1999 में, बीमा विनियामक विकास प्राधिकरण (इरडा) का बीमा उद्योग के विकास एवं विनियमन हेतु एक स्वायत्त निकाय के रूप में गठन किया गया। इरडा अधिनियम, 1999 के तहत् अप्रैल, 2000 में इरडा को एक संविधिक निकाय के तौर पर शामिल किया गया। इरडा के मुख्य उद्देश्यों में प्रतिस्पर्द्धा को प्रोत्साहित करना ताकि उपभोक्ता की पसंद में बढ़ोतरी और प्रीमियम में कमी द्वारा उपभोक्ता की संतुष्टि में वृद्धि की जा सके, जबकि बीमा बाजार की वित्तीय सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

प्राधिकरण में दस सदस्यों का एक समूह होता है, इन सभी को केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता है, जिसमें (क) एक अध्यक्ष; (ख) पांच पूर्णकालिक सदस्य; एवं (ग) चार अंशकालिक सदस्य होते हैं।

पॉलिसी धारकों के हितों की रक्षा करना प्राधिकरण का मिशन है। साथ ही बीमा क्षेत्रा में तीव्र एवं संयमित वृद्धि लाना, आम आदमी के लाभ हित में बढ़ोतरी करना, और अर्थव्यवस्था की संवृद्धि में वृद्धि हेतु दीर्घावधिक वित्त मुहैया कराना; बीमा क्षेत्रा को नियमित करने वाले नियामकों के समन्वय के उच्च मानकों, वित्तीय सुघटता, स्वच्छ व्यवहार एवं सक्षमता को प्रोत्साहित, निर्धारित, निगरानी एवं लागू करना; वास्तविक दावों के तीव्र निपटान को सुनिश्चित करना, बीमा घोटालों और अन्य कुप्रथाओं को रोकना और प्रभावी शिकायत निपटान तंत्रा के सुपुर्द करना; वित्तीय बाजार में बीमा संव्यवहारों में ईमानदारी, पारदर्शिता एवं व्यवस्थित व्यवहार को बढ़ावा देना और बाजार निर्धारकों के बीच वित्तीय सुघटता के उच्च मानदंड लागू करने के लिए एक विश्वसनीय प्रबंधन सूचना तंत्रा निर्मित करना; जहां ऐसे मानक अपर्याप्त या अप्रभावी हैं, वहां उचित कार्रवाई करना।

इरडा के कृत्य एवं दायित्वः इरडा अधिनियम, 1993 इरडा के कृत्यों, शक्तियों एवं दायित्वों का निर्धारण करता है। प्राधिकरण का दायित्व बीमा व्यवसाय एवं पुनर्बीमा व्यवसाय की सुव्यवस्थित वृद्धि की सुनिश्चितता, प्रोत्साहन एवं विनियमन करना है। प्राधिकरण के कृत्यों एवं दायित्वों में शामिल हैंः

* आवेदक को पंजीकरण के पुनर्नवीकरण, संशोधन, हटाने, निलम्बित या रद्द करने का दस्तावेज जारी करना;

* बीमा कंपनियों की लेखा परीक्षक रिपोर्ट और वित्तीय विवरण तैयार करना;

* बीमा मध्यवर्तियों को विनियमित करना;

* पुनर्बीमा संबंधी दिशा-निर्देश जारी करना;

* पॉलिसी धारकों के हितों का संवर्द्धन करना;

* ऋणशोधन क्षमता की सीमा के प्रबंधन का विनियमन करना;

* बीमाकर्ता और मध्यवर्तियों या बीमा मध्यवर्तियों के बीच विवादों का अधिनिर्णयन करना;

* ग्रामीण या सामाजिक क्षेत्रा में बीमाधारकों का संज्ञान लेकर जीवन बीमा व्यवसाय और सामान्य बीमा व्यवसाय के प्रतिशत को निर्धारित करना।

राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निपटान आयोग

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के अंतर्गत, राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निपटान (एनसीडीआरसी) आयोग का गठन वर्ष 1988 में किया गया। इसका अध्यक्ष भारत के उच्चतम न्यायालय का कार्यकारी या सेवानिवृत्त न्यायाधीश होता है। इसमें 10 सदस्य होते हैं।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 एक कल्याणकारी सामाजिक विधान है जो उपभोक्ताओं के अधिकारों को निर्धारित करता है और इन्हें अपना प्रोत्साहन एवं संरक्षण प्रदान करता है। यह भारत में इस प्रकार का प्रथम एवं एकमात्रा अधिनियम है, जिसने आम उपभोक्ता को कम खर्चीला एवं शिकायत का तीव्र निपटान हेतु सक्षम बनाया।

सस्ता, तीव्र एवं संक्षिप्त उपभोक्ता शिकायत निपटान हेतु प्रत्येक जिले, राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर अर्द्ध-न्यायिक निकाय गठित किए गए हैं जिन्हें क्रमशः जिला फोरम, राज्य उपभोक्ता शिकायत निपटान आयोग एवं राष्ट्रीय उपभोक्ता शिकायत निपटान आयोग कहा जाता है। मौजूदा समय में 629 जिला फोरम एवं 35 राज्य आयोग हैं। राष्ट्रीय स्तर पर एक एनसीडीआरसी है। इसका कार्यालय नई दिल्ली में है।

उपभोक्ता फोरम की प्रक्रियाएं प्रकृति में संक्षिप्त होती हैं। उपभोक्ता को जल्द से जल्द आराम दिलाने का भरसक प्रयास किया जाता है। यदि कोई उपभोक्ता जिला फोरम के निर्णय से संतुष्ट नहीं है, तो वह राज्य आयोग में अपील कर सकता है। राज्य आयोग के फैसले के विरुद्ध उपभोक्ता राष्ट्रीय आयोग में जा सकता है।

राष्ट्रीय आयोग को सभी राज्य आयोगों पर प्रशासनिक नियंत्राण की शक्तियां प्रदान की गई हैं।

राष्ट्रीय आयोग को निम्न के संबंध में निर्देश जारी करने की शक्ति प्रदान की गई हैः

* मामले की सुनवाई में एक समान प्रक्रिया अपनाने;

* एक पार्टी द्वारा दूसरी पार्टी को सौंपे जाने वाले दस्तावेज प्रस्तुत कराने;

* दस्तावेजों को तीव्र अनुमति; और

* आमतौर पर राज्य आयोगों एवं जिला फोरमों के कार्यकरण की निगरानी यह सुनिश्चित करने के लिए करना कि आयोग उनकी अर्द्ध-न्यायिक स्वतंत्राता में बिना किसी हस्तक्षेप के अधिनियम के उद्देश्यों एवं लक्ष्यों को भली-भांति पूरा करे।

भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण

भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (एएआई) का गठन संसद के एक अधिनियम द्वारा किया गया तथा यह तत्कालीन राष्ट्रीय विमानपत्तन प्राधिकरण तथा भारतीय अंतरराष्ट्रीय विमानपत्तन प्राधिकरण के विलय के माध्यम से 1 अप्रैल, 1995 को अस्तित्व में आया। इस विलय से एक एकल संगठन अस्तित्व में आया जिसे देश में जमीन पर एवं वायु क्षेत्रा में भी नागर विमानन अवसंरचना के सृजन, उन्नयन, अनुरक्षण एवं प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंपी गई।

भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण 125 विमानपत्तनों का प्रबंधन करता है जिसमें 11 अंतरराष्ट्रीय विमानपत्तन, 8 सीमा शुल्क विमानपत्तन, 81 घरेलू विमानपत्तन तथा रक्षा वायु क्षेत्रों में 27 सिविल एंक्लेव शामिल हैं। भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण 2.8 मिलियन वर्ग नॉटिकल मील के हवाई अंतरिक्ष में हवाई नेविगेशन की सुविधाएं उपलब्ध कराता है।

भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण के कार्यः भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण के कार्य इस प्रकार हैंः

  1. अंतरराष्ट्रीय एवं घरेलू विमानपत्तनों का डिजाइन, विकास, प्रचालन एवं अनुरक्षण।
  2. आईसीएओ द्वारा यथा स्वीकृत देश की भौगोलिक सीमाओं के बाद भारतीय वायु अंतरिक्ष का नियंत्राण एवं प्रबंधन।
  3. यात्राी टर्मिनलों का निर्माण, सुधार एवं प्रबंधन।
  4. अंतरराष्ट्रीय एवं घरेलू विमानपत्तनों पर कार्गो टर्मिनलों का विकास एवं प्रबंधन
  5. विमानपत्तनों के यात्राी टर्मिनलों पर यात्राी सुविधाओं एवं सूचना प्रणाली का प्रावधान।
  6. प्रचालन क्षेत्रा अर्थात् रनवे, एप्रन, टैक्सी वे आदि का विस्तार एवं सुदृढ़ीकरण।
  7. विजुअल एड्स का प्रावधान।
  8. संचार एवं नेविगेशन एड्स अर्थात् आईएलएस, डीवीओआर, डीएमई, रडार आदि का प्रावधान।

एएआई की वर्तमान स्थिति एवं निष्पादनः सुरक्षित विमान प्रचालन हेतु भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण सभी विमानपत्तनों एवं 25 अन्य स्थानों पर जमीनी अधिष्ठापनों के साथ संपूर्ण भारतीय वायु क्षेत्रा एवं समीपवर्ती महासागरीय क्षेत्रों में वायु ट्रैफिक प्रबंधन सेवाएं (एटीएमएस) प्रदान करता है।

इलाहाबाद, अमृतसर, कालीकट, गुवाहाटी, जयपुर, त्रिवेंद्रम, कोलकाता एवं चेन्नई के विमानपत्तन, जो आज अंतरराष्ट्रीय विमानपत्तन के रूप में स्थापित हैं, विदेशी अंतरराष्ट्रीय एयरलाइनों द्वारा भी प्रचालन के लिए खुले हैं। कोयबंटूर, तिरुचिरापल्ली, वाराणसी एवं गया के हवाई अड्डों से अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के अलावा राष्ट्रीय ध्वज वाहक भी प्रचालन करते हैं। केवल इतना ही नहीं अपितु आज आगरा, कोयंबटूर, जयपुर, लखनऊ, पटना आदि के विमानपत्तनों तक टूरिस्ट चार्टर भी जाते हैं।

भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण ने मुम्बई, दिल्ली, हैदरबाद, बंगलुरू एवं नागपुर के विमानपत्तनों के उन्नयन के लिए तथा विश्वस्तरीय मानकों से बराबरी करने के लिए एक संयुक्त उद्यम भी स्थापित किया है।

भारतीय विमानपत्त प्राधिकरण द्वारा कोलकाता एवं चेन्नई के वायु ट्रैफिक नियंत्राण केंद्रों पर देशज प्रौद्योगिकी का प्रयोग करके ऑटोमेटिक डिपेंडेंस सर्विलांस सिस्टम (एडीएसएस) के सफल कार्यान्वयन ने भारत को दक्षिण पूर्व एशियाई क्षेत्रा में इस उन्नत प्रौद्योगिकी का प्रयोग करने वाला पहला देश होने का गौरव प्रदान किया जिससे उपग्रह आधारित संचार प्रणाली का प्रयोग करके महासागरीय क्षेत्रों के ऊपर वायु ट्रैफिक का प्रभावी नियंत्राण संभव हुआ है। उपग्रह संचार लिंक के साथ रिमोट कंट्रोल्ड वीएचएफ कवरेज के प्रयोग ने हमारे एटीएमएस को और मजबूती प्रदान की है। वी-सैट अधिष्ठापनों द्वारा 80 स्थानों को जोड़ने से बड़े पैमाने पर वायु ट्रैफिक प्रबंधन में वृद्धि होगी और बदले में एयरक्राफ्ट के प्रचालन की सुरक्षा वृद्धि होगी। इसके अलावा, हमारे बृहत् एयरपोर्ट नेटवर्क पर प्रशासनिक एवं प्रचालनात्मक नियंत्राण संभव होगा। मुम्बई, दिल्ली एवं इलाहाबाद के विमानपत्तनों पर निष्पादन आधारित नेविगेशन (पीएनबी) प्रक्रिया पहले ही कार्यान्वित की जा चुकी है।

भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण ने भारतीय अंतरिक्ष एवं अनुसंधान केंद्र (इसरो) के साथ प्रौद्योगिकीय सहयोग से गगन परियोजना शुरू की है जहां नेविगेशन के लिए उपग्रह आधारित प्रणाली का प्रयोग किया जाएगा। इस प्रकार जीपीएस से प्राप्त नेविगेशन के संकेतों को हवाई जहाजों की नेविगेशन संबंधी आवश्यकता को पूरा करने के लिए उन्नत किया जाएगा। प्रौद्योगिकी प्रदर्शन प्रणाली का पहला चरण फरवरी 2008 में पहले ही सफलतापूर्वक पूरा हो गया है। प्रचालनात्मक चरण में इस प्रणाली को स्तरोन्नत करने के लिए विकास टीम को सक्षम बनाया गया है।

भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण ने दिल्ली एवं मुम्बई के विमानपत्तनों पर ग्राउंड बेस्ड ऑगमेंटेशन सिस्टम (जीबीएएस) उपलब्ध कराने की भी योजना बनाई है। यह जीबीएएस उपकरण हवाई जहाजों को श्रेणी-2 (वक्र एप्रोच) लैंडिंग सिग्नल उपलब्ध कराने और इस प्रकार आगे चलकर लैंडिंग सिस्टम के विद्यमान उपकरण को प्रतिस्थापित करने में समर्थ होगा, जिसकी रनवे के प्रत्येक छोर पर जरूरत होती है।

ग्राहकों की अपेक्षाएं पर अधिक बल के साथ भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण के प्रयास को उस स्वतंत्रा एजेंसी से उत्साहवर्धक प्रत्युत्तर मिला है जिसने 30 व्यस्त विमानपत्तनों पर ग्राहक संतुष्टि सर्वेक्षण संचालित किया है। इन सर्वेक्षणों ने हमें विमानपत्तनों के प्रयोक्ताओं द्वारा सुझाए गए पहलुओं पर सुधार करने में समर्थ बनाया है। विमानपत्तनों पर हमारे ‘व्यवसाय उत्तर पत्रा’ के लिए रिसेप्टुकल लोकप्रिय हुए हैं; इन प्रत्युत्तरों ने हमें विमानपत्तनों के प्रयोक्ताओं की बदलती महत्वाकांक्षाओं को समझने में समर्थ बनाया है। सहòाब्दि के पहले वर्ष के दौरान, भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण अपने प्रचालन को अधिक पारदर्शी बनाने तथा अधुनातन सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग करके ग्राहकों को तत्काल सूचना उपलब्ध कराने के लिए प्रयास कर रहा है।

विशिष्ट प्रशिक्षण, कर्मचारी प्रत्युत्तर में सुधार तथा व्यावसायिक कौशल के उन्नयन पर फोकस स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण की चार प्रशिक्षण स्थापनाओं अर्थात् नागरिक विमानन प्रशिक्षण कॉलेज (सीएटीसी), इलाहाबाद; राष्ट्रीय विमानन प्रबंधन एवं अनुसंधान संस्थान (एनआईएएमएआर), दिल्ली और कोलकाता स्थित अग्नि प्रशिक्षण केंद्र (एफटीसी) के बारे में ऐसी अपेक्षा है कि वे पहले से अधिक व्यस्त रहेंगे।

भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण ने सीएटीसी, इलाहाबाद एवं हैदराबाद एयरोपोर्ट पर प्रशिक्षण सुविधाओं को स्तरोन्नत करने की भी पहल की है। हाल ही में सीएटीसी पर एयरपोर्ट विजुअल सिमुलेटर (एवीएस) उपलब्ध कराया गया है तथा सीएटीसी, इलाहाबाद एवं हैदराबाद एयरपोर्ट को गैर-रडार प्रक्रियात्मक एटीसी सिमुलेटर उपकरण की आपूर्ति की जा रही है।

भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण की एक समर्पित उड़ान निरीक्षण यूनिट (एफआईयू) है तथा इसके बेड़े में तीन हवाई जहाज हैं जो निरीक्षण में समर्थ अधुनातन एवं पूर्णतः स्वचालित उड़ान निरीक्षण प्रणाली से सुसज्जित हैं।

खादी और ग्रामोद्योग आयोग

खादी और ग्रामोद्योग आयोग संसद के एक अधिनियम, 1956 के 61वें तथा 1987 के अधिनियम 12 एवं 2006 के अधिनियम 10 के द्वारा सृजित विधिविहित संगठन है और अप्रैल 1957 में स्थापित इस संगठन ने अखिल भारतीय खादी और ग्रामोद्योग मंडल से कार्यभार हाथ में लिया। यह संगठन सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग मंत्रालय तथा भारत सरकार के प्रशासनिक नियंत्राण में कार्यरत है।

आयोग में एक अध्यक्ष, वित्तीय सलाहकार, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, मुख्य सतर्कता अधिकारी है जिनकी नियुक्ति केंद्र सरकार करती है।

उद्देश्यः आयोग ने मुख्य रूप से निम्नलिखित व्यापक उद्देश्य निर्धारित किए हैंः

* रोजगार प्रदान करने का सामाजिक उद्देश्य।

* बिक्री योग्य वस्तुओं का उत्पादन करने का आर्थिक उद्देश्य; और

* जनता में आत्मनिर्भरता एवं सुदृढ़ ग्राम स्वराज की भावना पैदा करने का व्यापक उद्देश्य।

कार्यः आयोग के प्रमुख कार्य एवं उत्तरदायित्व निम्नलिखित हैंः

* ग्रामीण विकास में लगे अन्य अभिकरणों से समन्वय स्थापित कर ग्रामीण क्षेत्रों में खादी और अन्य ग्रामोद्योग के विकास के लिए कार्यक्रमों की योजना बनाते हुए इसे संवर्द्धित, संगठित तथा कार्यान्वित करना।

* खादी और ग्रामोद्योग में लगे कारीगरों के लिए प्रशिक्षण का आयोजन तथा उनमें सहयोगात्मक प्रयास की भावना उत्पन्न करना।

* उत्पादकों की आपूर्ति हेतु कच्चा माल एवं औजारों के संग्रह को बढ़ाना।

* अनिर्मित माल के रूप में कच्चा माल के प्रशोधन हेतु सामान्य सेवा सुविधा का सृजन; तथा

* खादी और ग्रामोद्योगी उत्पादों के विपणन हेतु सुविधा का प्रावधान करना।

* खादी और/अथवा ग्रामोद्योगी उत्पाद अथवा हस्तकलाओं की बिक्री एवं विपणन की प्रोन्नति हेतु आयोग जहां भी संभव एवं आवश्यक हो, स्थापित विपणन अभिकरणों से संपर्क कर सकता है।

* उत्पादकता बढ़ाने, श्रम को कम करने एवं उनकी स्पर्द्धात्मक क्षमता बढ़ाने एवं ऐसे अनुसंधान से प्राप्त प्रमुख परिणामों के प्रचार-प्रसार की व्यवस्था करने की दृष्टि से गैर-परंपरागत ऊर्जा एवं विद्युत ऊर्जा के उपयोग के साथ-साथ खादी और ग्रामोद्योगी क्षेत्रा में उपयोग लायी जा रही उत्पादन तकनीकी एवं औजारों में अनुसंधान को प्रोत्साहित एवं संवर्द्धित करने तथा इससे संबंधित समस्याओं के अध्ययन की सुविधा प्रदान करने का उत्तरदायित्व आयोग पर है।

* आयोग खादी और ग्रामोद्योगों के विकास एवं कार्यान्वयन हेतु संस्थाओं तथा व्यक्तियों को वित्तीय सहायता प्रदान करता है तथा डिजाइन की आपूर्ति, प्रोटोटाइप तथा अन्य तकनीकी सूचना के माध्यम से उनका मार्गदर्शन करता है।

* खादी और ग्रामोद्योग की गतिविधियों को क्रियान्वित करने में आयोग उत्पादों की वास्तविकता एवं गुणवत्ता मानक तथा मानक के अनुरूप उत्पादों को सुनिश्चित करता है।

* आयोग खादी और ग्रामोद्योगों के विकास हेतु प्रमुख परियोजनाओं के अनुसंधान अथवा तैयार करने के अलावा, संबंधित खादी और ग्रामोद्योगी समस्याओं का प्रत्यक्ष रूप से अथवा अन्य अभिकरणों के माध्यम से अध्ययन करता है।

आयोग अपनी गतिविधियों से संबंधित किसी अन्य अनुषांगिक मामले को संचालित करने के अलावा किसी अन्य अथवा उपरोक्त समस्त मामले को संचालित करने के उद्देश्य हेतु अन्य संगठनों की स्थापना तथा उसके अनुरक्षण हेतु प्राधिकृत है।

ऊर्जा दक्षता ब्यूरो

भारत सरकार ने, ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 के उपबंधों के अंतर्गत 1 मार्च, 2002 को ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (बीईई) की स्थापना की। ऊर्जा दक्षता ब्यूरो का मिशन, ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 के समग्र ढांचे के अन्दर स्व-विनियमन और बाजार सिद्धांतों पर महत्व देते हुए ऐसी नीतियों और रणनीतियों का विकास करने में सहायता देना है जिनका प्रमुख उद्देश्य भारतीय अर्थव्यवस्था में ऊर्जा की गहनता को कम करना है। यह तभी प्राप्त किया जा सकता है जब इसमें सभी पण्यधारियों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित हो तथा परिणामस्वरूप सभी क्षेत्रों में ऊर्जा दक्षता को अधिकाधिक एवं सतत् रूप से अपनाया जाए।

बीईई की भूमिकाः बीईई, ऊर्जा संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत इसे सौंपे गए कार्यों को करने के लिए अभिहित उपभोक्ताओं, अभिहित अभिकरणों और अन्य संगठनों के साथ समन्वय करके मौजूदा संसाधनों और अवसंरचना को मान्यता देने, इनकी पहचान करने तथा इस्तेमाल का कार्य करता है। ऊर्जा संरक्षण अधिनियम में विनियामक और संवर्द्धनात्मक कार्यों का प्रावधान है।

विनियामक कार्यः बीईई के प्रमुख विनियामक कार्यों में निम्नलिखित कार्य शामिल हैंµ

* उपकरण और उपस्करों के लिए न्यूनतम ऊर्जा निष्पादन मानकों और लेबलिंग डिजाइन का विकास करना।

* विशिष्ट ऊर्जा संरक्षण भवन निर्माण संहिता का विकास करना।

* अभिहित उपभोक्ताओं पर केन्द्रित गतिविधियां

* विशिष्ट ऊर्जा खपत मानदंडों का विकास करना

* ऊर्जा प्रबंधकों और ऊर्जा संपरीक्षकों का प्रमाणन

* ऊर्जा संपरीक्षकों को प्रत्यायन

* अनिवार्य ऊर्जा संपरीक्षक का तरीका और आवधिकता निश्चित करना

* ऊर्जा खपत एवं ऊर्जा संपरीक्षकों की सिफारिशों पर की गई कार्रवाई की रिपोर्ट देने का प्रोफार्मा तैयार करना

बीईई के प्रमुख संवर्द्धनात्मक कार्यः

* ऊर्जा दक्षता और संरक्षण पर जागरूकता उत्पन्न करना एवं इसका प्रसार करना

* ऊर्जा के दक्ष उपयोग और इसके संरक्षण के लिए तकनीकों के कार्मिकों और विशेषज्ञों के प्रशिक्षण की व्यवस्था करना और आयोजन करना।

* ऊर्जा संरक्षण के क्षेत्रा में परामर्शी सेवाओं का सुदृढ़ीकरण

* अनुसंधान और विकास का संवर्द्धन

* परीक्षण और प्रमाणन पद्धतियों का विकास करना और परीक्षण सुविधाओं का संवर्द्धन

* प्रायोगिक परियोजनाओं तथा निदर्शन परियोजनाओं के कार्यान्वयन का निरूपण एवं सरलीकरण

* ऊर्जा दक्ष प्रक्रियाओं, उपकरण, युक्तियों और प्रणालियों के इस्तेमाल को बढ़ावा देना

* ऊर्जा दक्ष उपकरण अथवा उपस्करों के इस्तेमाल के लिए तरजीही व्यवहार को प्रोत्साहन देने के लिए कदम उठाना।

* ऊर्जा दक्ष परियोजनाओं के नूतन निधियन को बढ़ावा देना

* ऊर्जा के दक्ष उपयोग को बढ़ावा देने और इसका संरक्षण करने के लिए संस्थाओं को वित्तीय सहायता देना

* ऊर्जा के दक्ष उपयोग और इसके संरक्षण पर शैक्षणिक पाठ्यक्रम तैयार करना

ऊर्जा के दक्ष उपयोग और इसके संरक्षण से संबंधित अंतरराष्ट्रीय सहयोग के कार्यक्रमों को क्रियान्वित करना

केंद्रीय विद्युत विनियामक आयोग

केंद्रीय विद्युत विनियामक आयोग (सीईआरसी) एक वैधानिक निकाय है जो विद्युत अधिनियम 2003 की धारा-76 के अंतर्गत कार्यरत है। केन्द्रीय विद्युत विनियामक आयोग को शुरू में विद्युत विनियामक आयोग अधिनियम, 1998 के अंतर्गत 24 जुलाई, 1998 को गठित किया गया था।

मिशनः आयोग की थोक विद्युत बाजारों में प्रतिस्पर्द्धा, कार्यकुशलता और मितव्ययिता को बढ़ावा देने, सप्लाई की गुणवत्ता में सुधार करने, मांग आपूर्ति के अंतर, जिससे ग्राहकों के हितों का सम्पोषण हो, को पाटने के लिए संस्थागत बाधाओं को दूर करने के संबंध में सरकार को सलाह देने की योजना है।

आयोग के उद्देश्यः

* भारतीय विद्युत ग्रिड संहिता, उपलब्धता आधारित टैरिफ (एबीटी) के माध्यम से क्षेत्राीय पारेषण प्रणालियों के प्रचालन और प्रबंधन में सुधार करना,

* एक कारगर टैरिफ निर्धारण तंत्रा को तैयार करना जिससे थोक विद्युत और पारेषण सेवाओं की कीमत के संबंध में मितव्ययिता और कार्यकुशलता और न्यूनतम लागत पर निवेश सुनिश्चित होगा,

* अंतर-राज्यिक पारेषण में निर्बाध पहुंच को सरल बनाना,

* अंतर-राज्यिक व्यापार को सरल बनाने के लिए एक बाजार संरचना के सृजन द्वारा विद्युत बाजार के विकास को प्रोत्साहन देना,

* सभी पण्यधारियों के लिए जानकारी देने में सुधार,

* थोक ऊर्जा तथा पारेषण सेवाओं में प्रतिस्पर्द्धात्मक बाजार के विकास के लिए अपेक्षित तकनीकी तथा संस्थानिक परिवर्तनों को सरल बनाना,

* प्रतिस्पर्द्धात्मक बाजारों के सृजन के प्रथम उपाय के रूप में, पर्यावरणीय, सुरक्षा तथा विद्यमान विधायी अपेक्षाओं की सीमा के भीतर पूंजी तथा प्रबंधन के लिए प्रवेश तथा निकासी की बाधाओं के संबंध में सलाह देना।

आयोग के दायित्व एवं कृत्यः

* केन्द्रीय सरकार के स्वामित्व वाली अथवा उसके द्वारा नियंत्रित उत्पादन कंपनियों के टैरिफ का विनियमन करना,

* खंड (क) में विनिर्दिष्ट केन्द्रीय सरकार के स्वामित्व वाली या उसके द्वारा नियंत्रित उत्पादन कंपनियों से भिन्न उत्पादन कंपनियों के टैरिफ का विनियमन करना यदि ऐसी उत्पादन कंपनियां एक राज्य से अधिक राज्यों में विद्युत के उत्पादन और विक्रय के लिए संयुक्त स्कीम में शामिल होती हैं या अन्यथा उनकी ऐसी कोई संयुक्त स्कीम है,

* विद्युत के अंतर-राज्यिक पारेषण को विनियमित करना,

* विद्युत के अंतर-राज्यिक पारेषण के लिए टैरिफ अवधारित करना,

* किन्हीं व्यक्तियों को पारेषण अनुज्ञप्तिधारी और उनकी अंतर-राज्यिक संक्रियाओं की बाबत विद्युत व्यापारी के रूप में कृत्य करने के लिए अनुज्ञप्ति जारी करना,

* उपर्युक्त खंड (क) से खंड (घ) तक से संसक्त विषयों के संबंध में उत्पादन कंपनियों या पारेषण अनुज्ञप्तिधारी को अंतर्वलित करने वाले विवादों का न्यायनिर्णयन करना तथा माध्यस्थम् के लिए किसी विवाद को निर्दिष्ट करना,

* अधिनियम के प्रयोजनों के लिए फीस उद्गृहीत करना,

* ग्रिड मानकों को ध्यान में रखते हुए, ग्रिड कोड विनिर्दिष्ट करना,

* अनुज्ञप्तिधारियों द्वारा सेवा की गुणवत्ता, निरंतरता और विश्वसनीयता की बाबत मानकों को विनिर्दिष्ट और प्रवृत्त करना,

* विद्युत के अंतर-राज्यिक व्यापार में, यदि आवश्यक समझा जाए, व्यापार अंतर को नियत करना,

* ऐसे अन्य कृत्यों का निर्वहन करना जो अधिनियम के अधीन समनुदेशित किए जाएं।

केंद्रीय सरकार को निम्नलिखित पर सलाह देनाः * राष्ट्रीय विद्युत नीति और टैरिफ नीति बनाना,

* विद्युत उद्योग के क्रियाकलाप में प्रतिस्पर्द्धा, दक्षता और मितव्ययिता का संवर्द्धन करना,

* विद्युत उद्योग में विनिधान के संवर्द्धन को बढ़ावा देना,

* केन्द्रीय सरकार द्वारा केंद्रीय आयोग को निर्दिष्ट कोई अन्य विषय।

केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण

केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (केविप्रा) विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 70 द्वारा प्रतिस्थापित निरसित विद्युत (आपूर्ति) अधिनियम, 1948 की धारा(1) के अधीन मूल रूप से गठित एक संविधिक संगठन है। इसकी स्थापना वर्ष 1951 में अंशकालिक निकाय के रूप में की गई थी और वर्ष 1975 में इसे पूर्णकालिक निकाय बनाया गया।

संगठनः

* धारा 70 के अंतर्गत प्राधिकरण में 14 सदस्य से अधिक नहीं होंगे (इसमें अध्यक्ष भी शामिल है) जिसमें से केंद्र सरकार द्वारा चयनित 8 सदस्य पूर्णकालिक होंगे।

* केंद्र सरकार किसी व्यक्ति को, जो प्राधिकरण का सदस्य चुने जाने के लिए अर्ह है, प्राधिकरण के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त कर सकती है या एक पूर्णकालिक सदस्य को प्राधिकरण के अध्यक्ष के रूप में पदनामित कर सकती है।

* प्राधिकरण के सदस्यों को योग्य, समन्वित एवं अभियांत्रिकी, वित्त, वाणिज्य, अर्थशास्त्रा या औद्योगिकीय मामलों से सम्बद्ध कठिनाइयों से निपटने का अनुभव एवं क्षमता रखने वाले व्यक्तियों में से चुना जाएगा, और कम से कम एक सदस्य को निम्न प्रत्येक श्रेणियों में से चुना जाएगा, नामतः

(क) अभिकल्प, विनिर्माण, संचालन एवं स्टेशन सृजन का प्रबंधन में विशेषज्ञता के साथ अभियांत्रिकी

(ख) विद्युत पारेषण एवं वितरण की विशेषज्ञता सहित अभियांत्रिकी

(ग) विद्युत के क्षेत्रा में अनुप्रयोगात्मक अनुसंधान

(घ) अनुप्रयोगात्मक अर्थशास्त्रा, लेखांकन, वाणिज्य या वित्त

* प्राधिकरण का अध्यक्ष एवं सभी सदस्य केंद्र सरकार के प्रसादपर्यंत पद पर बने रहेंगे।

* अध्यक्ष प्राधिकरण का मुख्य कार्यकारी होगा।

* प्राधिकरण का मुख्यालय दिल्ली में होगा।

सभी तकनीकी एवं आर्थिक मामलों में, केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण ऊर्जा मंत्रालय को सहायता करता है। इस प्राधिकरण का अध्यक्ष भारत सरकार का सचिव भी होता है और अन्य 6 पूर्णकालिक सदस्य भारत सरकार के अतिरिक्त सचिव भी होते हैं। इन्हें सदस्य (थर्मल), सदस्य (हाइड्रो), सदस्य (आर्थिक एवं वाणिज्य), सदस्य (ऊर्जा तंत्रा), सदस्य (नियोजन) एवं सदस्य (ग्रिड संचालन एवं वितरण) के तौर पर पदनामित किया जाता है।

केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के कार्य एवं कर्तव्य विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 73 के अधीन वर्णित है। इसके अतिरिक्त केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण को अधिनियम की धाराओं 3, 7, 8, 53, 55 और 177 के अधीन भी कई अन्य कार्यों का निर्वहन करना होता है।

प्राधिकरण के कृत्य एवं कर्तव्यः

* अल्पावधिक और संदर्शी योजना तैयार करना और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के हित में सहायक होने के लिए संसाधनों के इष्टतम उपयोग हेतु आयोजना एजेंसियों के कार्यकलापों का समन्वय करना तथा उपभोक्ताओं को राष्ट्रीय विद्युत नीति से संबंधित मामलों पर केन्द्रीय सरकार को सुझाव देना, विद्युत प्रणाली के विकास के लिए विश्वसनीय और वहनीय विद्युत प्रदान करना।

* विद्युतीय संयंत्रों, विद्युत लाइनों और ग्रिड से संपर्क के निर्माण के लिए तकनीकी मानक निर्दिष्ट करना

* विद्युतीय संयंत्रों और विद्युत लाइनों के निर्माण, प्रचालन और अनुरक्षण के लिए सुरक्षा संबंधी आवश्यकताएं निर्दिष्ट करना

* पारेषण लाइनों के प्रचालन और अनुरक्षण के लिए ग्रिड मानक निर्दिष्ट करना

* विद्युत के पारेषण और आपूर्ति के लिए मीटरों की संस्थापना के लिए शर्तें निर्दिष्ट करना

* विद्युत प्रणाली सुधारने और वृद्धि करने के लिए स्कीमों और परियोजनाओं को समय पर पूरा करने को बढ़ावा देना और सहायता करना

* विद्युत उद्योग में संलग्न व्यक्तियों की कुशलता बढ़ाने के लिए उपायों का संवर्धन करना

* ऐसे किसी विषय, जिस पर सुझाव मांगा जाता है, पर केंद्रीय सरकार को सुझाव देना अथवा किसी विषय पर उस सरकार को सिफारिशें करना। अगर प्राधिकरण की राय में सिफारिशें विद्युत के उत्पादन, पारेषण, व्यापार, वितरण और उपयोग सुधारने में सहायता करेंगी।

* विद्युत के उत्पादन, पारेषण, व्यापार, वितरण और उपयोग से संबंधित रिकॉर्ड और आंकड़े एकत्रित करना तथा लागत, क्षमता, प्रतिस्पर्द्धात्मकता और ऐसे ही मामलों से संबंधित अध्ययन करना

* अधिनियम के अधीन प्राप्त सूचना को समय-समय पर सार्वजनिक करना और रिपोर्ट तथा जांच के प्रकाशन की व्यवस्था करना

* विद्युत के उत्पादन, पारेषण, वितरण और व्यापार को प्रभावित करने वाले विषयों में अनुसंधान का संवर्द्धन करना

* विद्युत का उत्पादन करने अथवा पारेषण करने अथवा वितरण करने के प्रयोजनार्थ कोई जांच करना अथवा कराना

* ऐसे विषयों पर किसी राज्य सरकार, लाइसेंसधारियों अथवा उत्पादक कंपनियों को सुझाव देना, जो उन्हें एक सुधरे हुए तरीके से विद्युत प्रणाली को अपने स्वामित्वाधीन या नियंत्राणाधीन रखते हुए प्रचालित और अनुरक्षित करने में समर्थ बनाएगा और जहां आवश्यक हो दूसरी विद्युत प्रणाली का स्वामित्व अथवा नियंत्राण रखने वाली किसी अन्य सरकार, लाइसेंसधारी या उत्पादक कंपनी के साथ समन्वय करना

* विद्युत के उत्पादन, पारेषण और वितरण से संबंधित सभी तकनीकी विषयों पर उपयुक्त सरकार और उपयुक्त आयोग को सुझाव देना

* इस अधिनियम के अधीन प्रदान किए जाने वाले ऐसे अन्य कार्यों का निर्वहन

विद्युत अपीलीय न्यायाधिकरण

विद्युत अपीलीय ट्रिब्यूनल संविधिक निकाय है जिसे नियामकीय आयोग और अधिनिर्णय अधिकारी के आदेशों के विरुद्ध मामलों की सुनवाई के उद्देश्य हेतु गठित किया गया। इसका गठन केंद्र सरकार द्वारा विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 110 के तहत् 7 अप्रैल, 2004 को किया गया। इसका मुख्यालय दिल्ली में है। गौरतलब है कि विद्युत अधिनियम, 2003 के प्रावधान 10 जून, 2003 से प्रभावी हो गए हैं। बिजली अधिनियम, 2003 के लागू होने से भारतीय बिजली अधिनियम, 1910; बिजली (आपूर्ति) अधिनियम, 1948 तथा बिजली नियामक आयोग अधिनियम, 1988 निरस्त हो गए हैं। बिजली अधिनियम, 2003 जम्मू एवं कश्मीर को छोड़कर समस्त भारत एवं संघ राज्य क्षेत्रों पर लागू होगा।

विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा-110 के अंतर्गत विद्युत अपीलीय न्यायाधिकरण पूरे भारत में अधिनिर्णय अधिकारी या केंद्रीय विनियामक आयोगों या राज्य विनियामक आयोगों/न्यायिक अधिकरणों या संयुक्त आयोगों के आदेशों के विरुद्ध अपीलों की सुनवाई हेतु स्थापित किए जाएंगे।

न्यायाधिकरण को विद्युत अधिनियम की धारा 121 के तहत् सुनवाई का वास्तविक अधिकार क्षेत्रा सौंपा गया है और सभी आयोगों को उनके संविधिक कृत्यों के निर्वहन हेतु निर्देश जारी करने का अधिकार दिया गया है।

विद्युत अपीलीय न्यायाधिकरण में एक अध्यक्ष और तीन अन्य सदस्य होंगे।

प्रत्येक न्यायपीठ (बेंच) का गठन अध्यक्ष द्वारा किया जाएगा जिसमें कम से कम एक विधि विशेषज्ञ सदस्य और एक तकनीकी सदस्य होगा।

अपीलीय न्यायाधिकरण की शक्तियां एवं कृत्यः

* न्यायाधिकरण सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 द्वारा निर्धारित प्रक्रियाओं द्वारा सीमित नहीं होगा, अपितु प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों से निर्देशित होगा और इस अधिनियम के अन्य प्रावधानों के तहत् होगा। न्यायाधिकरण को अपनी प्रक्रियाओं को नियमित करने की शक्ति होगी।

* न्यायाधिकरण इस अधिनियम (विद्युत अधिनियम, 2003) के अधीन अपने कर्तव्यों का निर्वहन करेगा।

* इसे कोई अन्य मामला केंद्र सरकार द्वारा सौंपा जा सकता है।

* इस अधिनियम के अंतर्गत अपीलीय न्यायाधिकरण द्वारा जारी किया गया कोई आदेश दीवानी न्यायालय की डिक्री के समान होगा और इस उद्देश्य हेतु अपीलीय न्यायाधिकरण को एक दीवानी न्यायालय की सभी शक्तियां प्राप्त होंगी।

* उपधारा-(3) में किसी बात के होते हुए भी, अपीलीय न्यायाधिकरण स्थानीय अधिकार क्षेत्रा वाले दीवानी न्यायालय को अपने आदेश को हस्तांतरित कर सकेगा और वह दीवानी न्यायालय इस आदेश को इस प्रकार कार्यान्वित करेगा जैसाकि यह उसके द्वारा जारी डिक्री हो।

* अपीलीय न्यायाधिकरण के सम्मुख सभी कार्रवाइयां भारतीय पैनल कोड के अर्थों के तहत् न्यायिक प्रक्रियाएं मानी जाएंगी और अपीलीय न्यायाधिकरण को अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 345 और 346 के उद्देश्य हेतु दीवानी न्यायालय समझा जाएगा।

* कोई व्यक्ति जो अपीलीय न्यायाधिकरण के किसी निर्णय से सहमत नहीं है, अपीलीय न्यायाधिकरण द्वारा उसे दिए गए निर्णय या आदेश के 60 दिनों के भीतर उच्चतम न्यायालय में अपील कर सकेगा।

भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण

नौवहन और नौचालन के लिये अंतर्देशीय जलमार्गों के विकास और विनियमन हेतु भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (भाअजप्रा) 27 अक्टूबर, 1986 को अस्तित्व में आया। जहाजरानी मंत्रालय से प्राप्त अनुदान के माध्यम से राष्ट्रीय जलमार्गों पर अंतर्देशीय जल परिवहन (अजप) अवसंरचना के विकास और अनुरक्षण हेतु प्राधिकरण मुख्य रूप से परियोजनाएं हाथ में लेता है। प्राधिकरण का मुख्यालय नोएडा में स्थित है। पटना, कोलकाता, गुवाहाटी और कोच्चि में प्राधिकरण के क्षेत्राीय कार्यालय भी हैं और इलाहाबाद, वाराणसी, भागलपुर, फरक्का और कोल्लम में उप-कार्यालय भी।

यह संभाव्यता अध्ययन भी कराता है और अन्य जलमार्गों को राष्ट्रीय जलामार्गों के रूप में घोषणा कराने के लिए प्रस्ताव तैयार करता है। यह अंतर्देशीय जल परिवहन से संबंधित मामलों पर केंद्र सरकार को परामर्श भी देता है और अ.ज.प. क्षेत्रा के विकास में राज्यों को मदद करता है।

संगठनात्मक स्वरूपः भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण में एक अध्यक्ष एवं एक उपाध्यक्ष होता है। तीन पूर्णकालिक सदस्य, सदस्य (वित्त), सदस्य (तकनीकी) एवं सदस्य (यातायात) होते हैं और तीन अंशकालिक सदस्य होते हैं। साथ ही संगठन में सचिव, मुख्य अभियंता (सिविल), मुख्य अभियंता (पी एण्ड सी), कार्यपालक निदेशक (वित्त) एवं अंकेक्षक जैसे अन्य अधिकारी भी होते हैं।

भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण के कार्यः

* राष्ट्रीय जलमार्ग सर्वेक्षण

* नौचालन, अवसंरचना एवं विनियम

* फेयरवे विकास

* पायलेटज करना

* अन्य साधनों के साथ भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण का समन्वय

* केंद्र सरकार को सलाह।

* जलीय सर्वेक्षणों का कार्यान्वयन

* राज्य सरकारों को सहायता

* परामर्शदात्राी सेवाओं का विकास

* अनुसंधान एवं विकास

* जलमार्गों का वर्गीकरण

* मानक एवं सुरक्षा

आणविक ऊर्जा विनियामक बोर्ड

आणविक ऊर्जा विनियामक बोर्ड (एईआरबी) का गठन 15 नवम्बर, 1983 को भारत के राष्ट्रपति द्वारा परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 द्वारा प्रदत्त शक्तियों को निर्वहन करने हेतु अधिनियम के तहत् विशिष्ट विनियामक एवं सुरक्षा कृत्यों को करने के लिए किया गया। एईआरबी के विनियामक प्राधिकार आणविक ऊर्जा अधिनियम एवं पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत् उल्लिखित नियमों एवं अधिसूचनाओं से प्राप्त हुए हैं।

बोर्ड में एक पूर्णकालिक अध्यक्ष, एक एक्सऑफिशियो सदस्य, तीन अंशकालिक सदस्य और एक सचिव होता है। इसके कृत्यों में कई समितियां मदद करती हैं। सभी एईआरबी समितियों के सदस्य सम्बद्ध क्षेत्रा में लंबा अनुभव रखते हैं और आणविक ऊर्जा विभाग, विभिन्न सरकारी संगठनों, अकादमिक संस्थानों और उद्योग से आते हैं। सेवानिवृत विशेषज्ञ भी बड़ी संख्या में विभिन्न एईआरबी समितियों के सदस्य होते हैं।

बोर्ड का उद्देश्य है यह सुनिश्चित करना कि भारत में आयनीकृत विकिरण और आणविक ऊर्जा का इस्तेमाल स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के लिए कोई अवांछित जोखिम उत्पन्न न करे।

एईआरबी के कृत्यः

* विकिरण एवं औद्योगिक सुरक्षा क्षेत्रों दोनों में सुरक्षा नीतियां विकसित करना;

* विभिन्न प्रकार की आणविक एवं विकिरण सुविधाओं की स्थापना, अभिकल्प, विनिर्माण, कृत्य, प्रचालन एवं अकृत्य के लिए सुरक्षा संहिता, निर्देशिका एवं मानक विकसित करना;

* आणविक एवं विकिरण सुविधाओं की अवस्थापना के लिए और इसके विनिर्माण, कृत्य, प्रचालन एवं अकृत्य के लिए उचित सुरक्षा समीक्षा एवं मूल्यांकन के पश्चात् सहमति प्रदान करना;

* एईआरबी द्वारा अनुशंसित एवं समीक्षा, मूल्यांकन, नियामकीय परीक्षण एवं प्रवर्तन द्वारा सभी चरणों के लिए दी गई सहमति के नियामकीय आवश्यकताओं की प्रासंगिकता सुनिश्चित करना;

* आणविक एवं विकिरण सुविधाओं के लिए आपात तैयारी योजना की समीक्षा करना;

* रेडियोएक्टिव òोतों, किरणित ईंधन एवं जीवाश्म पदार्थ के परिवहन की समीक्षा करना;

* सुरक्षा के क्षेत्रों में अनुसंधान एवं विकास संवर्द्धन का प्रयास करना;

* रेडियोलॉजिकल सुरक्षा के महत्व के व्यापक मुद्दों पर लोक हित में सूचना हेतु जरूरी कदम उठाना; और

* देश में संविधिक निकायों और साथ ही विदेशी संस्थाओं से सुरक्षा मामलों पर बातचीत एवं विचार-विमर्श करते रहना।

 

Indian Polity (Hindi)

 

 

विभिन्न सांविधिक,अर्द्धन्यायिक एवं अन्य निकाय (भाग-2)

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कृषि संबंधी निकाय

राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड

राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) की स्थापना 1965 में, राष्ट्रीय डेयरी विकास अधिनियम, 1987 के अंतर्गत तत्कालीन प्रधानमंत्राी लाल बहादुर शास्त्राी की भारत के अन्य हिस्सों में कैश को-ऑपरेटिव मिल्क प्रोड्यूसर यूनियन (अमूल) की सफलता को पहुंचाने की इच्छा पूर्ति के रूप में हुई। इसकी संस्थापना डॉ. वर्गीज कुरियन द्वारा की गई। इसका मुख्य कार्यालय आनंद (गुजरात) में है और पूरे देश में इसके क्षेत्राीय कार्यालय हैं। एनडीडीबी की सब्सिडियरी में मदर डेयरी, दिल्ली शामिल है।

राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के निदेशक मण्डल में निम्न सदस्य शामिल हैंµ

(a) एक अध्यक्ष;

(b) केंद्र सरकार के अधिकारियों में से एक निदेशक;

(c) राज्य को-ऑपरेटिव डेयरी संघ के अध्यक्षों में से दो निदेशक;

(d) पूर्णकालिक निदेशकों, तीन से अनधिक, को राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के उच्च स्तरीय कार्यकारियों में से लिया जाएगा; और

(e) राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के बाहर से, विशेषज्ञ होने के नाते, एक निदेशक।

बोर्ड के कृत्य एवं दायित्वः * डेयरी एवं सम्बद्ध उद्योगों के विकास हेतु योजना एवं कार्यक्रम बनाना।

* अन्य कृषि आधारित उद्योगों हेतु गहन एवं देशव्यापी कार्यक्रम चलाना और ऐसे कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के लिए सहायता मुहैया कराना।

* गहन एवं देशव्यापी आधार पर बेहद प्रभावपूर्ण तरीके से सहकारिता रणनीति अपनाना।

भारतीय खाद्य निगम

देश में खाद्यान्नों के न्यायपूर्ण वितरण एवं उनके मूल्यों में स्थायित्व लाने के उद्देश्य से भारतीय खाद्य निगम की स्थापना 1965 में की गई थी। अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए भारतीय खाद्य निगम सरकार के लिए खाद्यान्नों की खरीद करता है तथा खाद्यान्न का बफर स्टॉक बनाता है। निगम इस प्रकार से स्टॉक किए गए खाद्यान्न को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत उचित मूल्य की दुकानों पर विक्रय के लिए उपलब्ध कराता है। निगम खाद्यान्नों के विदेशी व्यापार में भी सक्रिय भूमिका निभाता है। सरकार की ओर से विदेशों में खाद्यान्न का क्रय-विक्रय करना निगम का महत्वपूर्ण कार्य है। इनके अतिरिक्त कृषि फसलों व तकनीकों के बारे में अनुसंधान करना व खाद्यान्नों के भंडारण क्षमता में वृद्धि करना भी निगम के कार्यों में सम्मिलित है।

निगम का संगठनः भारतीय खाद्य निगम का एक मुख्यालय एवं पांच क्षेत्राीय कार्यालय हैं। इसमें एक अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक, एक अतिरिक्त सचिव एवं वित्त सलाहकार, एक संयुक्त सचिव (भंडारण) एवं छह सदस्य होते हैं।

निगम के उद्देश्य एवं दायित्वः भारतीय खाद्य निगम की स्थापना खाद्य निगम अधिनियम, 1964 के तहत् खाद्य नीति के निम्नलिखित उद्देश्यों को पूरा करने के लिए की गईः

* किसानों के हितों को सुरक्षित रखने के लिए प्रभावी मूल्य समर्थन

* सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत् देशभर में खाद्यान्नों का वितरण

* राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए खाद्यान्नों के प्रचालन तथा बफर स्टॉक के संतोषजनक स्तर को बनाए रखना।

* राष्ट्र सेवा के अपने 45 वर्षों के दौरान, भारतीय खाद्य निगम ने आपदा प्रबंधन उन्मुखी खाद्य व्यवस्था को स्थिर सुरक्षा प्रणाली में सफलतापूर्वक रूपांतरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।

* किसानों को लाभकारी मूल्य उपलब्ध कराना

* उचित मूल्यों पर खाद्यान्न उपलब्ध कराना, विशेष रूप से समाज के कमजोर वर्गों को

* खाद्य सुरक्षा के उपाय के तौर पर बफर स्टॉक बनाए रखना

* मूल्य स्थिरिता के लिए बाजार में हस्तक्षेप करना

एफसीआई का पुनर्निर्माणः भारतीय खाद्य निगम के पुनर्निर्माण पर एक उच्च स्तरीय समिति (एचएलसी) का गठन भारत सरकार द्वारा अगस्त 2014 को किया गया जिसने 19 जनवरी, 2015 को अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी। समिति द्वारा खोजे गए तथ्य, सब्सिडीज सहित व्यय को तर्कसंगत करने में सरकार की मदद करेंगे, जिसमें राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के क्रियान्वयन में होने वाली लागत शामिल है।

समिति द्वारा खोजे गए मुख्य तथ्य इस प्रकार हैंः

(i) एफसीआई को प्रत्यक्ष रूप से चावल एवं गेहूं बेचने से केवल 6 प्रतिशत किसान लाभान्वित हुए हैं।

(ii) अधिकतर किसानों को एफसीआई और इसकी प्रापण गतिविधियों के बारे में मालूम नहीं था। उदाहरणार्थ, मात्रा 25 प्रतिशत चावल उत्पादक किसान और 35 प्रतिशत गेहूं उत्पादक किसान इस बारे में जानते थे।

(iii) 2011 में सार्वजनिक वितरण प्रणाली में छीजन 46.7 प्रतिशत थी, और कुछ राज्यों में यह 90 प्रतिशत तक थी, जिसने अर्थशास्त्रिायों एवं विश्लेषकों के अत्यंत डर की पुष्टि की। अनगिनत हैंडलिंग, घटिया वैगन और रेल प्वाइंट्स पर अपर्याप्त सुरक्षा क्षतियों के मुख्य कारकों में हो सकते हैं।

(iv) 2011-12 से 2013-14 के दौरान खाद्यान्न का वास्तविक औसत भण्डार 73 मिलियन मिट्रिक टन (एमएमटी) था जो संभावित बफर स्टॉक से 40 एमएमटी अधिक था।

आर्थिक रूप से कमजोर उपभोक्ताओं को प्रभावी रूप से अनाज प्रदान करने, अनाज बाजार को स्थिर करने, और प्रापण लाभ अधिक संख्या में किसानों तक पहुंचाने के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली के पुनरोन्मुख को सुनिश्चित करने के क्रम में एचएलसी ने निम्न अनुशंसाए दीं।

* एफसीआई को पंजाब, हरियाणा और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों को छोड़ देना चाहिए जिन्होंने प्रापण हेतु अवसंरचना का सृजन कर लिया है, और असम, बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की तरफ जाना चाहिए जहां किसान निराशाजनक बिक्री से पीड़ित हैं।

* भारत सरकार को बिना किसी भौतिक रूप से हैंडलिंग अनाज के नकद की संभावनाओं की तरफ बढ़ने का विस्तार करना चाहिए।

* भारत सरकार को 10 लाख से अधिक जनसंख्या वाले बड़े शहरों के साथ शुरू करते हुए लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत, धीरे-धीरे नकद अंतरण को प्रस्तावित करना चाहिए।

* एफसीआई को अपने भण्डारण प्रचालनों को निजी क्षेत्रा को सौंपना चाहिए।

* भारत सरकार को अपनी प्रापण एवं न्यूनतम समर्थन मूल्य नीति को फिर से देखने की आवश्यकता है, जो एमएसपी के तहत् दलहन एवं तिलहन के साथ 23 मदों को शामिल होने के बावजूद मुख्य रूप से चावल और गेहूं पर बल देती है।

* एफसीआई को बाजार में स्टॉक भेजने के लिए एक पेशेवर सक्रिय तरलता नीति प्रस्तुत करनी चाहिए, जब कभी संभावित बफर स्टॉक अत्यधिक हो जाए।

* भोजन की अपर्याप्तता को संबोधित करने के लिए, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत् 80 करोड़ लोगों के होते हुए वास्तविक तौर पर भूखे लोगों की पहचान एवं लक्ष्य करने हेतु सरकार को शहरी निकायों एवं पंचायती राज संस्थानों को शामिल करने पर विचार करना चाहिए।

* एफसीआई खाद्य बाजारों को स्थिर करने के लिए एमएसपी के अंतर्गत मदों की सूची में संशोधन कर सकती है।

भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण

भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई), एक संविधिक निकाय, की स्थापना खाद्य सम्बद्ध मुद्दों को देखने के लिए खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 के अंतर्गत की गई। एफएसएसएआई का सृजन मानक उपभोग हेतु सुरक्षित एवं समग्र भोजन सुनिश्चित करने के लिए भोजन मदों हेतु विज्ञान-आधारित मानक तैयार करने और उनके विनिर्माण, भण्डारण, वितरण, बिक्री और आयात को विनियमित करने के लिए किया गया।

प्राधिकरण में एक अध्यक्ष और 22 सदस्य होते हैं जिनमें से दो-तिहाई महिलाएं होती हैं।

प्राधिकरण के कृत्यः प्राधिकरण निम्न कृत्य करता हैµ

* भोजन मदों के संबंध में मानकों एवं दिशा-निर्देशों को लागू करने हेतु विनियमन तैयार करना और विभिन्न मापदण्डों या मानकों के प्रवर्तन के उचित तंत्रा को विनिर्दिष्ट करना।

* खाद्य व्यवसाय हेतु भोजन सुरक्षा प्रबंधन तंत्रा हेतु प्रमाणीकरण में संलिप्त प्रमाणीकरण निकायों के लिए तंत्रा एवं दिशा-निर्देशों को निर्धारित करना।

* प्रयोगशालाओं के अनुमोदित मापदण्डों हेतु प्रक्रिया एवं दिशा-निर्देश निर्धारित करना और अनुमोदित प्रयोगशालाओं के लिए अधिसूचना जारी करना।

* खाद्य सुरक्षा एवं पोषण के प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष क्षेत्रों में नीति एवं नियम बनाने के मामलों में केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को तकनीकी मदद एवं वैज्ञानिक सलाह प्रदान करना।

* खाद्य सुरक्षा और खाद्य मानकों के बारे में सामान्य जानकारी का संवर्द्धन करना।

* भोजन, स्वच्छता एवं मानकों के लिए अंतरराष्ट्रीय तकनीकी मानकों के विकास में योगदान देना।

* खाद्य व्यवसाय में संलग्न या संलग्न की तैयारी करने वाले लोगों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाना।

* पूरे देश में एक सूचना तंत्रा स्थापित करना ताकि लोग, उपभोक्ता, पंचायतें इत्यादि खाद्य सुरक्षा एवं सम्बद्ध मामलों के बारे में त्वरित, विश्वसनीय एवं उद्देश्यपरक सूचना प्राप्त कर सकें।

राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम

राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (एनसीडीसी) की स्थापना वर्ष 1963 में संसद के एक अधिनियम द्वारा कृषि मंत्रालय के अंतर्गत एक संविधिक निगम के रूप में की गई थी।

संगठन एवं प्रबंधनः निगम की नीतियों तथा कार्यक्रमों का निर्माण करने के लिए निगम का प्रबंधन एक व्यापक प्रतिनिधित्व वाली 51 सदस्यीय सामान्य परिषद् में तथा दिन-प्रतिदिन के कार्यकलापों को निष्पादित करने के लिए एक 12 सदस्यीय प्रबंध मंडल में निहित है। अपने प्रधान कार्यालय के अलावा एनसीडीसी अपने 18 क्षेत्राीय/राज्य निदेशालयों के माध्यम से कार्य करता है। प्रबंध निदेशक मुख्य कार्यपालक हैं। विभिन्न कार्यात्मक प्रभाग कार्यक्रमों के कार्यों की देखरेख करते हैं। क्षेत्राीय कार्यालय, परियोजनाओं की पहचान करने/परियोजना की तैयारी करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं तथा इसके कार्यान्वयन की निगरानी करते हैं। परियोजनाओं की पहचान करने/तैयार करने और उनका सफल कार्यान्वयन करने में सहकारिताओं की सहायता करने हेतु एनसीडीसी सहकारिता, संगठन एवं पद्धति, वित्तीय प्रबंधन, प्रबंध सूचना प्रणाली, चीनी, तिलहन, वस्त्रा, फल एवं सब्जी, डेरी, कुक्कुटपालन एवं पशुधन, मत्स्यपालन, हथकरघा, सिविल इंजीनियरिंग, रेफ्रीजरेशन एवं प्रिजर्वेशन के क्षेत्रा में तकनीकीय और प्रबंधकीय सक्षमताओं से सुसज्जित है।

निगम के प्रकार्य एवं दायित्वः कृषि उत्पादों, खाद्यान्नों, कुछेक अन्य अधिसूचित वस्तुओं अर्थात् उर्वरकों, कीटनाशकों, कृषि मशीनरी, लोक, साबुन, मिट्टी का तेल, वस्त्रा, रबड़ आदि के उत्पादन, प्रसंस्करण, विपणन, भंडारण, निर्यात तथा आयात के कार्यक्रमों का नियोजन, संवर्द्धन तथा वित्त पोषण करना, सहकारिताओं के माध्यम से उपभोक्ता वस्तुओं की आपूर्ति करना तथा कुक्कुटपालन, डेयरी, मछलीपालन, कीटपालन, हथकरघा आदि जैसे आय सृजित करने वाले कार्यकलापों के अलावा लघु वनोपजों के एकत्राण, प्रसंस्करण, विपणन, भंडारण तथा निर्यात करना।

एनसीडीसी अधिनियम में आगे संशोधन किया गया जिससे विभिन्न प्रकार की सहकारिताओं को सहायता देने हेतु निगम के कार्यक्षेत्रा का विस्तरण हुआ तथा इसके वित्तीय आधार का विस्तारण हुआ। एनसीडीसी अब ग्रामीण औद्योगिक सहकारी क्षेत्रों तथा जल संरक्षण, सिंचाई तथा लघु सिंचाई, कृषि-बीमा, कृषि-ऋण, ग्रामीण स्वच्छता, पशु स्वास्थ्य आदि जैसी ग्रामीण क्षेत्रों की कुछेक अधिसूचित सेवाओं हेतु परियोजनाओं का वित्तपोषण कर सकता है।

प्राथमिक तथा माध्यमिक स्तर की सहकारी समितियों का वित्तपोषण करने हेतु राज्य सरकारों को ऋण तथा अनुदान दिए जाते हैं तथा एक राज्य से बाहर व्यवसाय करने वाली राष्ट्रीय स्तर की तथा अन्य समितियों को सीधे ऋण तथा अनुदान दिए जाते हैं। निगम अब निर्धारित शर्तें पूरी करने पर अपनी सहायता की विभिन्न स्कीमों के अंतर्गत परियोजनाओं को प्रत्यक्ष वित्तपोषण भी कर सकता है।

वित्त एवं वित्तपोषणः धन के òोतः आंतरिक उपचयन बाजार उधार तथा अंतरराष्ट्रीय सहायता समेत भारत सरकार से आबंटन।

जिन उद्देश्यों हेतु सहायता दी जाती हैµ

* कार्यशील पूंजी वित्त जुटाने हेतु मार्जिन मनी (100%ऋण)

* समितियों के अंशपूंजी आधार का सुदृढ़ीकरण (100% ऋण)

* क्षेत्राीय/राज्य स्तर के विपणन संघ को कार्यशील पूंजी (100% ऋण)

* गोदामों, शीत भंडारों, उपस्कर वित्तपोषण, परिवहन वाहनों, नावों की खरीद एवं अन्य ठोस आस्तियों जैसी ढांचागत सुविधाओं के सृजन हेतु आवधिक ऋण।

* नए कृषि प्रसंस्करण उद्योगों की स्थापना, आधुनिकीकरण/ विस्तारण/पुनर्स्थापन/विविधीकरण हेतु अवधिक एवं निवेश ऋण।

* परियोजना रिपोर्टों/व्यवहार्यता अध्ययनों आदि की तैयारी हेतु सब्सिडी

स्वीकृति की प्रक्रिया/सहायता का संवितरणः एनसीडीसी की सहायता वैयक्तिक लाभोन्मुखी न होकर सहकारिताओं के संस्थागत विकास के निहितार्थ है। एनसीडीसी राज्य सरकारों के प्रयासों को सम्पूरित करता है। राज्य सरकारें निर्धारित स्कीम प्रपत्रा में वैयक्तिक समिति/ परियोजना के प्रस्तावों की संस्तुति करते हुए एनसीडीसी को भेजती हैं। समिति निर्धारित शर्तों को पूरा करके सहायता की विभिन्न स्कीमों के अंतर्गत परियोजनाओं हेतु प्रत्यक्ष धन प्राप्त कर सकती है। प्रस्तावों की जांच-पड़ताल संबंधित कार्यात्मक प्रभागों में की जाती है और यदि आवश्यक हो तो स्थल मूल्यांकन किया जाता है। तत्पश्चात् राज्य सरकार/समिति को धन की औपचारिक स्वीकृति संसूचित की जाती है। धन की विमुक्ति, कार्यान्वयन की प्रगति तथा प्रतिपूर्ति के आधार पर निर्भर करती है। ऋणों को वापिस करने की अवधि 3 से 8 वर्ष के बीच होती है। ब्याज की दरें समय-समय पर भिन्न-भिन्न होती हैं।

कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा)

कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) की स्थापना दिसंबर, 1985 में संसद द्वारा पारित कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादन निर्यात विकास प्राधिकरण अधिनियम के अंतर्गत भारत सरकार द्वारा की गई। इस अधिनियम (1986 का 2) को 13 फरवरी, 1986 से लागू किया गया। प्राधिकरण ने संसाधित खाद्य निर्यात प्रोत्साहन परिषद् का स्थान लिया।

प्राधिकरण का संगठनात्मक स्वरूपः जैसा कि संविधान में निर्धारित किया गया है उसके अनुसार प्राधिकरण के निम्नलिखित सदस्य हैंµ

(क) केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त अध्यक्ष

(ख) भारत सरकार का कृषि विपणन सलाहकार

(ग) योजना आयेाग के रूप में सरकार द्वारा नियुक्त एक सदस्य

(घ) तीन सांसद, दो लोकसभा द्वारा निर्वाचित, एक राज्य सभा द्वारा निर्वाचित

(ङ) भारत सरकार के मंत्रालयों से क्रमशः संबंध रखने तथा प्रतिनिधित्व करने वाले 8 सदस्यों को सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता है।

(i) कृषि एवं ग्रामीण विकास

(ii) वाणिज्य

(iii) वित्त

(iv) उद्योग

(v) खाद्य

(vi) नागरिक आपूर्ति

(vii) नागर विमानन

(viii) जहाजरानी एवं परिवहन

(च) राज्यों तथा संघशासित प्रदेशों के प्रतिनिधि के रूप में वर्णक्रम के अनुसार चक्रानुक्रम से 5 सदस्यों को केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता है।

(छ) निम्नलिखित के प्रतिनिधि के रूप में केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त 7 सदस्य

(i) भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद

(ii) राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड

(iii) राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ

(iv) केंद्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान

(v) भारतीय पैकेजिंग संस्थान

(vi) मसाला निर्यात संवर्धन परिषद तथा

(vii) काजू निर्यात संवर्धन परिषद।

(ज) निम्नलिखित के प्रतिनिधि के रूप में केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त 12 सदस्यः

(अ) फल तथा सब्जी उत्पाद उद्योग

(ब) मांस, कुक्कुट तथा डेयरी उत्पाद उद्योग

(स) अन्य अनुसूचित उत्पाद उद्योग

(द) पैकेजिंग उद्योग

(i) कृषि अर्थशास्त्रा तथा अनुसूचित उत्पादों के विपणन के क्षेत्रा में विशेषज्ञों तथा वैज्ञानिकों में से केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त 2 सदस्य।

प्रशासनिक ढांचाः अध्यक्ष-केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त।

निदेशक-एपीडा द्वारा नियुक्त।

सचिव-केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त।

प्राधिकरण के अन्य अधिकारी एवं स्टाफः एपीडा अधिनियम की धारा 7;3द्ध में प्रावधान है कि प्राधिकरण अपने कार्यों के कुशल निष्पादन के लिए आवश्यक अधिकारियों एवं कर्मचारियों की नियुक्ति कर सकता है।

एपीडा की विद्यमानताः एपीडा ने भारत के लगभग सभी कृषि संभाव्य राज्यों में अपनी विद्यमानता स्थापित कर ली है और अपने प्रधान कार्यालय 5 क्षेत्राीय कार्यालय और 13 आभासी कार्यालयों के द्वारा कृषि निर्यात समुदाय को सेवाएं प्रदान करता रहा है।

एपीडा ने संबंधित राज्य सरकारों/एजेंसियों के सहयोग से इन आभासी कार्यालयों को स्थापित किया है। एपीडा की योजनाओं तथा इन योजनाओं के अंतर्गत उपलब्ध सहायता के संबंध में उद्यमियों तथा संभावित निर्यातकों को इन आभासी कार्यालयों द्वारा मूलभूत सूचना उपलब्ध कराई जाती है।

एपीडा के कृत्य एवं दायित्वः कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण अधिनियम (1986 का 2) के अनुसार प्राधिकरण को निम्नलिखित कार्य सौंपे गए हैंµ

(क) वित्तीय सहायता प्रदान कर या सर्वेक्षण तथा सम्भाव्यता अध्ययनों, संयुक्त उद्यमों के माध्यम से साम्या पूंजी लगाकर तथा अन्य राहतों व आर्थिक सहायता योजनाओं के द्वारा अनुसूचित उत्पादों के निर्यात से सम्बद्ध उद्योगों का विकास करना।

(ख) निर्धारित शुल्क के भुगतान पर अनुसूचित उत्पादों के निर्यातकों के रूप में व्यक्तियों का पंजीकरण करना

(ग) निर्यात उद्देश्य के लिए अनुसूचित उत्पादों के मानक तथा विनिर्देश तय करना।

(घ) बूचड़खानों, संसाधन संयंत्रों, भंडारण स्थानों, वाहनों या अन्य स्थानों में जहां ऐसे उत्पाद रखे जाते हैं या उन पर कार्य किया जाता है, उन उत्पादों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से निरीक्षण करना।

(ङ) अनुसूचित उत्पादों के पैकिंग में सुधार करना।

(च) भारत से बाहर अनुसूचित उत्पादों के विपणन में सुधार करना।

(छ) निर्यातोन्मुख उत्पादन का प्रोत्साहन तथा अनुसूचित उत्पादों का विकास।

(ज) उत्पादन, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, विपणन या अनुसूचित उत्पादों के निर्यात में लगे संगठनों या कारखानों के मालिकों या अनुसूचित उत्पादों से सम्बद्ध मामलों के लिए निर्धारित ऐसे अन्य व्यक्तियों से आंकड़े एकत्रा करना तथा इस प्रकार एकत्रित किए गए आंकड़ों या उनके किसी एक भाग या उनके उद्धरण प्रकाशित करना।

(झ) अनुसूचित उत्पादों से जुड़े उद्योगों के विभिन्न पहलुओं पर प्रशिक्षण देना।

(ट) निर्धारित किए गए ऐसे अन्य मामले।

एपीडा को निम्नलिखित उत्पादों के निर्यात एवं संवर्धन एवं विकास का उत्तरदायित्व सौंपा गया है

  1. फल, सब्जी तथा उनके उत्पाद।
  2. मांस तथा मांस उत्पाद।
  3. कुक्कुट तथा कुक्कुट उत्पाद।
  4. डेयरी उत्पाद।
  5. कन्फेक्शनरी, बिस्कुट तथा बेकरी उत्पाद।
  6. शहद, गुड़ तथा चीनी उत्पाद।
  7. कोको तथा उसके उत्पाद, सभी प्रकार के चॉकलेट।
  8. मादक तथा गैर-मादक पेय।
  9. अनाज उत्पाद।
  10. मूंगफली, चीनी या बादाम और अखरोट।
  11. अचार, पापड़ और चटनी।
  12. ग्वार गम।
  13. पुष्पकृषि तथा पुष्पकृषि उत्पाद।
  14. जड़ी बूटी तथा औषधीय पौधे।
  15. चावल (गैर-बासमती)

इसके अतिरिक्त बासमती चावल, गेहूं तथा मोटे अनाज एवं चीनी निर्यात के ठेके भी एपीडा के साथ पंजीकृत होने जरूरी हैं।

विभिन्न सांविधिक,अर्द्धन्यायिक एवं अन्य निकाय (भाग-1)

वित्त एवं उद्योग संबंधी निकाय

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई)

भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया अधिनियम, 1934 के अंतर्गत 1 अप्रैल, 1935 को 5 करोड़ रुपए की अधिकृत पूंजी से हुई थी। यह 5 करोड़ रुपए की पूंजी 100 रुपए मूल्य के 5 लाख अंशों में विभाजित थी। प्रारम्भ में लगभग समस्त अंश पूंजी का स्वामित्व गैर-सरकारी अंशधारियों के पास था, किंतु अंशों को कुछ व्यक्तियों के हाथों में केंद्रित होने से रोकने के लिए सरकार ने 1 जनवरी, 1949 को रिजर्व बैंक का राष्ट्रीयकरण कर दिया।

संगठनात्मक ढांचाः

बैंक में सामान्य प्रबंध एवं निर्देशन का कार्य 20 सदस्यों के एक केंद्रीय निदेशक मण्डल द्वारा किया जाता है। इसमें एक गवर्नर, चार डिप्टी गवर्नर, एक वित्त मंत्रालय द्वारा नियुक्त सरकारी अधिकारी और भारत सरकार द्वारा नामजद 10 ऐसे निदेशक होते हैं जो देश के आर्थिक जीवन के विभिन्न पहलुओं का प्रतिनिधित्व करते हैं और 4 निदेशक स्थानीय बोर्डों का प्रतिनिधित्व करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा नामजद किए जाते हैं।

केंद्रीय बोर्ड के अतिरिक्त 4 स्थानीय बोर्ड भी हैं जिनके मुख्य कार्यालय मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई एवं नई दिल्ली में हैं। स्थानीय बोर्डों के 5 सदस्य होते हैं, जो केंद्र सरकार द्वारा 4 वर्ष की अवधि हेतु नियुक्त किए जाते हैं। स्थानीय बोर्ड केंद्रीय संचालक मण्डल के आदेशानुसार कार्य करते हैं तथा समय-समय पर केंद्रीय संचालक मण्डल को महत्वपूर्ण विषयों पर परामर्श देते हैं। रिजर्व बैंक का मुख्यालय मुम्बई में है।

भारतीय रिजर्व बैंक के कृत्य एवं दायित्वः

* मौद्रिक नीति का निर्माण, कार्यान्वयन एवं निगरानी करना।

* नोटों का निर्गमन।

* सरकार के बैंकर के रूप में कार्य करना।

* बैंकों के बैंक के रूप में कार्य करना।

* साख नियंत्रित करना।

* विदेशी विनिमय पर नियंत्राण करना।

* समाशोधन गृह के तौर पर कार्य करना।

* आर्थिक आंकड़े एकत्रित एवं प्रकाशित करना।

* सरकारी प्रतिभूतियों व व्यापारिक बिलों का क्रय-विक्रय करना।

* ऋण देना।

* मूल्यवान वस्तुओं का क्रय-विक्रय करना।

* सभी अनुसूचित बैंकों के बैंकिंग लेखों का प्रबंधन करना।

* प्रचालन हेतु अनुपयुक्त नोटों एवं सिक्कों को नष्ट करना।

* विदेशी विनिमय प्रबंधन अधिनियम, 1999 का प्रबंध करना।

* बैंकिंग प्रचालनों के लिए व्यापक दिशा-निर्देश देना।

* लोगों को नोटों एवं सिक्कों की अच्छी गुणवत्ता में पर्याप्त आपूर्ति करना।

* कीमत स्थिरता को बनाए रखना और उत्पादक क्षेत्रा की साख के पर्याप्त प्रवाह को निश्चित करना।

बैंकिंग औम्बुड्समैन

बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 25A के अंतर्गत, भारतीय रिजर्व बैंक ने ऋण एवं अग्रिमों से सम्बद्ध बैंकिंग सेवाओं एवं अन्य विशिष्ट मामलों में अक्षमता के खिलाफ शिकायतों के निपटान हेतु बैंकिंग औम्बुड्समैन गठित किया और विशेष विवादों में मध्यस्थ के तौर पर कार्य करने हेतु भी सशक्त किया। रिजर्व बैंक ने निर्देशित किया कि सभी व्यापारिक बैंक, क्षेत्राीय ग्रामीण बैंक और अनुसूचित प्राथमिक सहकारी बैंक बैंकिंग औम्बुड्समैन योजना, 1995 और बैंकिंग औम्बुड्समैन योजना, 2002 से संगत होंगे।

रिजर्व बैंक के गवर्नर द्वारा गठित चार सदस्यों वाली चयन समिति की अनुशंसा पर रिजर्व बैंक ने एक या अधिक व्यक्तियों को नियुक्त किया जो बैंकिंग औम्बुड्समैन के रूप में जाने जाते हैं। चयन समिति में रिजर्व बैंक के सभी तीनों डिप्टी गवर्नर, एवं विशेष आमंत्रित व्यक्ति के तौर पर अतिरिक्त सचिव (वित्तीय क्षेत्रा), आर्थिक मामले विभाग शामिल होते हैं।

बैंकिंग औम्बुड्समैन प्रसिद्ध व्यक्ति होना चाहिए एवं उसे विधि, बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं, लोक प्रशासन या प्रबंधन क्षेत्रों में अनुभव होना चाहिए, और यदि वह व्यक्ति लोक सेवक है तो उसे भारत सरकार में संयुक्त सचिव या इससे ऊपर के पद पर होना चाहिए और ऐसे व्यक्ति के बैंकिंग क्षेत्रा से होने पर, उसे सार्वजनिक क्षेत्रा में पूर्णकालिक निदेशक के तौर पर कार्य का अनुभव होना चाहिए।

बैंकिंग औम्बुड्समैन के कार्य एवं शक्तियां निम्न हैंµ(क) बैंकिंग सेवाओं के प्रावधानों से सम्बद्ध शिकायतों को सुनना या स्वीकार करना;

(ख) ऐसी शिकायतों पर विचार करना और समझौते द्वारा, बैंक तथा शिकायतकर्ता के बीच मध्यस्थता एवं सहमति द्वारा या योजनानुसार निर्णय करके शिकायतकर्ताओं की संतुष्टि या निपटारा करना;

(ग) पर्यवेक्षण की सामान्य शक्तियों का इस्तेमाल करना एवं अपने कार्यालय पर नियंत्राण रखना और वहां पर होने वाले कार्यों के लिए उत्तरदायी होना;

(घ) रिजर्व बैंक के गवर्नर को, प्रत्येक वर्ष 31 मई तक, विगत् वित्तीय वर्ष में उसके कार्यालय (बैंकिंग औम्बुड्समैन) की गतिविधियों की आम समीक्षा पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत करना और अन्य ऐसी सूचना प्रदान करना जो रिजर्व बैंक द्वारा मांगी गई हो।

वर्तमान स्थितिः

वर्तमान में संपूर्ण भारत में 15 केंद्रों पर बैंकिंग लोकपाल कार्यालय स्थापित हैं तथा शिकायतों की संख्या, शिकायत का समय पर निपटान तथा लोकपाल द्वारा दिए गए अवॉर्ड की उपयुक्तता के आधार पर लोकपाल के कार्य निष्पादन का विश्लेषण किया जाता है। बैंकिंग लोकपाल को प्रतिवर्ष लगभग 5,000 शिकायतें प्राप्त होती हैं जिसमें से अधिकांश शिकायतें जमा खातों में व्यवहार, ऋण अग्रिमों, धन-अंतरण, बैंक गारंटी आदि से संबंधित होती हैं। यह खुशी की बात है कि बैंकिंग लोकपाल द्वारा लगभग 90 प्रतिशत से अधिक शिकायतें मध्यस्थता एवं परस्पर सहमति के आधार पर निपटाई गईं हैं। त्वरित निर्णय लेने के कारण बैंकिंग लोकपाल का बैंक एवं ग्राहक दोनों ने स्वागत किया है।

इसकी उपादेयता एवं महत्व को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक ने इसमें संशोधन किए हैं। संशोधित बैंकिंग लोकपाल योजना, 2006 जनवरी, 2010 से लागू की गई है। संशोधित योजना में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं तथा इसे और अधिक सरल बनाते हुए शिकायतकर्ता एवं बैंक दोनों को बदलती हुई परिस्थितियों में एक नया दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित किया है। बैंकिंग लोकपाल क्षतिपूर्ति का निर्धारण करते समय शिकायतकर्ता का लगने वाला समय, वित्तीय हानि, परेशानी, मानसिक संताप इत्यादि बातों का ध्यान रखता है। इसी के साथ मध्यस्थता द्वारा समझौते के प्रयास में बैंकिंग लोकपाल नामित बैंक के क्षेत्राीय/नोडल कार्यालय को भी शामिल करता है।

इस प्रकार ‘बैंकिंग लोकपाल’ बैंक एवं ग्राहक दोनों के हित में है। इस योजना से ग्राहक एवं बैंकों के बीच मनमुटाव दूर होते हैं एवं विवादों का समाधान कम समय में तथा सौहार्दपूर्ण वातावरण में हो जाता है। इस योजना के तहत् ग्राहकों को कम समय में यथोचित न्याय मिल जाता है।

ग्राहक संतुष्टि की दृष्टि से यह एक उपयोगी एवं सारगर्भित योजना है। इसी के कारण ग्राहकों की शिकायतों का त्वरित एवं संतुष्टिपूर्ण निपटान संभव हो सका है। आज जबकि बैंकों में ‘ग्राहक सेवा’ पर अधिक ध्यान केंद्रित किया जा रहा है ऐसे में बैंकिंग लोकपाल योजना मील का पत्थर साबित हो रही है।

इसकी उपादेयता को प्रभावी बनाने के लिए सभी बैंकों को निर्देश दिए गए हैं कि वे इस योजना को सभी शाखा/कार्यालयों में प्रमुख स्थानों पर प्रदर्शित करें तथा अंचल/क्षेत्राीय कार्यालयों में नोडल अधिकारियों की नियुक्ति करें जो ‘बैंकिंग लोकपाल योजना’ में बैंकिंग लोकपाल के समक्ष शिकायतों में बैंक का प्रतिनिधित्व करे तथा सही एवं वास्तविक स्थिति से बैंकिंग लोकपाल को सूचित करे।

आज वैश्वीकरण एवं उदारीकरण के दौर में जबकि बैंकों के बीच प्रतिस्पर्द्धा चरम पर है तथा ग्राहकों के लिए अनेक विकल्प खुले हैं ऐसे में बैंकिंग लोकपाल योजना ग्राहक एवं बैंकों के हित में है। इसके सकारात्मक एवं उत्साहवर्द्धक परिणामों से ग्राहक एवं बैंक दोनों लाभान्वित हो रहे हैं।

आयकर निपटान आयोग

आयकर निपटान आयोग (आईटीएससी) की स्थापना केंद्र सरकार द्वारा भारत के उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश के.एन. वानचू की अध्यक्षता में 1971 में गठित प्रत्यक्ष कर जांच समिति की अनुसंशाओं पर वर्ष 1976 में की गई।

वानचू समिति ने निपटान आयोग की अवधारणा को एक बार करवंचना वाले करदाता को उसके देयताओं को निपटाने के तंत्रा के रूप में अपनाने की अनुमति दी। यह भारत में पहला वैकल्पिक विवाद निपटान (एडीआर) निकाय है। इसका कार्य भारतीय आयकर एवं संपत्ति कर नियमों के संदर्भ में आयकर विभाग एवं करदाता के बीच विवादों का निपटान करना है। (आयोग का गठन आयकर अधिनियम 1961 की धारा 245 बी के अंतर्गत किया गया था। इसमें एक अध्यक्ष एवं सदस्य होते हैं जैसाकि केंद्र सरकार सही समझे।)

निपटान आयोग करदाता को पहले ही आयकर विभाग के समक्ष बता चुके अतिरिक्त आय विवरणों को उसके समक्ष रखने की अनुमति देता है। आवेदक को आयोग के समक्ष अतिरिक्त आय के विवरण बताने से पूर्व अतिरिक्त आय पर सभी करों एवं ब्याज का पूर्ण भुगतान करना होगा। तब आयोग आवेदन की स्वीकार्यता पर निर्णय लेगा, यदि आवेदन स्वीकार कर लिया गया हो, तो आयोग दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का अवसर देते हुए समयबद्ध तरीके से मामले की प्रक्रिया प्रारंभ करता है।

आयोग को जुर्माने से उन्मुक्ति का व्यापक अधिकार है, जो याचिका का बड़ा सेत है। आयोग द्वारा दिया गया आदेश अंतिम होता है। यह आवश्यक है कि आवेदन करने की तिथि से 18 महीनों के भीतर सेटलमेंट आदेश दिया जाए।

वर्तमान में आयोग की चार बेंच कार्यरत हैं। दिल्ली बेंच को प्रधान बेंच के तौर पर जाना जाता है। अन्य बेंचें मुम्बई, कोलकाता एवं चेन्नई में कार्यशील हैं और इन्हें अतिरिक्त बेंचों के रूप में जाना जाता है।

आयकर औम्बुड्समैन

वित्त मंत्रालय में राजस्व विभाग के सचिव, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के अध्यक्ष, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड का सदस्य (कार्मिक) एवं केंद्र सरकार से मिलकर बनी समिति की सिफारिश पर एक या अधिक व्यक्तियों को औम्बुड्समैन नियुक्त किया जाता है।

औम्बुड्समैन आयकर विभाग के अधिकार क्षेत्रा से स्वतंत्रा होगा। औम्बुडसमैन को 2 वर्षों के लिए नियुक्त किया जाता है जो 1 साल तक विस्तारित किया जा सकता है या पदाधिकारी की आयु 63 वर्ष तक रखी गई है, जो भी पहले हो। उसकी पुनर्नियुक्ति नहीं की जा सकती।

ओम्बुडसमैन के कृत्य एवं दायित्वः

* पर्यवेक्षण की सामान्य शक्तियों को कार्यान्वित करना एवं अपने कार्यालय पर नियंत्राण रखना तथा अपने कार्यालय के कृत्यों के लिए उत्तरदायी होना;

* उसके संज्ञान में आने वाली किसी सूचना एवं दस्तावेज की गोपनीयता को बनाए रखना;

* करदाताओं के अधिकारों का संरक्षण करना और उनके कर बोझ में कमी करना;

* ऐसे मामलों की पहचान करना जो करदाताओं के करों में वृद्धि करते हैं या उनके लिए समस्याएं पैदा करते हैं, और उन मामलों को केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड एवं वित्त मंत्रालय के सम्मुख रखना;

* सीबीडीटी के अध्यक्ष एवं वित्त मंत्रालय में राजस्व विभाग के सचिव को उचित कार्रवाई की अनुशंसा हेतु मासिक रिपोर्ट भेजना;

* पूर्व वित्त वर्ष के दौरान औम्बुड्समैन कार्यालय द्वारा की गई गतिविधियों की सामान्य समीक्षा वाली एक रिपोर्ट प्रत्येक वर्ष सीबीडीटी अध्यक्ष, राजस्व विभाग के सचिव को भेजना और अन्य ऐसी सूचना भी भेजना जिसे वह भेजा जाना आवश्यक समझे।

आयकर अपीलीय ट्रिब्यूनल

आयकर अपीलीय टिब्यूनल (आईटीएटी) का गठन 25 जनवरी, 1941 को किया गया था। यह ‘‘सुलभ न्याय एवं सतत् न्याय’’ आदर्श वाक्य पर समर्पित है, जिसका अभिप्राय है सुगम एवं शीघ्र न्याय। ट्रिब्यूनल के कार्यकरण की कसौटी हैंµमितव्ययता, सुगमता, तकनीकी जटिलता मुक्त; एवं विषय विशेषज्ञता।

यह न्यायालय नहीं है लेकिन एक ऐसा ट्रिब्यूनल है जो राज्य की न्यायिक शक्तियों का कार्यकरण करता है। ट्रिब्यूनल के समक्ष किसी भी प्रकार की प्रक्रिया को भी न्यायिक प्रक्रिया समझा जाएगा। इसे दीवानी न्यायालय भी समझा जाएगा।

श्ट्रिब्यूनल में निम्न प्राधिकारी होते हैं

(i) अध्यक्ष

(ii) वरिष्ठ उपाध्यक्ष/उपाध्यक्ष

(iii) सदस्य-न्यायिक एवं एकाउन्टेंट

(iv) रजिस्ट्रार

(v) डिप्टी रजिस्ट्रार

(vi) सहायक रजिस्ट्रार

ट्रिब्यूनल का अध्यक्ष विभाग का प्रमुख होता है और वह ट्रिब्यूनल की सभी बेंचों पर प्रशासनिक नियंत्राण भी रखता है। प्रत्येक जोन का प्रमुख उपाध्यक्ष होता है। आयकर अपीलीय ट्रिब्यूनल का मुख्यालय मुम्बई में अवस्थित है। मौजूदा समय में यह 27 विभिन्न स्थानों पर 63 बेंचों के साथ कार्यशील है।

आयकर अधिनियम 1961 की धारा 131 के तहत् आयकर प्राधिकारियों में निहित सभी शक्तियां ट्रिब्यूनल में निहित होंगी। जब ट्रिब्यूनल निम्न मामलों पर विचार करती है तो उसे वही शक्तियां प्राप्त होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत एक न्याालय में निहित होती हैंµ

(क) अन्वेषण एवं जांच;

(ख) किसी व्यक्ति को उसके समक्ष प्रस्तुत होने को कहना;

(ग) लेखे संबंधी दस्तावेज या अन्य दस्तावेज प्रस्तुत करने को बाध्य करना; और

(घ) कृत्यों को जारी करना।

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी)

शेयर बाजार में चलने वाले बृहत् कारोबार को नियंत्रित एवं विनियमित करने का काम ‘सिक्योरिटीज एवं एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इण्डिया’ अर्थात् सेबी द्वारा किया जाता है। यह बोर्ड कंपनियों द्वारा शेयर बाजार में होने वाली गड़बड़ियों को रोकने के लिए बने विभिन्न कानूनों को लागू करवाने के लिए उत्तरदायी बनाया गया है। एशिया के सबसे पुराने भारतीय शेयर बाजार में निवेशकों का विश्वास बनाए रखने और उन्हें संरक्षण प्रदान करने में इसका विशेष योगदान रहा है। यह एक गैर-संवैधानिक संस्था है जिसकी स्थापना केंद्र सरकार द्वारा संसद में एक कानून पारित करके 12 अप्रैल, 1988 को की गई। तत्पश्चात् 30 जनवरी, 1992 को एक अध्यादेश द्वारा इस संस्था को वैधानिक दर्जा भी प्रदान कर दिया गया।

सेबी का सम्पूर्ण प्रबंधन छह सदस्यों की देख-रेख में किया जाता है। इसका अध्यक्ष केंद्र सरकार द्वारा नामित विशिष्ट योग्यता प्राप्त व्यक्ति होता है तथा दो सदस्य केंद्रीय मंत्रालयों के अधिकारियों में से ऐसे व्यक्ति नामित किए जाते हैं, जो वित्त एवं कानून के विशेषज्ञ होते हैं। सेबी के प्रबंधन में एक सदस्य भारतीय रिजर्व बैंक के अधिकारियों में से तथा दो अन्य सदस्यों का नामांकन भी केंद्र सरकार द्वारा किया जाता है। सेबी का मुख्यालय मुम्बई में बनाया गया है। जबकि इसके क्षेत्राीय कार्यालय कोलकाता, दिल्ली तथा चेन्नई में हैं।

सेबी के कर्तव्य एवं दायित्वः स प्रतिभूति बाजार में निवेशकों को संरक्षण सुनिश्चित करना तथा प्रतिभूति बाजार को उचित उपायों के माध्यम से विनियमित एवं विकसित करना।

* स्टॉक एक्सचेंजों तथा किसी भी अन्य प्रतिभूति बाजार के व्यवसाय का नियमन करना।

* स्टॉक ब्रोकर्स, सब ब्रोकर्स, शेयर ट्रांसफर एजेन्ट्स, ट्रस्टीज, मर्चेंट बैंकर्स, अंडरराइटर्स, पोर्टफोलियो मैनेजर आदि के कार्यों का नियमन करना एवं उन्हें पंजीकृत करना।

* म्युच्अल फण्ड की सामूहिक निवेश योजनाओं को पंजीकृत करना तथा उनका नियमन करना।

* नियमित संगठनों को प्रोत्साहित करना।

* प्रतिभूति बाजार से जुड़े लोगों को प्रशिक्षित करना तथा निवेशकों की शिक्षा को प्रोत्साहित करना।

* प्रतिभूतियों के बाजारों से संबंधित अनुचित व्यापार व्यवहारों को समाप्त करना।

* प्रतिभूतियों की इनसाइडर ट्रेडिंग पर रोक लगाना।

* प्रतिभूतियों के बाजार में कार्यरत् विभिन्न संगठनों के कार्यकलापों का निरीक्षण करना एवं सुव्यवस्था सुनिश्चित करना।

सेबी की स्थितिः

सेबी द्वारा अपने निर्धारित दायित्वों का काफी सीमा तक समुचित प्रकार से निर्वहन किया जा रहा है। इसे और भी क्रियाशील और प्रभावी बनाने के लिए सरकार द्वारा निरंतर अतिरिक्त प्रयास भी किए जा रहे हैं। शेयर बाजार में गड़बड़ियों के दोषियों को अधिक कठोर सजा के लिए सेबी को व्यापक अधिकार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से सेबी (संशोधन) अधिनियम, 2002 को अक्टूबर, 2002 से लागू किया गया।

इस अधिनियम के अंतर्गत सेबी द्वारा इनसाइडर ट्रेडिंग के लिए 25 करोड़ रुपए तक का जुर्माना किया जा सकता है। लघु निवेशकों के साथ धोखाधड़ी के मामलों में एक लाख रुपए प्रतिदिन की दर से एक करोड़ रुपए का जुर्माना आरोपित करने का प्रावधान भी इस अधिनियम में किया गया है।

संशोधित प्रावधानों के अनुसार अब किसी भी शेयर बाजार को मान्यता प्रदान करने का अधिकार सेबी को हस्तांतरित कर दिया गया है। शेयर बाजार के किसी सदस्य के किसी बैठक में मताधिकार के संबंध में नियम बनाने तथा उसे संशोधित करने का अधिकार भी सेबी को प्रदत्त कर दिया गया है। इसके अतिरिक्त स्पॉट डिलीवरी आधार पर किए गए सौंदों के विनियमन व नियंत्राण तथा किसी शेयर बाजार द्वारा किसी कम्पनी के शेयरों को लिस्टिंग न करने संबंधी कंपनियों की शिकायतों की सुनवाई भी अब सेबी द्वारा ही की जाती है।

सेबी द्वारा किए गए सुधारः

सेबी ने सभी क्षेत्रों के विकास हेतु समय-समय पर प्राथमिक एवं द्वितीय दोनों बाजारों के निर्बाध और त्वरित विकास के लिए कई कदम उठाए हैं। कम्प्यूटरीकरण के अनुप्रयोग ने निगरानी तंत्रा को मजबूत किया है। मूलभूत निगरानी तंत्रा स्टॉक एक्सचेंजों का है, जबकि सेबी प्रक्रिया की निगरानी करता है। प्राइस कैप, प्राइस बैंड्स, सर्किट फिल्टर्स, मार्जिन्स और स्टॉक वॉच कुछ ऐसे तरीके हैं जिनके माध्यम से बाजार पर सख्त निगरानी रखी जा सकती है।

क्लीयरेंस और सेटलमेंट व्यवस्था में सुधार किए गए। इस दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए डिपॉजटरीज एनएसडीएल और सीडीएसएल और एक क्लीयरिंग निगम एनएससीसीएल की स्थापना की गई।

प्राथमिक बाजार को सशक्त करने के लिए, सेबी ने इश्यू की प्रक्रिया को सरल किया, इश्यू की प्रक्रिया के साथ लोचशीलता को एकबद्ध किया और प्रतिभूत बाजार तक पहुंच हेतु मापदण्डों को मजबूत किया। हाल ही में सेबी ने आईपीओ की अवधि 21 दिन से घटाकर 12 दिन करके एक भारी बदलाव वाला निर्णय लिया। सेबी ने बुक-बिल्डिंग के द्वारा इश्यू तैयार करने का विकल्प प्रस्तुत किया और हाल ही में इसने आईपीओ में बैंकर्स के माध्यम से निवेशकों द्वारा निवेश करने हेतु एएसबीए योजना शुरू की।

म्युच्अल फंड के विकास ने अर्थव्यवस्था को एक नया आवेश प्रदान किया। म्युच्अल फंड विनियमन में संशोधन से फंड प्रबंधकों को बड़ी संचालन लोचशीलता प्राप्त हुई जिसने उनकी जवाबदेही एवं पर्यवेक्षण में वृद्धि की। इसने केवाईसी मापदण्डों को प्रस्तावित किया। सेबी यूलिप की बेहद सामान्य एवं सस्ती दरों पर उपलब्धता की कोशिश करता है।

सेबी ने 2003 में पूंजी बाजार के लिए एक नवीन संस्था ‘औम्बुड्समैन’ की स्थापना की। इसने निवेशकों के संगठन बनाने को प्रोत्साहित किया।

सेबी की सीमाएं

दीवानी न्यायालय के समान संविधिक शक्तियों के बावजूद, सेबी प्रवर्तन की दिशा में अधिक नहीं कर पाया है। सेबी को निवेशकों के बीच अधिक विश्वास कायम करने की आवश्यकता है और विनियमों के प्रवर्तन के संबंध में कहीं अधिक निरंतरता का प्रदर्शन करना होगा। सेबी, एक नियामक के तौर पर, विगत् दशक में घटित घोटालों की शृंखला में निष्प्रभावी सिद्ध हुआ है। उदाहरणार्थ, सेबी को सीआरबी के पूंजी बाजार की समीक्षा करने का अवसर प्राप्त हुआ, लेकिन उसने इस पर गौर नहीं किया जिसके परिणामस्वरूप, निवेशकों को करोड़ों रुपयों की चपत लग गई।

बड़े भुगतान संकट की स्थिति से बचने के लिए संभावित डिफॉल्टर्स की सहायता के लिए सेबी अभी बेहद दूर खड़ा है। जब कभी वास्तविक जालसाज नई चालें चल लेते हैं, निगरानी तंत्रा को उसे पकड़ने में लंबा समय लग जाता है। सेबी ने भारत में 1993 में बदला व्यवस्था को प्रतिबंधित कर दिया था, लेकिन इसने इसके लिए कोई वैकल्पिक तंत्रा प्रदान नहीं किया। ऐसा जान पड़ता है कि यह निवेशक-हितैषी होने की अपेक्षा कॉर्पोरेट-हितैषी है। यह न केवल धोखेबाज कंपनियों को दण्ड देने में विफल हुआ है अपितु मूक दर्शक भी बना रहा है, जब वही कंपनियां नए इश्यूज के साथ बाजार में पुनः प्रवेश करती हैं। इसके पास पूंजी बाजार को विनियमित एवं विकसित करने हेतु जरूरी संख्या में सक्षम कर्मी नहीं हैं।

वायदा बाजार की निगरानी और उससे संबंधित कार्रवाई करने के लिए गठित वायदा बाजार आयोग (एफएमसी) का सितम्बर 2015 में सेबी में विलय कर दिया गया। अतः अब इसका पृथक् अस्तित्व समाप्त हो गया है।

बौद्धिक संपदा अपीलीय बोर्ड

बौद्धिक संपदा अपीलीय बोर्ड (आईपीएबी) का गठन केंद्र सरकार द्वारा 15 सितम्बर, 2003 को वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय में ट्रेड मार्केट अधिनियम, 1999 एवं वस्तु भौगोलिक संकेत (पंजीकरण एवं संरक्षण) अधिनियम, 1999 के तहत् रजिस्ट्रार के निर्णय के विरुद्ध अपील सुनने के लिए किया गया। आईपीएबी का मुख्यालय चेन्नई में है और चेन्नई, मुम्बई, दिल्ली, कोलकाता एवं अहमदाबाद में इसकी न्यायपीठ हैं। अप्रैल 2007 में बौद्धिक संपदा अपीलीय बोर्ड से संबंधित पेटेंट संशोधन अधिनियम, 2002 और पेटेंट संशोधन अधिनियम, 2005 प्रवृत्त

हुआ। इस प्रकार विभिन्न उच्च न्यायालयों में लम्बित पड़ी अपील आईपीएबी को हस्तांतरित कर दी गईं। इसी प्रकार, पेटेंट अधिनियम, 1970 के तहत् स्पष्टीकरण आवेदनों को आईपीएबी के समक्ष रखने की आवश्यकता है।

अपीलीय बोर्ड का संगठनः (क) अध्यक्ष, उच्च न्यायालय का न्यायाधीश होना चाहिए या वह बोर्ड का कम-से-कम दो साल तक उपाध्यक्ष रहा हो।

(ख) उपाध्यक्ष, जो एक न्यायिक सदस्य के पद पर होना चाहिए या एक तकनीकी सदस्य होना चाहिए या भारतीय विधि सेवा का सदस्य होना चाहिए और इस सेवा में ग्रेड-1 के पद पर होना चाहिए या किसी उच्च पद पर कम से कम पांच वर्षों तक होना चाहिए।

(ग) न्यायिक सदस्य जो भारतीय विधि सेवा में ग्रेड-1 पद पर कम-से-कम तीन वर्षों तक रहा हो या, कम से कम दस वर्षों तक, दीवानी न्यायिक कार्यालय में रहा हो।

(घ) तकनीकी सदस्य, जिसने ट्रिब्यूनल में कम से कम दस वर्षों तक काम किया हो और कम से कम पांच वर्षों तक संयुक्त रजिस्ट्रार से ऊपर के पद पर रहा हो; या कम से कम दस वर्षों तक ट्रेडमार्क विधि में जाना-माना वकील रहा हो।

अध्यक्ष, उपाध्यक्ष एवं प्रत्येक अन्य सदस्य की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और अध्यक्ष की नियुक्ति भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बिना न की गई हो।

आईपीएबी को निम्न मामलों पर नियंत्राक या केंद्र सरकार के निर्णयों के विरुद्ध अपीलीय क्षेत्राधिकार हैंः

* आविष्कारक के नाम से सम्बद्ध निर्णय,

* पेटेंट के सह-स्वामियों को दिया गया कोई निर्देश,

* जोड़ने संबंधी पेटेंट पर कोई निर्णय,

* डिवीजनल आवेदन के सम्बद्ध कोई आदेश,

* आवेदन की तिथि से सम्बद्ध कोई आदेश,

* अधिनियम के किसी प्रावधान से असंगत होने पर आवेदन अस्वीकार करना,

* लिपिकीय गलती को सुधारने के संबंध में,

* पेटेंट के अनिवार्य लाइसेंस से सम्बद्ध कोई निर्णय,

* आवेदनों के प्रतिस्थापन से सम्बद्ध कोई निर्णय,

* पेटेंट के संशोधन से सम्बद्ध कोई निर्णय,

* आवेदन एवं विशेषीकरण के संशोधन से सम्बद्ध निर्णय,

* व्यपगत पेटेंट को बनाए रखने से सम्बद्ध कोई निर्णय,

* पेटेंट छोड़ने से सम्बद्ध कोई निर्णय,

* लोक हित की अभिवृद्धि के लिए पेटेंट में संशोधन से सम्बद्ध निर्णय,

* किसी पेटेंट के पंजीकरण के संबंध में निर्णय।

भारतीय प्रतिस्पर्द्धा आयोग (सीसीआई)

भारतीय प्रतिस्पर्द्धा आयोग पर पूरे भारत में प्रतिस्पर्द्धा अधिनियम, 2002 को लागू कराने की जिम्मेदारी है और साथ ही ऐसी गतिविधियों को रोकना है जो भारत में प्रतियोगिता या प्रतिस्पर्द्धा पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं। सीसीआई का गठन 14 अक्टूबर, 2003 को किया गया। मई 2009 में 1 अध्यक्ष और 6 सदस्यों के साथ इसने पूरी तरह से कार्य करना प्रारंभ कर दिया।

प्रतिस्पर्द्धा अधिनियम प्रतिस्पर्द्धा की सुनिश्चित और बाजारी शक्तियों के दुरुपयोग और प्रभाव को रोकने के लिए एक औपचारिक तथा विधायी ढांचा प्रदान करता है। प्रतिस्पर्द्धा अधिनियम, 2002 में प्रावधान है कि इसका एक अध्यक्ष होगा और कम से कम दो और अधिकतम छह सदस्य होंगे। इसके अतिरिक्त यह प्रावधान भी है कि एक प्रतिस्पर्धी अपील ट्रिब्यूनल स्थापित होगा जो आयोग के आदेशों के खिलाफ अपील पर सुनवाई तथा निपटारा करेगा। प्रतिस्पर्द्धा अधिनियम के प्रमुख उद्देश्य हैंः प्रतिस्पर्द्धा पर विपरीत प्रभाव वाले क्रियाकलापों को खत्म करना, प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ावा देना, उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करना तथा भारतीय बाजारों में व्यापार की स्वतंत्राता सुनिश्चित करना।

प्रतिस्पर्द्धा अधिनियम की धारा 49(3) के अंतर्गत आयोग पर यह जिम्मेदारी होगी कि प्रतिस्पर्द्धा समर्थन को बढ़ावा देने तथा प्रतिस्पर्द्धा मामलों के बारे में प्रशिक्षण देने के लिए उचित कदम उठाए। इसके लिए आयोग ने छात्रों और औद्योगिक संगठनों, सार्वजनिक क्षेत्रा उपक्रमों, उपभोक्ता संगठनों, व्यावसायिक संस्थानों आदि के साथ मिलकर विभिन्न कार्यशालाएं सम्मेलन आदि आयोजित की हैं।

सीसीआई के कृत्य एवं दायित्वः

* बाजार को उपभोक्ताओं के कल्याण एवं लाभ का हितैषी बनाना।

* देश में अर्थव्यवस्था के विकास एवं तीव्र तथा समावेशी वृद्धि के लिए आर्थिक गतिविधियों में स्वस्थ एवं स्वच्छ प्रतिस्पर्द्धा को सुनिश्चित करना।

* आर्थिक संसाधनों के बेहद दक्ष उपयोग के उद्देश्य के साथ प्रतिस्पर्द्धा नीतियों का क्रियान्वयन करना।

* प्रतिस्पर्द्धा को प्रभावी रूप से फैलाना और भारतीय अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्द्धा संस्कृति को विकसित एवं स्थापित करने के लिए सभी अंशधारियों के बीच प्रतिस्पर्द्धा के लाभों की सूचना का प्रसार करना।

भारतीय प्रतिस्पर्द्धा आयोग का मूल्यांकनः

सीसीआई सभी क्षेत्रों की कंपनियों पर नियंत्राण रखती है। सीसीआई का उद्देश्य कार्टेल एवं एकाधिकार के दुरुपयोग जैसे प्रतिस्पर्द्धा विरोधी प्रचलनों का उन्मूलन करना है, और साथ ही साथ उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा एवं आर्थिक दक्षता प्राप्ति के लिए प्रतिस्पर्द्धा विरोधी समागमों एवं अधिग्रहणों को रोकना भी है। इसके अलावा, सीसीआई के एजेंडे में प्रतियोगिता की वकालत करना एक अन्य विशेषण है। सीसीआई सक्रिय रूप से रियल एस्टेट, मनोरंजन, सीमेंट, पेट्रोलियम, स्टील, पर्यटन उद्योग, स्वास्थ्य एवं शिक्षा जैसे क्षेत्रों की जांच कर रही है। वर्तमान में, यह प्रतिस्पर्द्धा अधिनियम, 2002 के तहत् प्रतियोगिता मापदण्डों के उल्लंघन के 39 मामलों की जांच कर रहा है। हालांकि, यह अपने नीति उन्मुख कार्यों में अक्षम रहा है। यद्यपि सेमिनार एवं वर्कशॉप भी सीसीआई को समझने में मदद करते हैं। ये मुख्य रूप से जागरूकता सृजित करते हैं, लेकिन प्रतियोगिता संस्कृति के प्रोत्साहन में चुनौतीपूर्ण नीतियां एवं प्रचलन भी शामिल हैं जो प्रतियोगिता संस्कृति को नुकसान पहुंचाते हैं।

सीसीआई बड़ी कंपनियों के बीच भारी-भरकम अर्थदण्ड लगाने के भय द्वारा प्रतिस्पर्द्धा विरोधी कृत्यों को रोकने का भरसक प्रयास करता है। यह अर्थदण्ड उन कंपनियों पर लगाया जाता है जो एकाधिकार उत्पन्न करने और बाजार कीमतों पर प्रभुत्व हासिल करने के लिए प्रतियोगिता उपबंधों का उल्लंघन करते हैं। यह नियामक एजेंसियों के व्यवहार को भी नियंत्रित करता है। उदाहरण के लिए, उपभोक्ताओं ने रिजर्व बैंक से पूर्व भुगतान जुर्माने की शिकायत की। हालांकि मामले पर अधिक गौर नहीं किया गया। जब उपभोक्ता, इस मामले को भारतीय प्रतिस्पर्द्धा आयोग के समक्ष ले गए, जिससे आरबीआई भयभीत हो गया, और पूर्व-भुगतान जुर्मानों को समाप्त करने की घोषणा कर दी। इसी प्रकार का समान प्रभाव अन्य नियामक एजेंसियों पर भी देखा जा रहा है।

वर्ष 2011 में, सीसीआई ने नेशनल स्टॉक एक्सचेंज द्वारा करेंसी डेरिवेटिव्स बाजार में अपनी प्रभुत्वशाली स्थिति का दुरुपयोग करने के लिए उस पर 55.5 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया। इसी प्रकार, इसने डीएलएफ पर हैसियत का दुरुपयोग करके क्रेताओं के साथ एकतरफा समझौता करने के लिए 630 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया। यह मामला प्रतिस्पर्द्धा अपीलीय न्यायाधिकरण के सम्मुख लंबित पड़ा है।

वर्ष 2012 में, सीसीआई ने 11 सीमेंट कंपनियों पर कार्टेल के लिए 6300 करोड़ का जुर्माना लगाया। सीसीआई ने एक गैर-सरकारी संगठनµ‘सीयूटीएस इंटरनेशनल’ की रिपोर्ट के आधार पर गूगल के खिलाफ जांच कराई।

इन अन्वेषणों ने भविष्य के लिए एक आशा बंधाई है और सभी क्षेत्रों की कंपनियों के लिए कुछ हद तक अवरोध का कार्य किया है। इसके बावजूद, सीसीआई के आदेशों की अक्सर आलोचना की जाती है कि इनमें आर्थिक तार्किकता का अभाव होता है जो एनएसई और डीएलएफ के मामलों में देखने को मिली है।

इससे अधिक, सीसीआई द्वारा आरोपित जुर्मानों को उचित निर्देशों के अभाव में अत्यधिक पाया गया है।

प्रतिस्पर्द्धा अधिनियम में भी कुछ कमियां हैं जिन्हें सुधारने की जरूरत है जो सीसीआई के प्रभावी कार्यकरण से तालमेल नहीं बैठा पाते। अधिनियम की धारा 26 सीसीआई के लिए कोई उपबंध नहीं करती कि वह किसी मामले को बंद कर दे, यदि महानिदेशक की रिपोर्ट अधिनियम के उल्लंघन को मान्यता देती है। अन्वेषण इकाई को क्षमता निर्माण की आवश्यकता है।

सीसीआई के अधिकारियों को प्रशिक्षित किए जाने की जरूरत है जिससे आदेशों में तार्किक दृष्टि प्रतिबिम्बित हो सके। इससे बढ़कर, सीसीआई के स्टाफ को बेहतर आर्थिक आकलन के लिए भी बेहतर कौशल की जरूरत है।

प्रतिस्पर्धी अपीलीय ट्रिब्यूनल (कैट)

प्रतिस्पर्धी अपीलीय ट्रिब्यूनल में एक अध्यक्ष तथा दो सदस्य हैं। इन्हें निम्न शक्तियां प्राप्त हैंः

(ii) प्रतिस्पर्द्धा अधिनियम, 2002 के अंतर्गत स्थापित सीसीआई द्वारा जारी कोई निर्देश या निर्णय अथवा पारित आदेश के खिलाफ दाखिल अपील को सुनना और निस्तारित करना,

(ii) आयोग की जांच से सामने आने वाले क्षतिपूर्ति के दावे या आयोग की जांच के खिलाफ अपील में ट्रिब्यूनल के आदेशों तथा उस अधिनियम के अंतर्गत क्षतिपूर्ति की रिकवरी के लिए पारित दावों पर फैसला सुनाना।

उल्लेखनीय है कि पूर्व के एमआरटीपी आयोग के भंग हो जाने पर भारत सरकार के अक्टूबर 2010 के आदेश में एमआरटीपी आयोग के समक्ष लंबित सभी मामलों की सुनवाई कैट को दे दी गई।

हर पांच साल में सांसदों के आय-भत्तों में वृद्धि हेतु कानून

एक फरवरी 2018 को वित्त मंत्राी ने लोकसभा में 2018-19 का केंद्रीय बजट पेश करते हुए कहा कि वर्तमान प्रणाली, जिसमें सांसदों को उनके वेतन में वृद्धि का अधिकार देती है कि आलोचना हो रही है। जिसके चलते संसद सदस्यों के वेतन, निर्वाचन क्षेत्रा भत्ता और देय अन्य खर्च के लिए कुछ आवश्यक बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं जो एक अप्रैल 2018 से प्रभावी होंगी।

यह कानून सांसदों के वेतन को हर पांच साल में मुद्रास्फीति के हिसाब से अपने आप देगा। वर्तमान प्रणाली में संसद के दोनों सदनों के सदस्यों वाली एक संसदीय समिति सांसदों के वेतन और भत्ते के मामले में सिफारिश करती है, जिस पर सरकार उचित फैसला कर संशोधन विधेयक लाती है। आमतौर पर इन संशोधित प्रस्तावों को संसद में आम सहमति मिल जाती है।

उल्लेखनीय है कि लोकसभा के कुछ सांसदों ने संसद के शीतकालीन सत्रा में सर्वोच्च और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन में बढ़ोत्तरी के विधेयक पर बहस के दौरान अपने वेतन में वृद्धि की मांग की थी।

हाउस पैनल ने सरकार की विदेश नीति पर प्रश्न उठाए

भारत सरकार की विदेश नीति पर हाउस पैनल ने प्रश्न किए, जिनके जवाब में विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत सदा से मालदीव के साथ रहा है तथा आगे भी प्रथममित्राकी अपनी प्रतिबद्धता को जारी रखेगा। विदेश मंत्रालय ने इस बात को भी स्वीकार किया कि वर्ष 2015 की प्रधानमंत्राी की मालदीव की यात्रा को अंतिम समय में मालदीव में हुए राजनीतिक क्रियाकलापों के कारण रद्द कर दिया गया था।

भारत तथा मालदीव के संबंध दिसंबर 2017 से ठंडे पड़े हैं, जब मालदीव ने चीन के साथ संसद के द्वारा मुक्त व्यापार समझौता किया था। यद्यपि, मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन अब्दुल ग्यून ने भारत की चिंताओं के लिए कहा कि भारत मालदीव का निकटतम मित्र है तथा दोनों तरफ से मुक्त व्यापार समझौते पर भी काम किया जा रहा है।

राज्यसभा के सदस्य ने भारत-नेपाल के संबंधों पर भी प्रश्न उठाये क्योंकि ऐसा पहली बार हुआ है कि नेपाल में किसी ने भारत-विरोधी अभियान चलाया हो और नेपाल में चुनाव जीत गया हो। नेपाल में इस प्रकार का विकास एक चिंता का विषय है। समिति ने पाकिस्तान के उन सामाजिक कार्यकर्ताओं के वीजा के मसले को भी उठाया, जो कि भारत की यात्रा करना चाहते हैं। उन्होंने कहा, ‘‘पाकिस्तान के सामाजिक कार्यकर्ता तथा बुद्धिजीवी लोकतांत्रिक मूल्यों के समर्थक हैं तथा भारत-पाकिस्तान संबंधों के सामान्यीकरण को भी समर्थन देते हैं, अतः किसी भी कारण से उनके वीजे में देरी नहीं की जा सकती’’। समिति ने चीन तथा भारत के बीच डोकलाम विवाद के मुद्दे पर नवीन विकास तथा कुलभूषण यादव के मसले पर भारत तथा पाकिस्तान के बीच बातचीत पर भी विचार-विमर्श किया। विदेश मंत्रालय ने समिति के सामने अपना वक्तव्य रखते हुए कहा कि भारत पाकिस्तान को निश्चित सिद्धांतों में शामिल करना चाहता है परंतु भारत की सुरक्षा पर किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता, ना ही सीमा पार आतंकवाद को हल्के में लिया जा सकता है।

लोकसभा ने संरक्षित स्मारकों के निकट निषिद्ध क्षेत्रों में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं हेतु बिल पारित किया

लोकसभा ने 2 जनवरी, 2018 को संरक्षित स्मारकों के पास निषिद्ध क्षेत्रों में बुनियादी ढांचा पािरयोजनाओं के निर्माण की अनुमति हेतु बिल पारित किया। संरक्षित स्मारकों के निकट के क्षेत्रों में किसी भी प्रकार के निर्माण कार्य पर रोक से बहुत से विकास कार्यों में बाधा पड़ रही थी।

निषिद्ध क्षेत्रा से तात्पर्य हैµकिसी भी संरक्षित स्मारक के निकट 100 मीटर त्रिज्या का क्षेत्रा। अभी तक 100 मीटर त्रिज्या के क्षेत्रा में मरम्मत तथा नवीनीकरण के अलावा किसी भी प्रकार के निर्माण कार्य पर प्रतिबंध था। 1958 एक्ट में संशोधन प्रस्तावित किया गया था। इस प्रकार के क्षेत्रा में निर्माण कार्य उसी स्थिति में संभव होगा जब किसी परियोजना को पूर्ण करने में अन्य कोई विकल्प नहीं होगा, यदि कोई विकल्प हुआ तो निर्धारित क्षेत्राफल से बाहर ही निर्माण कार्य किया जाएगा। भारत में 3,600 से अधिक स्मारक तथा स्थल हैं जो कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधिकार क्षेत्रा के अंतर्गत आते हैं तथा विभाग इन स्मारकों तथा स्थलों के रखरखाव के लिए उत्तरदायी हैं।

संशोधन के उपरांत भी मात्रा सरकारी परियोजनाओं का कार्य ही ऐसे स्थलों पर किया जा सकेगा, किसी भी प्रकार का निजी कार्य प्रतिबंधित ही रहेगा।

दिल्ली की झुग्गी बस्तियों के संरक्षण के लिए लोकसभा में बिल पास हुआ

लोकसभा में दिल्ली एनसीआर में झुग्गी तथा अनधिकृत बस्तियों को तर्कसंगत व्यवस्थाओं को बनाने के लिए ढांचा तैयार होने तक किसी भी दंडात्मक कार्यवाही से सुरक्षा प्रदान करने हेतु बिल पास किया गया है।

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्रा दिल्ली कानून (विशेष उपबंध, द्वितीय संशोधन) बिल, 31 दिसंबर, 2020 तक झुग्गियों तथा अनधिकृत बस्तियों को सुरक्षा प्रदान करता है।

शहरी विकास मंत्राी ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त निगरानी समिति द्वारा कराई जा रही सीलिंग की कार्यवाही के कारण ही झुग्गी बस्तियों में तथा अनधिकृत बस्तियों में निवास करने वालों तथा व्यापारियों के बीच भय व्याप्त हो गया है। इस कानून से उनके भय को कम किया जा सकेगा।

मौजूदा विधेयक में दी गई प्रतिरक्षा की अवधि 31 दिसंबर 2017 को समाप्त हो रही थी। शहरी विकास मंत्राी ने कहा कि यदि यह विेधेयक पारित नहीं हुआ तो राष्ट्रीय राजधानी में अप्रत्याशित अफरातफरी मच जाएगी। विधेयक जहां जैसा है के आधार पर दंडात्मक कार्यवाई से 31 दिसंबर 2020 तक मुक्ति दिलाएगा।

सरकार की प्रसाद योजना की संकल्पना पूर्णतः गलत हैः हाउस पैनल

परिवहन, पर्यटन तथा संस्कृति संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने पर्यटन मंत्रालय की प्रसाद योजना की अवधारणा को पूर्णतः गलत बताया तथा कहा कि इस योजना पर पुनः विचार किए जाने की आवश्यकता है।

31 सदस्यों की कमेटी, जिसमें 15 बीजेपी के संसद सदस्य भी शामिल थे तथा जिसकी अध्यक्षता राज्यसभा के सदस्य डेरेक ओ ब्रायन द्वारा की गई, ने इस योजना को लागू किए जाने में हुई चूक पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस योजना में तीर्थ स्थलोंµअयोध्या, मथुरा तथा वाराणसी, आदि के विकास की संभावना थी, परन्तु पर्यटन मंत्रालय ने ‘प्रसाद’ तथा अन्य योजनाओं को अतिछादित किया तथा वर्ष 2014 में योजना की अवधारणा के उपरांत इस योजना के क्रियान्वयन में अत्यधिक धीमी गति से कार्य किया।

स्थायी समिति सरकार के प्रत्युत्तर से असंतुष्ट दिखाई दी, जिसमें सरकार ने राज्य सरकार की एजेंसियों को देरी के लिए उत्तरदायी बताया। स्थाई समिति ने कहा, योजना लागू होने के तीन साल उपरांत भी ठीक प्रकार से नहीं चल पा रही है। रिपोर्ट में कहा गया, ‘‘राज्य सरकारें वास्तव में पर्यटन विभाग के विचार तथा योजनाओं को अमल में नहीं ला रही हैं।’’

स्थाई समिति ने कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना का दौरा किया तथा कमेटी द्वारा की गई विवेचना में पाया कि राज्यों के पास उनकी अपनी पर्यटन नीति है, परंतु प्रतीत होता है कि राज्यों तथा केंद्र सरकारों के बीच किसी प्रकार का तालमेल नहीं है।

 

राज्यसभा ने प्रश्नकाल तथा शून्यकाल में कामकाज निपटाने का बनाया रिकॉर्ड

2 जनवरी, 2018 को संसद के शीत सत्रा का आरंभ हंगामे के साथ हुआ परन्तु राज्यसभा ने कामकाज को निपटाने का एक रिकॉर्ड बना डाला। प्रश्नकाल में पंद्रह वर्षों में पहली बार सभी तारांकित सवालों को निपटाने में सफलता प्राप्त की गई। ऐसा मौका वर्ष 2002 में राज्यसभा के 197वें सत्रा के दौरान आया था जब सभी मौखिक प्रश्नों के उत्तर दिए गए थे। यद्यपि जिन 20 सांसदों के नाम तारांकित सवालों से जुड़े थे, उनमें से दस अनुपस्थित थे। शून्यकाल में डेढ़ दर्जन सांसदों को अपने मुद्दे उठाने से लेकर बात कहने का भी मौका मिला। सभापति ने प्रश्नकाल में कई सदस्यों को मंत्रियों से कुछ अनुपूरक प्रश्न पूछने का मौका भी दिया। एक घंटे के प्रश्नकाल का अंत अक्सर मंत्राी के आधे जवाब या सांसद के प्रश्न पूछने के बीच ही हो जाता है, लेकिन 2 जनवरी, 2018 को सारे सवाल-जवाब हुए।

पेमेंट ऑफ ग्रेज्युटी (संशोधन) विधेयक 2017

18 दिसंबर, 2017 को लोकसभा में कर्मचारियों के लिए ग्रेच्युटी की सीमा बढ़ाने हेतु पेमेंट ऑफ ग्रेच्युटी (संशोधन) बिल 2017 पेश किया गया। पेमेंट ऑफ ग्रेच्युटी एक्ट, 1972 को फैक्ट्रियों, मांइस, ऑयल फील्ड, प्लांटेशन, पोर्ट, रेलवे कंपनियों, दुकानों या अन्य प्रतिष्ठानों में नौकरी करने वाले कर्मचारियों के लिए लागू किया गया था। यह सुविधा उन्हीं कर्मचारियों के लिए है जिसने दस या अधिक कर्मचारियों वाले प्रतिष्ठान में कम से कम पांच वर्ष अपनी सेवाएं दी हों। ग्रेच्युटी की रकम कार्यकाल के प्रत्येक वर्ष के लिए 15 दिन के वेतन के आधार पर तय की जाती है। वर्तमान में इस रकम की अधिकतम सीमा 10 लाख रुपए है, जो 2010 में निश्चित की गई थी।

सातवां वेतन आयोग लागू होने के बाद केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए ग्रेच्युटी की अधिकतम सीमा 10 लाख से बढ़ाकर 20 लाख रुपये की गई है। सरकार के अनुसार, मुद्रास्फीति तथा वेतन में बढ़ोत्तरी को ध्यान में रखते हुए निजी क्षेत्रों से जुड़े कर्मचारियों के लिए भी ग्रेच्युटी की सीमा को बढ़ाने की आवश्यकता है। इसके लिए कानून में संशोधन के स्थान पर केंद्र सरकार को अधिकार देने का प्रस्ताव भी दिया गया है।

12 दिसंबर, 2017 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पेमेंट ऑफ ग्रेच्युटी (संशोधन) बिल को संसद में पेश करने के लिए अनुमति प्रदान की। इस कानून का मुख्य उद्देश्य कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति के बाद वित्तीय सुरक्षा उपलब्ध कराना है।