विभिन्न सांविधिक,अर्द्धन्यायिक एवं अन्य निकाय (भाग-6)

कल्याण संबंधी निकाय

बहु-विकलांग व्यक्तियों के कल्याण हेतु राष्ट्रीय न्यास

यह न्यास एक संविधिक निकाय है जिसकी स्थापना आत्मविमोह, मस्तिष्क पक्षाघात और मंदबुद्धि के शिकार व्यक्तियों के लिए राष्ट्रीय न्यास और बहु-विकलांगता अधिनियम, 1999 के तहत् की गई है। इस न्यास का मूल उद्देश्य इस तरह की विकलांगता के शिकार व्यक्तियों को आत्मनिर्भर बनाना है जिससे वे यथासंभव स्वतंत्रा रूप से जी सकें। न्यास जरूरत के अनुसार सेवाएं प्रदान करने वाले पंजीकृत संगठनों को सहायता प्रदान करता है और जरूरतमंद विकलांग व्यक्तियों के लिए कानूनी संरक्षक नियुक्त करने की प्रक्रिया तय करता है।

न्यास में एक अध्यक्ष और 21 सदस्य होते हैं जिन्हें केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता है। अध्यक्ष को केंद्र सरकार द्वारा उन लोगों में से नियुक्त किया जाता है जिन्हें आत्मविमोह, मस्तिष्क पक्षाघात, मंद बुद्धि और बहु-विकलांगता के क्षेत्रा में विशेषज्ञता एवं अनुभव होता है।

केंद्रीय वक्फ परिषद्

केंद्रीय वक्फ परिषद् की स्थापना संविधिक निकाय के तौर पर भारत सरकार द्वारा दिसम्बर 1964 में, वक्फ अधिनियम, 1954 के उपबंधों के तहत् राज्य वक्फ बोर्ड के कामकाज से संबंधित मुद्दों और देश में वक्फ के समुचित प्रशासन से संबंधित मुद्दों के बारे में परामर्श देने के उद्देश्य से की गई।

परिषद् में एक अध्यक्ष, जो वक्फ प्रभारी केंद्रीय मंत्राी होता है, और केंद्र सरकार द्वारा, अधिनियम में उल्लिखित, 20 से अनधिक सदस्यों को नियुक्त किया जाता है। सचिव परिषद् का मुख्य कार्यकारी होता है। वर्तमान में परिषद् का कार्यालय नई दिल्ली में है।

परिषद् को वक्फ की कुल आमदनी का एक प्रतिशत योगदान के रूप में मिलता है। केंद्रीय वक्फ परिषद् मुस्लिम समुदायों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। शहरी वक्फ संपत्तियों का विकास, एवं शैक्षिक विकास कार्यक्रम इसके द्वारा लागू की जाने वाली योजनाएं हैं।

कर्मचारी भविष्य निधि अपीलीय ट्रिब्यूनल

कर्मचारी भविष्य निधि एवं विविध उपबंध अधिनियम, 1952 केंद्र सरकार द्वारा कर्मचारी भविष्य निधि अपीलीय ट्रिब्यूनल के गठन का प्रावधान करता है।
ट्रिब्यूनल में केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त केवल एक व्यक्ति होता है। कोई व्यक्ति ट्रिब्यूनल के प्रीसाइडिंग अधिकारी नियुक्त किए जाने के योग्य नहीं होगा जब तक कि वहः ;पद्ध एक उच्च न्यायालय का न्यायाधीश, या ;पपद्ध जिलाधीश, नहीं है या रहा है या बनने की योग्यता रखता है।
ट्रिब्यूनल, पक्षों द्वारा अपील करने के पश्चात्, दोनों को सुने जाने का अवसर देने के पश्चात्, ऐसा आदेश दे सकता है जैसा वह उचित समझे, आदेश को, जिसके खिलाफ अपील की गई है, पुख्ता कर सकता है, संशोधित या पलट सकता है या ऐसे निर्देशों के साथ जैसा ट्रिब्यूनल सही समझे, आदेश पारित करने वाले प्राधिकरण को वह आदेश, लौटा सकता है। बिल्कुल नवीन अधिनिर्णय या आदेश, जैसाकि प्रकरण बनता हो, अतिरिक्त प्रमाण का संज्ञान लेने के बाद, जारी कर सकता है।

कर्मचारी भविष्य निधि संगठन

कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) की स्थापना भारत सरकार द्वारा कर्मचारी भविष्य निधि और विविध उपबंध अधिनियम, 1952 के अंतर्गत की गई। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन अनेक सेवाएं उपलब्ध कराता है, जैसे प्रतिष्ठान के सदस्यों द्वारा दी गई धनराशि का संग्रहण, सदस्यों के खातों की देखरेख तथा सदस्यों और उनके आश्रितों को विभिन्न लाभकारी योजनाओं के तहत् धनराशि का वितरण। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन और विविध उपबंध अधिनियम, 1952 के अंतर्गत कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति पर कई प्रकार के लाभ उपलब्ध हैं। इनमें भविष्य निधि, पारिवारिक पेंशन और जमाराशि से जुड़ा बीमा शामिल है। जम्मू एवं कश्मीर को छोड़कर यह पूरे भारत में लागू है। यह अधिनियम अनुसूची में निर्देशित सभी प्रतिष्ठानों तथा ऐसे सभी प्रतिष्ठानों जहां बीस या बीस से अधिक व्यक्ति कार्यरत हों, पर लागू होता है। इस अधिनियम के अंतर्गत तीन योजनाएं तैयार की गई हैंµकर्मचारी भविष्य निधि योजना, 1952, कर्मचारी पेंशन योजना, 1995 तथा जमा राशि से जुड़ी कर्मचारी बीमा योजना, 1976। केंद्रीय न्यासी बोर्ड त्रिपक्षीय निकाय है, जिसके अध्यक्ष केंद्रीय श्रम तथा रोजगार मंत्राी होते हैं।

कर्मचारी भविष्य निधि योजना (ईपीएफ), 1952 के प्रावधान के अंतर्गत एक कर्मचारी अपने प्रतिष्ठान में अनिवार्य जमा पूंजी के बल पर अपने को वित्तीय दृष्टि से सुरक्षित महसूस करता है।
प्रशासनिक रूप से, संगठन को जोनों में संगठित किया गया है जिनकी प्रत्येक की अध्यक्षता अतिरिक्त केंद्रीय भविष्य निधि आयुक्त करता है। राज्यों में एक या एक से अधिक क्षेत्राीय कार्यालय होते हैं जिसकी अध्यक्षता क्षेत्राीय भविष्य निधि आयुक्त (ग्रेड-I) करता है, इन्हें फिर उप-क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है, जिनकी अध्यक्षता क्षेत्राीय भविष्य निधि आयुक्त (ग्रेड-II) करता है। इनकी सहायता सहायक भविष्य निधि आयुक्त करता है। प्रत्येक जिले में एक छोटा जिला कार्यालय बनाया गया है जहां पर इन्फोर्समेंट अधिकारी स्थानीय अवस्थापनाओं की जांच करता है और शिकायतों को सुनता है।

पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण (पीएफआरडीए)

पीएफआरडीए की स्थापना भारत सरकार द्वारा 23 अगस्त, 2003 को की गई थी। विधेयक के पारित होने के लंबित रहते सरकार ने 10 अक्टूबर, 2003 के एक कार्यकारी आदेश द्वारा पीएफआरडीए को पेंशन क्षेत्रा में विनियामक के तौर पर कार्य करने के लिए अधिदेशित कर दिया था। पीएफआरडीए को भारत में पेंशन क्षेत्रा का विकास और विनियमन करने का अधिदेश प्राप्त है।
पेंशन निधि विनियामक विकास प्राधिकरण 2011 को संसद द्वारा 2013 में पारित कर दिया गया जिससे अब यह एक संविधिक निकाय बन गया है।

नई पेंशन प्रणाली सेवानिवृत्ति पर समुचित आय की व्यवस्था की समस्या के स्थायी समाधान ढूंढ़ने के सरकार के प्रयास को प्रतिबिंबित करती है। पेंशन संबंधी सुधारों की ओर पहले कदम के रूप में भारत सरकार ने सुस्पष्ट लाभ पेंशन से हटते हुए सुस्पष्ट अंशदान आधारित पेंशन को अपना लिया है और इसे 1 जनवरी, 2004 से अपनी नई भर्तियों (सशस्त्रा बलों को छोड़कर) के लिए अनिवार्य बना दिया है। 1 अप्रैल, 2008 से नई पेंशन प्रणाली में कवर किए गए केंद्र सरकार के कर्मचारियों के पेंशन अंशदानों को गैर-सरकारी भविष्य निधियों पर लागू सरकार के निवेश संबंधी मार्गनिर्देशों के अनुसार पेशेवर पेंशन निधि प्रबंधकों द्वारा निवेशित किया जा रहा है।

26 राज्य/संघ राज्य क्षेत्रा सरकारों ने भी अपने नए कर्मचारियों के लिए नई पेंशन प्रणाली अधिसूचित कर दी है। इनमें से छह राज्यों ने नई पेंशन प्रणाली के कार्यान्वयन को आगे बढ़ाने के लिए पीएफआरडीए द्वारा नियोजित एनपीएस संरचना के मध्यवर्तियों के साथ पहले ही करार हस्ताक्षरित किए जा चुके हैं। अन्य राज्य प्रलेखन तैयार करने में लगे हुए हैं।

सरकार ने घोषित किया है कि न्यू पेंशन प्रणाली (एनपीएस) 1 अप्रैल, 2009 से स्वैच्छिक आधार पर प्रत्येक नागरिक को उपलब्ध होगी। तदनुसार, पीएफआरडीए एनपीएस संरचना के विस्तार की प्रक्रिया में लगा हुआ है ताकि इसे सभी नागरिकों के लिए उपलब्ध कराया जा सके। एनपीएस संरचना पारदर्शी और वेब-समर्थित होगी। यह अभिदाता को एनपीएस के अंतर्गत अपने निवेशों और लाभों का अनुवीक्षण करने में समर्थ बनाएगी और पेंशन निधि प्रबंधक (पीएफएम) और निवेश विकल्प का चयन भी अभिदाता के पास होगा। इस ढांचे में अभिदाता को अपने निवेश विकल्पों के साथ पेंशन निधियों को बदलने की अनुमति दी गई है। पीएफएम के बीच निर्बाध सुवाह्यता और अदला-बदली की सुविधा को इस ढंग से तैयार किया गया है कि अभिदाता अपनी बचत करने की पूरी अवधि में एकल पेंशन खाता रखने में समर्थ रहें।

पीएफआरडीए ने पीएफएम के कार्यों की निगरानी के लिए भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 के अंतर्गत एक न्यास का गठन किया है। एनपीएस न्यास में विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्ति शामिल हैं और विनियामक ढांचे में विविध प्रकार की प्रतिभा लायी जाएगी।

नई पेंशन प्रणाली की ऐसी रूपरेखा बनाई गई है ताकि अभिदाता अपने भविष्य के बारे में अभीष्ट निर्णय ले सकें और वे अपने रोजगार शुरू करने के दिन से ही प्रणालीगत बचतों के माध्यम से वृद्धावस्था में भरण-पोषण की व्यवस्था करने में सक्षम हो सकें। इसमें प्रयास किया गया है कि नागरिक सेवानिवृत्ति के लिए बचत करने की आदत बनाएं।

पीएफआरडीए अभिदाताओं के हितों की रक्षा करने की अपनी कार्ययोजना के अंतर्गत वित्तीय शिक्षा और जागरूकता के लिए अपना प्रयास तेज करने का भी इच्छुक है। पीएफआरडीए के प्रयास भारत में निरंतर और सक्षम स्वैच्छिक सुस्पष्ट अंशदान आधारित पेंशन प्रणाली के विकास में मील के पत्थर हैं।

प्राधिकरण का संगठनः प्राधिकरण में एक अध्यक्ष, पांच से अनधिक सदस्य होंगे, जिसमें से कम-से-कम तीन सदस्य पूर्णकालिक होंगे और इनकी नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाएगी।
नई पेंशन प्रणाली की मुख्य विशेषताएं और संरचनाः * नई पेंशन प्रणाली स्पष्ट अंशदानों पर आधारित होगी। अंशदानों के संग्रहण हेतु इसमें बैंकों की शाखाओं और डाकघरों आदि के मौजूद तंत्रा का प्रयोग किया जाएगा। रोजगार और/अथवा स्थान परिवर्तित हो जाने के मामले में, संग्रहणों के अंतरण बिना किसी बाधा के किये जाएंगे। यह निवेश विकल्पों और निधि प्रबंधकों के समूह की भी पेशकश करेगी। यह नई पेंशन प्रणाली स्वैच्छिक होगी।

* परंतु यह प्रणाली, केंद्र सरकार की सेवा में आने वाले नए प्रवेशकर्ताओं (सशस्त्रा बलों के सिवाय) के लिए अनिवार्य होगी। मासिक अंशदान वेतन और मंहगाई भत्ते का 10 प्रतिशत होगा जो कर्मचारी द्वारा अदा किया जाएगा और केंद्र सरकार द्वारा समतुल्य राशि दी जाएगी। तथापि, उन व्यक्तियों के संबंध में जो सरकारी कर्मचारी नहीं हैं, सरकार की तरफ से कोई अंशदान नहीं होगा। अंशदान और उन पर प्रति फलों को एक अनाहरणीय पेंशन खाते में जमा कराया जाएगा। परिभाषित लाभ पेंशन और सामान्य भविष्य निधि के मौजूदा प्रावधान केंद्र सरकार की सेवा में आने वाले नए प्रवेशकर्ताओं को उपलब्ध नहीं होंगे।

* उपर्युक्त पेंशन खाते के अतिरिक्त, प्रत्येक व्यक्ति अपनी पसंद स्वैच्छिक टियर-प्प् आहरणीय खाता रख सकता है। सरकार इस खाते में कोई अंशदान नहीं करेगी। इन परिसंपत्तियों की प्रबंध-व्यवस्था उसी तरीके से होगी जैसे पेंशन की होती है। इस खाते में संग्रहणों को किसी भी समय बिना कारण बताए निकाला जा सकता है।

* व्यक्ति सामान्यतया 60 वर्ष की आयु में अथवा बाद में इस पेंशन प्रणाली से बाहर निकल सकता है। बाहर निकलते समय उस व्यक्ति से अपेक्षित होगा कि वह पेंशन धन का कम से कम 40 प्रतिशत वार्षिक खरीद में निवेश करे। सरकारी कर्मचारियों के मामले में यह वार्षिक सेवानिवृत्ति के समय कर्मचारी को जीवन पर्यंत और उस पर आश्रित माता-पिता और उसके पति/पत्नी के लिए पेंशन की व्यवस्था करेगी। वह व्यक्ति शेष पेंशन धन को एकमुश्त रूप में प्राप्त करेगा जिसका उपयोग किसी भी तरह से करने के लिए वह स्वतंत्रा होगा। व्यक्तियों को 60 वर्ष की आयु से पहले पेंशन प्रणाली छोड़ने की छूट प्राप्त होगी। लेकिन इस मामले में अनिवार्य वार्षिकीकरण पेंशन धन का 80» होगा।

* चयन के लिए एक या अधिक केंद्रीय अभिलेखपाल एजेंसी (सीआरए), अनेक पेंशन निधि प्रबंधक (पीएफएम) होंगे जो विभिन्न श्रेणियों की स्कीमों की पेशकश करेंगे।
* प्रतिभागी निकाय (पीएफएम, सीआरए आदि) पिछले कार्यनिष्पादन और नियमित निवल परिसंपत्ति मूल्य (एनएवी) के बारे में आसानी से समझी जा सकने वाली सूचना देंगे ताकि व्यक्ति अपनाई जाने वाली योजना के बारे में सुविज्ञ निर्णय ले सके।
राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग
राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग एक संवैधानिक संस्था है जिसे अन्य बातों के अतिरिक्त सफाई कर्मचारियों की विशिष्ट शिकायतों और उनके कल्याण की योजनाओं और कार्यक्रमों को लागू करने संबंधी मामलों की जांच का अधिकार दिया गया है।
आयोग में एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष एवं पांच सदस्य होते हैं। इनकी नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा सफाई कर्मचारियों के सामाजिक, आर्थिक विकास और कल्याण से संबंधित प्रतिष्ठित व्यक्तियों में से की जाती है, परंतु इनमें कम से कम एक सदस्य महिला होगी।
आयोग के कृत्य एवं शक्तियांः आयोग निम्नलिखित सभी या किन्हीं कृत्यों का पालन करेगा, अर्थात्
* सफाई कर्मचारियों के लिए हैसियत, सुविधाओं और अवसरों में असमानताओं को दूर करने के लिए समयबद्ध कार्य योजना के अधीन कार्रवाई के विनिर्दिष्ट कार्यक्रम के लिए केंद्रीय सरकार को सिफारिश करना;
* सफाई कर्मचारियों के सामाजिक और आर्थिक पुनर्वास से संबंधित कार्यक्रमों और स्कीमों के कार्यान्वयन का अध्ययन और मूल्यांकन करना तथा केंद्रीय सरकार और राज्य सरकार को ऐसे कार्यक्रमों तथा स्कीमों के बेहतर समन्वय और कार्यान्वयन के लिए सिफारिश करना;
* विनिर्दिष्ट शिकायतों का प्रन्वेषण करना और निम्नलिखित के न किए जाने से संबंधित मामलों की स्वप्रेरणा से अपेक्षा करना;
* सफाई कर्मचारियों के किसी समूह की बाबत कार्यक्रम और स्कीमें;
* सफाई कर्मचारियों की कठिनाइयों को कम करने के लिए विनिश्चय; मार्गदर्शन या अनुदेश;
* सफाई कर्मचारियों के सामाजिक और आर्थिक उत्थान के लिए अध्युपाय;
* सफाई कर्मचारियों को लागू किसी विधि के उपबन्ध और ऐसे मामलों के संबंध में संबद्ध प्राधिकारियों अथवा केन्द्रीय या राज्य सरकारों से परामर्श करना;
* सफाई कर्मचारियों द्वारा जिन कठिनाइयों या निर्योग्यताओं का सामना किया जा रहा है उनको ध्यान में रखते हुए सफाई कर्मचारियों से संबंधित किसी विषय पर केंद्रीय सरकार या राज्य सरकारों को नियतकालिक रिपोर्ट देना;
* कोई अन्य विषय जो केन्द्रीय सरकार द्वारा उसे निर्दिष्ट किए जाएं।
2. आयोग को अपने कृत्यों का निर्वहन करते समय किसी सरकार या स्थानीय या अन्य प्राधिकारी से उपर्युक्त विनिर्दिष्ट किसी विषय की बाबत जानकारी मांगने की शक्ति होगी।
भारतीय पुनर्वास परिषद्
पुनर्वास परिषद् को एक पंजीकृत सोसायटी के रूप में 1986 में स्थापित किया गया था। सितंबर 1992 को भारतीय पुनर्वास परिषद् अधिनियम संसद द्वारा पारित किया गया और उस अधिनियम के द्वारा भारतीय पुनर्वास परिषद् एक संविधिक निकाय के रूप में 22 जून, 1993 को अस्तित्व में आयी। अधिनियम को संसद द्वारा वर्ष 2000 में इसे और अधिक व्यापक बनाने के लिए इसमें संशोधन किया गया। इस जनादेश के द्वारा भारतीय पुनर्वास परिषद् की नीतियों व कार्यक्रमों को विनियमित करने, विकलांगता वाले व्यक्तियों को पुनर्वास एवं शिक्षा का दायित्व दिया गया, पाठ्यक्रमों का मानकीकरण करना और एक केंद्रीय पुनर्वास रजिस्टर सभी योग्य पेशेवरों और विशेष शिक्षा के क्षेत्रा में काम करने वाले व्यावसायिकों और कार्मिकों को एक केंद्रीय पुनर्वास पंजिका में पंजीकृत करने का कार्य सौंपा गया। इस अधिनियम के तहत् अयोग्य व्यक्तियों के द्वारा विकलांगता वाले व्यक्तियों को सेवाएं देने के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करने का अधिकार प्रदान किया गया है।
परिषद् का संगठनः राष्ट्रीय पुनर्वास परिषद् अधिनियम 1992, की धारा 3 की उपधारा (1) और (3) के अनुरूप, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार एक जनरल कौंसिल का गठन करती है। जनरल कौंसिल सर्वोच्च निकाय है और विकलांग लोगों एवं उनके मूल्यांकन हेतु प्रशिक्षण नीतियों एवं कार्यक्रमों, पेशेवरों के लिए प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों के मानकीकरण का विनियमन करती है।
परिषद् के उद्देश्य, कृत्य एवं दायित्वः * देशभर में सभी प्रशिक्षण संस्थानों में विभिन्न स्तरों पर प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों का मानकीकरण एवं नियमन करना,
* विकलांगों के पुनर्वास के संदर्भ में देश में और देश के बाहर प्रशिक्षण पाठ्यक्रम चलाने वाले प्रशिक्षण संस्थानों/विश्वविद्यालयों को मान्यता देना,
* पुनर्वास और विशिष्ट शिक्षा में अनुसंधान को बढ़ाना,
* पुनर्वास के क्षेत्रा में मान्य योग्यता रखने वाले व्यक्तियों के व्यवसायों का एक केंद्रीय पुनर्वास रजिस्टर रखना,
* पुनर्वास शिक्षा कार्यक्रम जारी रखने को प्रोत्साहन देना और इसके लिए विकलांगता के क्षेत्रा में कार्यरत संगठनों के साथ मिलकर कार्य करना,
* अक्षमता या विकलांग के लिए काम करने वाली संस्थाओं एवं संगठनों के साथ सहयोग करके पुनर्वास एवं विशेष शिक्षा के क्षेत्रा में निरंतर शिक्षा को प्रोत्साहित करना,
* व्यावसायिक पुनर्वास केंद्रों को मानव संसाधन विकास केंद्रों के रूप में मान्यता प्रदान करना,
* व्यावसायिक पुनर्वास केंद्रों में कार्यरत व्यावसायिक इंस्ट्रक्टर एवं अन्य कार्मिकों को पंजीकृत करना,
* अपंगता के सम्बद्ध राष्ट्रीय संस्थानों एवं उच्च या शीर्ष निकायों को मानव संसाधन विकास केंद्रों के तौर पर मान्यता प्रदान करना।
* अपंगता संबंधी राष्ट्रीय संस्थानों और शीर्ष संस्थानों में कार्यशील कार्मिकों को सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के अधीन पंजीकृत करना।