त्वचा की कोशिकाओं से मनुष्यों की कार्य करने वाली पहली मांसपेशी विकसित की गई

त्वचा की कोशिकाओं से मनुष्यों की कार्य करने वाली पहली मांसपेशी विकसित की गई

वैज्ञानिकों ने मनुष्यों की ऐसी छोटी तथा कृत्रिम मांसपेशी विकसित कर ली है जो कि न्यूरल तथा इलेक्ट्रीकल उत्प्रेरक की ऐसी ही प्रतिक्रिया देती है जैसे कि वास्तविक मांसपेशी। ये मांसपेशी के तंतु त्वचा की कोशिकाओं से बने हैं ना कि मांसपेशी की कोशिकाओं से।

इससे पहले वैज्ञानिक मांसपेशी की कोशिकाओं को अन्य प्रकार की कोशिकाओं से बना चुके थे परंतु अब तक किसी से बना चुके थे परंतु अब तक किसी ने कार्य कर सकने वाली मांसपेशी तंतु किसी मांसपेशी कोशिका के अलावा किसी कोशिका से निर्मित नहीं की थी।

यह जानकारी नेचर कम्यूनिकेशन नामक जर्नल में दी गई है। यह खोज आनुवांशिक मांसपेशीय दुर्विकास का बेहतर अध्ययन करने में सहायक होगी, साथ ही इसके इलाज के भी नए विकल्प खोजने में सहायक होगी।

वैज्ञानिकों ने मनुष्यों की त्वचा से कोशिकाएं ली फिर एक ज्ञात तकनीक के द्वारा इन कोशिकाओं को इंडयूसड प्लूरीपोटेंट स्टैम सेल्स में तब्दील कर दिया। ये कोशिकाएं किसी भी तरह की मानव कोशिका में बदली जा सकती हैं। इसके बाद एक नई प्रक्रिया से वैज्ञानिकों ने इन प्लूरीपोटैंट सेल्स को मसल स्टेम सेल्स में परिवर्तित कर दिया, ये नई कोशिकाएं मायोजेनिक प्रोजिनेटर कहलाती हैं। किसी दाता के एक प्लूरीपोटेंट स्टेम सेल का उपयोग करते हुए हजारों मसल स्टेम सेल्स बनाई जा सकती हैं।

ऐसा करना इसलिए संभव है क्योंकि एक कोशिका को हजारों कोशिकाओं में बदला जा सकता है। प्लूरीपोटेंट स्टेम सेल्स में एक प्रोटीन Pa × 7 डाल दिया जाता है जो कि कोशिका को मांसपेशी कोशिका में परिवर्तित होने का सिग्नल देता है। एक बार पर्याप्त मात्रा में मसल स्टेम सेल प्राप्त हो जाने पर Pa × 7 प्रोटीन को निष्क्रिय कर दिया जाता है।

इन मसल सेल्स को एक  कल्चर में डाल दिया जाता है जिसमें बहुत से पोषक तत्व तथा विकास के लिए आवश्यक पदार्थ होते हैं जो कि कोशिकाओं को मासपेशी तंतु बनाने के लिए उत्प्रेरित करते हैं। इस प्रक्रिया के तीन सप्ताह बाद 2 सेंटीमीटर लंबे तथा लगभग 1 मिलीमीटर व्यास के मांसपेशी के ऊतक इस विलियन में बन जाते हैं।

वैज्ञानिकों द्वारा विकसित यह प्रक्रिया आनुवांशिक मांसपेशीय रोग के अध्ययन में सहायक होगी जैसे कि डचेन पेशी अपविकास जिसमें लगभग चार वर्ष की आयु से ही मांसपेशी की दुर्बलता होने लगती है। यह स्थिति बहुत जल्दी से खराब होने लगती है और लगभग 12 वर्ष की आयु तक आते-आते रोगी चलने-फिरने के योग्य नहीं रहता। इस प्रकार के रोगों का इलाज ढूंढने में यह नई खोज बहुत सहायक हो सकती है।

वैज्ञानिकों द्वारा निर्मित नए तंतु क्योंकि पूर्णतः काम कर रहे हैं, जिससे वैज्ञानिक ये पता लगा सकते हैं कि ये किस उत्प्रेरक के लिए कैसी प्रतिक्रिया दे सकते हैं। ये भी देखा जा सकता है कि कौन-सी दवाइयां या कौन-से इलाज इन रोगों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। यह तकनीक जानवरों पर होने वाले प्रयोगों के परिणामों से कहीं अधिक सटीक परिणाम दे सकती है।

चीन में फोटोवोल्टेइक रोड का परीक्षण

चीन में फोटोवोल्टेइक रोड का परीक्षण

चीन ने अपने पहले फोटोवोल्टेइक राजमार्ग का परीक्षण किया। यह फोटो वोल्टेइक राजमार्ग चीन के पूर्वी शैन्डोंग प्रदेश में विकसित तकनीक पर निर्मित की गई है। इस मार्ग पर इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए वायरलेस चार्जिंग सिस्टम लगा हुआ है।

इस मार्ग को सोलर पैनल का प्रयोग करते हुए बनाया गया है जिसके ऊपर कंक्रीट की एक बहुत महीन परत लगाई गई है जिससे सोलर पैनल सुरक्षित रह सकें। ये पैनल इस प्रकार से बनाए गए हैं कि जब इनके ऊपर से वाहन गुजरे, तो विद्युत वाहनों को ऊर्जा स्थानांतरित हो। फोटोवोल्टेइक राजमार्ग एक किलोमीटर क्षेत्रा में 5,875 वर्ग मीटर के सतह क्षेत्रा पर बनाया गया है।

राजमार्ग के एक किलोमीटर खंड क्षेत्रा जिसका सफलतापूर्वक परीक्षण किया गया है, 817.2 किलोवाट बिजली का उत्पादन कर सकता है और प्रत्येक वर्ष 1 मिलियन किलोवॉट घंटे बिजली पैदा करने की संभावना है।

इस राजमार्ग पर जो बिजली उत्पादन किया जाएगा उसे चीन की राष्ट्रीय ऊर्जा ग्रिड से जोड़ दिया जाएगा। सबसे पहला फोटोबोल्टेइक मार्ग बनाने वाला देश फ्रांस था। फ्रांस ने वर्ष 2016 में सोलर पैनल मार्ग बना लिया था।

चीन में तैयार किए गए राजमार्ग की पूरी परियोजना की कुल लंबाई 50 किमी. से ज्यादा है। इस राजमार्ग पर उत्पन्न सोलर एनर्जी से सर्दियों में राजमार्ग पर जमी बर्फ पिघलेगी। इस काम के लिए स्नो मेल्टिंग सिस्टम लगाए गए हैं।

यह राजमार्ग किसी भी अन्य राजमार्ग की तुलना में 10 गुना ज्यादा दबाव सह सकता है। इस राजमार्ग की लागत प्रति वर्ग मीटर 458 डॉलर (30,000 रुपए) है, जो कि एक सामान्य राजमार्ग के निर्माण की लागत से कहीं अधिक है।

‘सुपर वुड’ कारों और वायुयान में प्रयुक्त होने वाले स्टील की जगह लेगी

सुपर वुडकारों और वायुयान में प्रयुक्त होने वाले स्टील की जगह लेगी

शोधकर्मियों ने एक ऐसी लकड़ी ‘सुपरवुड’ का आविष्कार कर लिया है जो कि किसी भी स्थान पर प्रयुक्त होने वाले स्टील की जगह ले सकेगी।

‘नेचर’ नाम के जर्नल में छपे लेख के अनुसार, शोधार्थियों का मानना है कि नए तरीके से बनाई जाने वाली लकड़ी कई टाइटेनियम की मिश्र धातु से भी अधिक मजबूत होगी। अमेरिका के मैरीलैंड यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर लियांगबिंग हू के अनुसार, नई तकनीक के प्रयोग से प्राकृतिक लकड़ी को 12 गुना मजबूत और 10 गुना दृढ़ बनाया जा सकता है।

इस नई तकनीक में दो प्रक्रियाएं हैं। पहली में लिग्निन (लकड़ी की कोशिकाओं के बीच उपस्थित) को तथा हेमिसेल्यूलोस (जो कि कोशिका भित्ति की संकुलन सघनता को बढ़ाता है) आंशिक रूप से हटाया जाता है।

इस प्रक्रिया को सोडियम हाइड्रॉक्साइड और सोडियम सल्फाइट के एक मिश्रण में उबालकर पूर्ण किया जाता है। इसके बाद हॉट-प्रेसिंग की जाती है जिससे कोशिका-भित्ति पूर्णतः टूट जाती हैं और प्राकृतिक लकड़ी को घनीभूत किया जाता है। शोध के अनुसार, यह प्रक्रिया लकड़ी की बहुत सी किस्मों के लिए समान रूप से प्रभावशाली है।

शोधकर्मियों ने इस तकनीक द्वारा तैयार की गई लकड़ी को अधिक कठोर तथा दृढ़ पाया। यह लकड़ी स्टील जितनी ही मजबूत है। इसे तोड़ने के लिए दस गुना अधिक बल की आवश्यकता होती है तथा इस लकड़ी को प्रक्रिया के आरंभ में मोड़ कर आकार भी दिया जा सकता है।

यह लकड़ी प्राकृतिक लकड़ी से छह गुना हल्की है। इसकी तुलना कार्बन फाइबर से भी की जा सकती है। वैज्ञानिक एक लंबे समय से लकड़ी की दृढ़ता को बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं तथा अब सफलता उनके हाथ आ गई है।

गूगल ने ‘लर्न विद गूगल ए आई’ नामक मशीन लर्निंग कोर्स आरंभ किया

गूगल ने लर्न विद गूगल ए आईनामक मशीन लर्निंग कोर्स आरंभ किया

गूगल ने ‘लर्न विद् गूगल ए आई’ नामक कार्यक्रम की शुरुआत की है, जिसमें मशीन लर्निंग विशेषज्ञों की सहायता से विकसित पाठ्य संसाधन प्रयोग कर लोगों को आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के सिद्धांत, दक्षता को विकसित करने आदि से संबंधित शिक्षा दी जाएगी, जिसका प्रयोग कर लोग वास्तविक दुनिया की मुश्किलों को आसान कर सकें।

यह  मुफ्त पाठ्यक्रम है जो कि सभी यूजर्स को मशीन लर्निंग स्किल्स सिखाता है। यह कोर्स मुफ्त है तथा सभी के लिए उपलब्ध है। गूगल का कहना है कि इस कोर्स के पीछे एक ही लक्ष्य है कि लोग मशीन लर्निंग अवधारणा को प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित हों तथा इस क्षेत्रा में स्वयं को दक्ष करें और जीवन की रोजमर्रा की मुश्किलों का हल निकालने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का प्रयोग करें।

यह क्रैश कोर्स उच्च स्तर के टेन्सर फ्लो/एपीआई का प्रयोग करते हुए व्यवहारिक एम.एल. अवधारणाओं का परिचय कराएगा। टेन्सल फ्लो मशीन लर्निंग टूल के लिए लाइब्रेरी का ओपन सोर्स है तथा इसे कोई भी प्रयोग कर अपनी आवश्यकता के अनुसार एआई तथा एमएल फ्रेमवर्क को बना सकता है।

मशीन लर्निंग कम्प्यूटरों को सीखने, समझने तथा आंकड़ों को पहचानने की अनुमति देता है। मशीन लर्निंग आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के लिए एक बिल्डिंग ब्लॉक है और यह स्वचालित कारों की क्षमता तथा छवि पहचानने की क्षमता विकसित करने जैसा है।

उत्पाद जैसे कि गूगल फोटो, गूगल ट्रांस्लेट, गूगल अस्सिटेंट आदि सभी किसी-न-किसी काम के लिए आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का सहारा लेते हैं। इस कोर्स के लिए कुछ योग्यता भी निर्धारित की गई हैं जो कि सीखने वालों के पास होनी चाहिए जैसे कि बीजगणित, लघुगणक। बेसिक प्रोग्रामिक पायथन की कोडिंग में कुछ अनुभव होना चाहिए जिससे कि कोर्स को आरंभ करने वाला सहजता से पढ़ सके।

यह कोर्स कंपनी ने अपने कर्मचारियों के लिए विकसित किया था तथा अब तक 18,000 से अधिक कर्मचारियों ने अपना नाम पंजीकृत करा लिया है।  कंपनी का कहना है कि कार्यालय में इस कार्यक्रम की सफलता ने इसे सभी के लिए उपलब्ध कराए जाने को प्रोत्साहित किया।

नासा मंगल ग्रह तक पहुंचने के लिए एटोमिक रॉकेट का प्रयोग करेगा

नासा मंगल ग्रह तक पहुंचने के लिए एटोमिक रॉकेट का प्रयोग करेगा

मंगल ग्रह पर पहुंचने की प्रतिस्पर्धा में अव्वल रहने के लिए नासा 1970 के दशक के एटॉमिक रॉकेटों का प्रयोग करेगा। नासा ने बीडब्ल्यूएक्सटी न्यूक्लियर इनकॉर्पोरेशन एनर्जी के साथ 18.8 मिलियन डॉलर का समझौता किया है, जिसमें यह निश्चित किया गया कि अंतरिक्ष में दूर तक यात्रा करने के लक्ष्य के लिए एक रिएक्टर को डिजाइन किया जाएगा तथा ईंधन को भी विकसित किया जाएगा जिसका प्रयोग न्यूक्लियर-थर्मल प्रोपल्शन इंजन में किया जा सके।

भले ही यह बहुत लंबी यात्रा की छोटी सी शुरुआज है परंतु इस विचार पर रूस तथा चीन भी काम कर रहे हैं। पारंपरिक रॉकेट में ईंधन को जलाया जाता है जिससे दबाव बनाया जा सके। इस एटॉमिक सिस्टम में रिएक्टर का प्रयोग कर प्रोपेलेंट को गर्म किया जाता है, जैसे कि तरल हाइड्रोजन जो कि नोजल के माध्यम से फैलकर क्राफ्ट को संचालित करती है।

यह तकनीक रॉकेट के ईंधन का उपयोग करने की क्षमता को दोगुना कर देती है जिससे तुलनात्मक रूप से छोटा क्राफ्ट तथा कम संक्रमण काल का उपयोग संभव हो पाता है। यह घटक बहुत ही व्यापक है, विशेषतः उस मिशन के लिए जिसमें बहुत से प्रोपेलेंट की आवश्यकता हो, जैसे कि मंगल ग्रह के लिए उड़ान। यह तकनीक उस कंपनी के लिए बहुत ही फायदेमंद होगी जो कि इस तकनीक को सबसे पहले इजाद कर लेगा क्योंकि इसकी मांग हर देश को है।

इस तकनीक की आवश्यकता विशेषकर अमेरिका जैसे देशों को अधिक है जिनके एटॉमिक ऊर्जा के क्षेत्रा में एक मंदी आ गई है। अमेरिका, यूरोप तथा जापान में सख्त कानून, निर्माण कार्य में देरी, लोगों को भरोसा न होना तथा राजनीतिक विरोधी दलों के कारण नाभिकीय ऊर्जा के विकास का काम ठप्प हो गया जिससे नई कंपनियां दिवालिया हो गईं।

जर्मनी, दक्षिणी कोरिया और ताइवान जैसे देश एक नवीकरणीय ऊर्जा या सस्ती प्राकृतिक गैस जैसे विकल्प खोज रहे हैं तथा चीन और रूस जैसे देशों को नाभिकीय ऊर्जा के क्षेत्रा में पीछे छोड़ रहे हैं। रूस की एक प्रोटोटाइप नाभिकीय इंजन को विकसित करने की योजना है जिसे मंगल ग्रह जाने के लिए प्रयोग में लाया जा सके।

रूस ने अब तक इस क्षेत्रा में प्रगति हासिल कर 30 फिजन रिएक्टरों को अंतरिक्ष में स्थापित कर दिया है। चीन का लक्ष्य है कि वह वर्ष 2045 तक एटॉमिक ऊर्जा से चलने वाले शटल को अंतरिक्ष खोजी योजनाओं में प्रयुक्त करे।

नासा को मंगल ग्रह तक पहुंचने की प्रतियोगिता में एलन मस्क जैसे उद्योगपतियों से भी चुनौती मिल रही है। एलन मस्क ने लोगों को मंगल ग्रह तक पहुंचाने का वादा किया है। एलन मस्क की कंपनी स्पेस एक्स ऐसे ईंधन को विकसित करने पर काम कर रही है जिसमें तरल ऑक्सीजन और मीथेन का प्रयोग किया जाए।

नासा का लक्ष्य मंगल ग्रह पर मानव कॉलोनी बसाने का भी है। एजेन्सी और ऊर्जा विभाग ऐसे न्यूक्लियर फिजन रिएक्टर्स को विकसित कर रहा है, जिन्हें अन्य ग्रहों या चांद पर स्थापित किया जाएगा तथा ये दस किलोवॉट तक की ऊर्जा देंगे। इन रिएक्टरों को किलो पावर नाम दिया गया है।

चंद्रयान-II अक्टूबर माह में चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के लिए प्रक्षेपित किया जाएगा

चंद्रयान-II अक्टूबर माह में चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के लिए प्रक्षेपित किया जाएगा

यद्यपि चंद्रयान-II मिशन भारत का पहला मिशन नहीं है परंतु निश्चित ही यह भारतीय सरकार की सर्वाधिक महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में से एक है। चंद्रयान II का प्रक्षेपण अप्रैल 2018 में किया जाना था परंतु प्रक्षेपण को स्थगित कर दिया गया है और अब इसे अक्टूबर माह में प्रक्षेपित किया जाएगा।

चंद्रयान-II रोवर, जिसकी लागत लगभग 800 करोड़ रुपए है, को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के बारे में जानकारी इकट्ठा करने के लिए बनाया गया है। अब तक चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के बारे में बहुत कम जानकारियां प्राप्त हैं। चंद्रयान-II  चंद्रयान-I परियोजना का ही विस्तृत भाग है।

उल्लेखनीय है कि चंद्रयान I के द्वारा चंद्रमा पर पानी की उपस्थिति पता चली थी। चंद्रयान-II का चंद्रमा पर उतरना ऐसा ही है जैसे कि किसी व्यक्ति का चंद्रमा पर जाना। चंद्रयान-I को भारत के श्रीहरिकोटा केंद्र से वर्ष 2008 में प्रक्षेपित किया गया था, जिसमें 83 मिलियन डॉलर की लागत आई थी। इस अभियान में भारत में निर्मित एक लूनर ऑर्बिटर (चंद्रयान) तथा एक रोवर एवं एक लैंडर शामिल होंगे।

इसरो के अनुसार, उड़ान के समय इसका वजन लगभग 3,250 किलो होगा। ऑर्बिटर 100 किलोमीटर की ऊंचाई पर चंद्रमा की परिक्रमा करेगा। इस अभियान में ऑर्बिटर को पांच पेलोड के साथ भेजा जाएगा। पांच में से तीन पेलोड नए हैं, जबकि दो अन्य चंद्रयान-1 ऑर्बिटर पर भेजे जाने वाले पेलोड के उन्नत संस्करण हैं।

ऑर्बिटर उच्च रिजॉल्यूशन कैमरा (Orbiter High Resolution Camera) लैंडर के आर्बिटर से अलग होने से पहले लैंडिंग साइट की उच्च रिजॉल्यूशन की तस्वीर देगा। चंद्रयान I के मून इम्पैक्ट प्रोब के विपरीत, लैंडर धीरे-धीरे नीचे उतरेगा।

लैंडर किसी तरह की वैज्ञानिक गतिविधि का प्रदर्शन नहीं करेगा। रोवर सौर ऊर्जा द्वारा संचालित होगा तथा चंद्रमा की सतह पर पहियों के सहारे चलेगा, मिट्टी तथा चट्टानों के नमूने एकत्रा करेगा तथा उनका रासायनिक विश्लेषण करेगा और आंकड़ों को ऊपर ऑर्बिटर के पास भेज देगा जहां से आंकड़ों को पृथ्वी के केंद्र पर भेज दिया जाएगा।

ऑर्बिटर पर पांच तथा रोवर पर दो पेलोड भेजे जाएंगे। भारतीय सरकार की इस परियोजना को अप्रैल से अक्टूबर तक स्थगित करने का कारण है कि विशेषज्ञों द्वारा कुछ परीक्षण सुुझाए गए हैं तथा उनके पूर्ण होने में कुछ समय लगेगा।

 

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इसरो विश्व के सबसे शक्तिशाली यान की तकनीक पर काम कर रहा है

इसरो विश्व के सबसे शक्तिशाली यान की तकनीक पर काम कर रहा है

स्पेस एक्स के विश्व के सर्वाधिक शक्तिशाली रॉकेट ‘फॉल्कन हेवी’ की तर्ज पर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र इसरो भी दोबारा प्रयोग किए जा सकने वाली सामग्री को विकसित करने के लक्ष्य हेतु काम कर रहा है, इससे पूरे मिशन की लागत में कमी आएगी। फॉल्कन हेवी में प्रयुक्त बूस्टर्स में से दो का दूसरी बार उपयोग किया गया है। इससे पहले ये फॉल्कन नाइन के प्रक्षेपण में प्रयुक्त किए गए थे।

इसरो ने बताया कि रिसर्च एंड डेवलपमेंट डिपार्टमेंट तीन तकनीकों पर काम कर रहा है। पहली, जिसके द्वारा यान को ऑर्बिटल में दोबारा ले जाया जा सके, दूसरी जिसके द्वारा एक बार प्रयोग किए जा चुके एयरस्ट्रिप पर दोबारा प्रयोग किए जा सकने वाले लॉन्च वेहिकल की लैंडिंग तथा तीसरी दो बार प्रयोग किए जा सकने वाले रॉकेट स्टेज पर।

इसरो इन तीनों तकनीकों पर एक साथ शोध कार्य कर रहा है तथा उम्मीद की जा रही है कि दूसरी तकनीक का परीक्षण दो साल के अंदर कर लिया जाएगा (वर्ष 2016 में दोबारा प्रयोग किया जा सकने वाले लॉन्च वेहिकल का पहला परीक्षण किया जा चुका है।)

इसरो की प्राथमिकता है कि जी.एस.एल.वी.एम. के  भार उठाने की क्षमता को चार टन से बढ़ाकर छह टन किया जाए। इसरो का कहना है कि भार उठाने की क्षमता में इजाफा करके हम आत्मनिर्भर हो जाएंगे तथा हमें अपनी छह टन से भारी सैटेलाइट को प्रक्षेपित करने के लिए यूरोपियन स्पेस पोर्ट पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

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वैज्ञानिकों ने विश्व में सर्वप्रथम बंदर का क्लोन विकसित किया

वैज्ञानिकों ने विश्व में सर्वप्रथम बंदर का क्लोन विकसित किया

वैज्ञानिकों ने उसी तकनीक से बंदर का क्लोन विकसित किया जिस से डॉली भेड़ का क्लोन विकसित किया गया था। झौंग झौंग और हुआ हुआ बंदर के दो क्लोन हैं जिन्हें शंघाई के चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेस इंस्टिट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंस में विकसित किया गया।

ये पहला मामला है जब सोमैटिक सैल न्यूक्लियर ट्रांसफर टेकनीक का इस्तेमाल करते हुए किसी बंदर का क्लोन बनाया गया है। बीस साल पहले भेड़ का क्लोन इसी तकनीक से बनाया गया था। वैज्ञानिकों ने कई अन्य तकनीकों का प्रयोग भी किया परंतु एक ही तकनीक से क्लोन विकसित हो पाया।

वैज्ञानिक आशा कर रहे हैं कि वो दवाइयों के परीक्षण के लिए आगे भी इस प्रकार से क्लोन विकसित कर पाएंगे। झौंग झौंग और हुआ हुआ के लिए वैज्ञानिकों ने अंडे की कोशिका से केंद्रक हटा कर बॉडी सेल्स के अन्य केंद्रक को स्थापित कर दिया था।

पेटा की ओर से इस मामले पर चिंता व्यक्त की गई है और कहा गया है कि यह एक भयानक तथा क्रूर कृत्य है। पेटा का कहना है कि क्लोनिंग एक हॉरर शो है जिसमें जीवन, समय और पैसा बेकार किया जाता है और इस प्रकार के प्रयोगों के कारण होने वाले कष्ट सोचे भी नहीं जा सकते।

क्लोनिंग की प्रक्रिया में नब्बे प्रतिशत असफलता मिलती है इसलिए ये दो छोटे-छोटे बंदर कष्ट और असंख्य मौतों को दर्शाते हैं। क्लोनिंग से सिर्फ जानवरों को दुख पहुंचाया जा सकता है। ये जीते-जागते जीव हैं कोई प्रयोग करने की चीज नहीं हैं। यदि इस रिपोर्ट के शब्दों को ध्यान से पढ़ा जाए तो पता चलता है कि इन दो क्लोन्स के लिए कई जानवरों को मार दिया गया जिससे कि जीवित जन्म कराया जा सके।

कुछ जानवर जन्म के कुछ ही समय बाद मर गए जो कि उनके और उनकी माओं के लिए दर्दनाक था। लगभग 100 मिलियन जानवर प्रतिवर्ष प्रयोगों के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। जो वैज्ञानिक इस परियोजना में शामिल थे उनका कहना है कि हमने कठोर नीति का पालन किया है जिससे किसी जानवर को कष्ट न हो।

इस क्लोनिंग में कठोर अंतरराष्ट्रीय निर्देशों का पालन किया गया है, जोकि यूएस नेशनल इंस्टीट्यूट हेल्थ द्वारा निर्धारित की गई हैं। ये क्लोन हमें वास्तविक नमूने दे सकते हैं जिन पर न सिर्फ आनुवांशिक दिमागी बीमारियों का बल्कि कैंसर, इम्यून या मेटाबोलिक बीमारियों का इलाज भी खोजा जा सकता है। इससे पहले वर्ष 1999 में भी मकाक बंदरों की क्लोनिंग की कोशिश की गई थी परंतु वह प्रयोग सफल नहीं हो पाया था।

स्पेस एक्स ने सबसे शक्तिशाली रॉकेट फॉल्कन हैवी लॉन्च किया

स्पेस एक्स ने सबसे शक्तिशाली रॉकेट  फॉल्कन हैवी  लॉन्च किया

6 फरवरी, 2018 को अमेरिकी कंपनी स्पेस एक्स ने विश्व का सबसे शक्तिशाली रॉकेट ‘‘फॉल्कन हैवी’’ प्रक्षेपित किया। इस रॉकेट को फ्लोरिडा के केनेडी स्पेस सेंटर स्थित नासा के ऐतिहासिक प्रक्षेपण पैड 39ए से लॉन्च किया गया। स्पेस एक्स कंपनी के संस्थापक एलन मस्क ने विश्व के सर्वाधिक शक्तिशाली व्यवसायिक रॉकेट के साथ एक लाल टेस्ला रोडस्टर भी भेजी है। इस कार में एक स्पेस सूट पहने पुतले को बांध कर रखा गया है। इस कार में तीन कैमरे भी लगाए गए हैं। कैमरों के माध्यम से अंतरिक्ष के सुंदर चित्रों को लिया जा सकता है। मस्क का कहना है कि फॉल्कन हैवी डेल्टा प्ट हैवी की लागत के एक-तिहाई लागत में ही कार्य कर लेता है। ये गुण इसे हैवी लिफ्ट रॉकेट्स की प्रतियोगिता में शीर्ष पर रखता है। जिसे ‘‘स्टारमैन’’ नाम दिया गया है।

उल्लेखनीय है कि इस रॉकेट से पहले सैटर्न-5 को सर्वाधिक शक्तिशाली रॉकेट माना जाता था। अमेरिका का ये कीर्तिमान इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसका भार 63.8 टन है। बताया जा रहा है कि इस रॉकेट का भार दो स्पेस शटल के भार के बराबर है। यह रॉकेट 230 फुट लंबा है, जिसमें 27 इंजन लगे हैं। अमेरिका में यह पहली बार हुआ है कि किसी रॉकेट को सरकारी सहायता के बिना बनाया गया है।

इस प्रक्षेपण को एक तरह से नए, बड़े रॉकेट की परीक्षा के रूप में लिया जा रहा है जिसमें यह पता करना था कि बड़ी सैटेलाइट्स तथा यंत्रों को चांद, मंगल या अन्य किसी दूर स्थित बिंदु तक ले जाया जा सकता है या नहीं। सभी बूस्टर्स में से दो जिनका पिछले प्रक्षेपणों के बाद नवीनीकरण किया गया थाµकुछ समय पश्चात् ही केप केनवरल में वापस आ गए।

फॉल्कन हैवी विश्व का सर्वाधिक शक्तिशाली रॉकेट है जिसमें तीन फर्स्ट-स्टेज बूस्टर्स लगे हैं जो कि 27 इंजनों के साथ आपस में बंधे हैं इसका आधार 40 फीट (12 मीटर) तथा लंबाई 230 फीट (70 मीटर) है। एलन मस्क ने अपनी लाल टेस्ला रोडस्टर कार इसमें रख दी है, जिसमें तीन कैमरे लगे हैं जो कि चित्रा भेजते रहेंगे। मस्क के अनुसार, यह कार कई बार मंगल ग्रह के पास पहुंचेगी और बहुत कम संभावना है कि यह मंगल ग्रह पर चली जाए।

नासा के पूर्व अंतरिक्ष यात्राी लिरॉय चिआओ का कहना है कि यदि आप कोई सैटेलाइट प्रक्षेपित करना चाहते हैं तो आपको इतने बड़े रॉकेट की आवश्यकता नहीं होगी क्योंकि सैटेलाइट इतने बड़े आकार की नहीं होती। आपको इतने बड़े रॉकेट को तभी उपयोग करने की आवश्यकता हो सकती है जब आपको कुछ बहुत दूरी पर प्रक्षेपित करना हो, जैसे कि मंगल ग्रह।

 

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कृषि अपशिष्ट से अधिक जैव-ईंधन उत्पन्न करेगा जीन रूपांतरित फंगस

नई दिल्ली में एक प्रयोगशाला में किए गए शोधकार्य के परिणामस्वरूप भारत के जैव-ईंधन के उत्पादन के प्रयत्नों को सहायता मिल सकती है। इंटरनेशनल सेंटर फॉर जेनेटिक इंजीनियरिंग एंड बायोटेक्नोलॉजी के शोधकर्मियों ने व्यवसायिक रूप से प्रयुक्त किए जाने वाले कवक के जीनोम में इस प्रकार का अंतर उत्पन्न किया जिससे यह उस एंजाइम के उत्पादन में वृद्धि करेगा जो कि सेल्युलोस को सरल फरमंटेबल शर्करा में बदल देता है। यह खोज महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे कृषि अपशिष्ट जैसे कि चावल तथा गेहूं के पुआल, जिनको जलाने के कारण उत्तर भारत में वायु प्रदूषण अपने शीर्ष पर पहुंच जाता है, का उपयोग किया जा सकेगा भारत प्रतिवर्ष 500 मिलियन टन कृषि अपशिष्ट का उत्पादन करता है।

वैज्ञानिकों ने कवक पेनिसिलियम फ्यूनिक्यूलोसम के एक कंट्रोल मैकेनिज्म को बाधित कर दिया। यह मैकेनिज्म इसकी मेटाबॉलिक क्रियाओं को नियंत्रित करता है। इस मैकेनिज्म जिसे कार्बन कैटाबॉलिक रिप्रेशन कहा जाता है, को बाधित करने से वैज्ञानिकों ने उस एंजाइम के उत्पादन मे बढ़ोत्तरी कर ली जोकि सेल्युलोस को शर्करा में परिवर्तित करती है और इस प्रकार से जैव-ईंधन के उत्पादन में भी वृद्धि प्राप्त की जा सकी।

यह जैव-ईंधन में प्रयुक्त एंजाइम का एक बेहतर विकल्प हो सकता है और सभी प्रकार के कृषि अपशिष्ट के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है। अब तक प्रयुक्त होने वाली तकनीक से सेल्यूलोस के सिर्फ 60-65 प्रतिशत को शर्करा में बदला जा सकता था, परन्तु नई प्रक्रिया का इस्तेमाल करते हुए 80-85 प्रतिशत सेल्युलोस को शर्करा में परिवर्तित किया जा सकेगा। इस कवक पर वर्ष 2009 से काम किया जा रहा था। इस कवक को इसलिए चुना गया क्योंकि ‘ट्राइकोडर्मा रीसाई’ कवक से पांच गुना अधिक सक्रिय एंजाइम का उत्पादन करता है।