तुर्की की ‘पक्षी भाषा’ यूनेस्को की लुप्तप्राय श्रेणी में शामिल की गई

तुर्की की एक असाधारण तथा प्रभावशाली सीटी भाषाजिसका प्रयोग तुर्की के सुदूर उत्तरी पहाड़ी इलाकों में गांववासियों द्वारा किया जाता है, को यूनेस्को (संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन) की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की सूची में शामिल किया गया। इस भाषा को गायरसन प्रांत में कानाकि गांव के लगभग 10,000 लोगों द्वारा आज भी बोला जाता है। यह भाषा सुपरिष्कृत है तथा स्वरों में सीटी की एक व्यवस्था है जो कि ऊबड़-खाबड़ स्थानों में वार्तालाप के काम आती है, जहां लोग एक-दूसरे को नहीं देख पाते। यह भाषा लगभग 500 वर्ष पूर्व ओटोमन साम्राज्य में आरंभ हुई थी तथा काले समुद्र के क्षेत्रों में फैल गई थी, परन्तु 50 वर्ष पहले तकनीकी में विकास के कारण भाषा को काफी नुकसान हुआ। वर्तमान में मोबाइल फोन के बढ़ते उपयोग के कारण इस भाषा के अस्तित्व को खतरा है।

शताब्दियों से यह भाषा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सिखाई जाती है। यद्यपि, अब इस भाषा को अच्छे ढंग से बोलने वाले तथा भाषा के लिए जीभ, दांत तथा उंगलियों का प्रयोग करने वाले वृद्ध हो गए हैं। युवा वर्ग ना तो इस भाषा को अपनाने में किसी प्रकार से इच्छुक है और ना ही इसके शब्दों को परिमार्जित करने के इच्छुक हैं, संभवतः कुछ पीढ़ियों के बाद इसे बोलने वाले लोग ही न बचें। तुर्की के संस्कृति विभाग के अध्यक्ष ने देशवासियों से इस भाषा को बचाने तथा इसका निरंतर प्रयोग करते रहने की अपील की है।

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